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आवाज़ अड्डा: राष्ट्रगान पर सरकार का लेफ्ट-राइट!

प्रकाशित Wed, 10, 2018 पर 11:03  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अब सिनेमा हॉल में शो शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं होगा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि राष्ट्रगान पर गाइडलाइंस बनाने के लिए मंत्रालयों की कमिटी बना दी गई है। कमिटी की सिफारिशें आने के बाद अगर जरूरत हुई तो सरकार नोटिफिकेशन निकालेगी तब तक सुप्रीम कोर्ट सिनेमा हॉल में अनिवार्य तौर पर राष्ट्रगान चलाने के फैसले पर रोक लगा दे। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बात मानते हुए शो से पहले जन-गण-मन चलाने की अनिवार्यता खत्म कर दी है। यहां हम आपको बताना चाहेंगे कि कोर्ट ने सिर्फ अनिवार्यता खत्म की है। अगर कोई सिनेमा हॉल चाहे तो अभी भी, राष्ट्रगान चला सकता है और अगर आप दर्शकों में शामिल हैं तो आपको राष्ट्रगान को पूरा सम्मान देना होगा। दिव्यांगों या शारीरिक तौर पर जिन्हें दिक्कत है सिर्फ उन्हें बैठे रहने की छूट होगी। बहरहाल, सरकार के हलफनामे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जन-गण-मन और राष्ट्रीय गौरव से जुड़े गीतों, प्रतीकों, नारों को लेकर एक बार फिर से बहस गर्म हो गई है।


सिनेमा हॉल में हर शो के पहले राष्ट्रगान चलाना जरूरी नहीं होगा, लेकिन इससे राष्ट्रगान समेत कई राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल पर राजनीतिक विवाद खत्म नहीं हुआ है। विपक्ष कह रहा है कि इससे पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि देश में एकरुपता का एहसास कराने के लिए सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान अनिवार्य रखना जरूरी है। लेकिन जब कोर्ट ने सरकार से इसके लिए नियम कानून बनाने की जिम्मेदारी लेने को कहा तो सरकार ने फैसला बदलने की वकालत की। विपक्ष का आरोप है कि सरकार में बैठी बीजेपी और उसके सहयोगी संगठन राष्ट्रगान, वंदे मातरम समेत देश के कई संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति कर रही है और इसी वजह से राष्ट्रगान पर भी अपनी सुविधा के हिसाब से स्टैंड बदलती रही है।


वहीं सरकार का कहना है कि इसमें स्टैंड बदलने जैसी कोई बात नहीं है। कोर्ट ने सरकार से नियम-कायदे बनाने को कहा है जिसके लिए मंत्रालयों की कमिटी बना दी गई है। फैसला बदलने के लिए इसलिए कहा गया क्योंकि दिव्यांगों, बुजुर्गों को खड़े होने में दिक्कत जैसी कई शिकायतें मिलीं थीं। इसलिए गाइडलाइंस आने तक इसपर रोक लगना ही सही है। लेकिन सवाल ये है कि सरकार को जो बातें अब समझ में आ रही हैं, उन मुद्दों पर तो इस फैसले के लागू होते ही चर्चा शुरू हो गई थी? तो क्या राष्ट्रवाद के नाम पर जल्दबाजी में उसका फैसला उल्टा पड़ गया। क्या इसके बाद हमें इस बात का इत्मीनान होना चाहिए कि बीजेपी या सरकार ऐसे प्रयोग नहीं करेगी!