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पहला कदमः बचत से फाइनेंशियल प्लानिंग की शुरुआत

बचत यानी आमदनी से बचाई गई कुछ रकम होती और बचत से फाइनेंशियल लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलती है।
अपडेटेड Sep 12, 2015 पर 16:42  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

देश में फाइनेंशियल लिटरेसी को बढ़ाने की सीएनबीसी-आवाज की इस पहल में आपका स्वागत है। इस खास पेशकश पहला कदम में हम पहली बार एक खास डिप्लोमा कोर्स दे रहे हैं। जिससे साल भर में आप बन जाएंगे एक फाइनैंशियली समझदार व्यक्ति। आज की हमारी क्लास का विषय है बचत और निवेश। पिछले हफ्ते हमने आपको बैंक और अकाउंट्स के बारे में बताया था। आज इस पहले टर्म के चौथे चैप्टर को समझाएंगे। क्या होता है निवेश, क्या होती है बचत, निवेश और बचत में क्या फर्क है। निवेश कहां कहां और कैसे करते हैं। और बचत कहां और कैसे की जाती है। इस सब की जानकारी हम आपके साथ बांटेंगे।


बचत यानी आमदनी से बचाई गई कुछ रकम होती और बचत से फाइनेंशियल लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलती है। हालांकि, केवल बचत करने के फायदा नहीं है, बल्कि बचत का सही जगह निवेश करना जरूरी है। बचत के सही निवेश से ही फायदा मुमकिन है, लेकिन ये भी बात ध्यान में रखें कि इमरजेंसी के लिए कुछ पैसा घर पर जरूर रखें। बड़ी बचत को घर पर बिना इस्तेमाल रखने से कोई फायदा नहीं है।


घर पर पैसे रखने से अच्छा है कि अपनी बचत का पैसा सेविंग्स अकाउंट में रखें। सेविंग्स अकाउंट में 4-6 फीसदी ब्याज मिल सकता है, लेकिन निवेश करने से ही ज्यादा रिटर्न मिलने के आसार बनते हैं। निवेश के लिए पैसे को अलग-अलग एसेट में लगाना चाहिए।


बचत और निवेश में यहां हम आपको फर्क बता रहे हैं, आमदनी में से बचाकर रखी गई रकम बचत होती है तो बचाई गई रकम का बेहततर इस्तेमाल निवेश होता है। बचत फाइनेंशियल प्रक्रिया का शुरुआती हिस्सा है तो बचत के बाद निवेश की बारी आती है। केवल आमदनी से बची रकम ही बचत नहीं होती, बल्कि निवेश बचत से हुई आय है। कुछ लोग बचत तो करते हैं लेकिन निवेश नहीं करते, लेकिन निवेश करना है तो सोच समझकर ही करें।


निवेश पर रिटर्न और रिस्क की बात करें तो निवेश से पहले रिस्क यानि जोखिम और रिटर्न यानि फायदों को समझना जरूरी है। रिटर्न निवेश से मिलने वाले फायदे को कहते हैं और रिटर्न फिक्स या बदलता भी रह सकता है। अगर रिटर्न फिक्स है तो थोड़ा कम होगा, लेकिन वैरिएबल रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। उम्मीद के मुताबिक रिटर्न ना मिलना रिस्क कहलाता है। ऐसा भी होता है कि कुछ मामलों में निवेश अपनी पूंजी भी गंवा सकता है। लिहाजा रिस्क और रिटर्न में सीधा रिश्ता होता है।


जोखिम कम होगा तो फायदा कम होगा। फिक्स्ड डिपॉजिट पर फायदा कम होता है, लेकिन शेयरों में ज्यादा रिस्क होता है तो यहां फायदा भी ज्यादा होता है। रिटर्न की अनिश्चितता में ज्यादा रिटर्न संभव है। हर लक्ष्य के लिए अलग-अलग रिस्क है। रिस्क और फाइनेंशियल लक्ष्य के बीच सीधा संबंध होता है। लक्ष्य कम अवधि का हो तो जोखिम कम होता है, लेकिन छोटी अवधि में जोखिम कम होता है। लंबी अवधि के लक्ष्य हासिल करने के वक्त ज्यादा रहता है। ऊंचे रिटर्न के लिए बड़ी रिस्क ली जा सकती है और ऊंचे रिटर्न के लिए शेयर मार्केट में निवेश बेहतर साबित हो सकता है।


