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पहला कदमः म्युचुअल फंड की शब्दावली

जानें म्युचुअल फंड से जुड़ी टर्म यानि शब्दावली जिन्हें लेकर अक्सर हम कन्फ्यूज हो जाते हैं।
अपडेटेड Nov 07, 2015 पर 20:00  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सीएनबीसी-आवाज़ पहला कदम की मुहिम का मकसद है ज्यादा से ज्यादा लोगों को बचत और निवेश की जरूरत को समझाना और देश के