निवेश पर रिस्क की बात करें तो जहां निवेश किया गया वो संस्थान पैसा ना लौटा सके, फिर डेट निवेश पैसा वापस ना आने का भी रिस्क होता है। इसके अलावा निवेशक की पूंजी डूबने का भी खतरा होता है, लेकिन सरकारी सिक्योरिटीज में पैसा डूबने का रिस्क नहीं होता है। निवेश पर मिलने वाले ब्याज में गिरावट का भी जोखिम होता है, तो ब्याज दर बढ़ने से बॉन्ड्स की कीमतों में गिरावट आती है। ब्याज दर बढ़ने से डेट म्युचुअल फंड की कीमत में भी गिरावट दिखती है। ब्याज दर बढ़ने से सभी डेट निवेशकों को नुकसान मुमकिन है। ब्याज दर बढ़ने पर बॉन्ड और डिबेंचर्स को मैच्योरिटी तक रखने में नुकसान हो सकता है।


किसी इंस्ट्रूमेंट में निवेश से हुए फायदे को दोबारा निवेशक के दौरान रिटर्न में गिरावट मुमकिन है। लॉक इन पीरियड के दौरान ज्यादा रिटर्न मिल रहा हो, लेकिन पैसा दोबारा निवेश के दौरान हालात बदलने से रिस्क बढ़ सकता है। डेट फंड में निवेश के रिटर्न हमेशा फिक्स नहीं रहते तय वक्त के बाद बदलाव होता रहता है। लंबी अवधि के डेट फंड में निवेश से निवेशक का पैसा लॉक हो सकता है।


मार्केट उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन ना करें, तो यहां भी रिस्क बन जाता है। शेयर मार्केट में हमेशा अनिश्चितता रहती है और शेयर मार्केट में निवेशक पैसा गंवा भी सकता है। शेयर मार्केट की रिस्क को टाला नहीं जा सकता है और निवेशकों को शेयर मार्केट में स्टॉप लॉस लगाना पड़ता है। लिक्विडिटी के रिस्क पर गौर करें तो जब जरूरत हो तब लिक्विडिटी यानि नगद रूप में पैसा ना मिले। ऐसा उस वक्त होता है जब पैसा खास अवधि के लिए लॉक हो जाए। निवेश इंस्ट्रूमेंट के खरीदार बाजार में ना मिले। रियल एस्टेट या शेयर में निवेश में ये रिस्क हो सकता है।


पर्चेजिंग पावर रिस्क, ऐसा महंगाई बढ़ने की वजह से हो सकता है। महंगाई के चलते निवेशक की खरीदने की शक्ति घट जाती है और निवेशक के पैसे की कीमत में इजाफा नहीं होता है। रिटर्न की वैल्यु महंगाई के मुकाबले कम रह जाती है। ज्यादा जोखिम वाले इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश से इस स्थिति का टाला जा सकता है। एक्सचेंज रेट रिस्क, ऐसा फॉरेन एक्सचेंज रेट्स में उतार चढ़ाव से होता है। इसका सीधा संबंध निवेशक से नहीं होता लेकिन इसका असर उसके निवेश पर पड़ता है। एक्सचेंज रेट रिस्क का तात्पर्य है कि ऐसी कंपनी में निवेश से रिस्क जिसका कारोबार विदेश में है। विदेशी कारोबार करने वाली कंपनियों को विदेशी करेंसी के उतार चढ़ाव से रिस्क का सामना करना पड़ता है।


राजनीतिक उठापटक से भी निवेश पर जोखिम होता है। टैक्स बढ़ाने या विदेशी निवेश जैसे राजनीतिक फैसलों का असर निवेश पर हो सकता है। राजनीतिक स्तर पर फैसलों में देरी से भी असर मुमकिन है। आर्थिक मामलों पर राजनेताओं की विचारधारा का असर भी देखने को मिलता है।


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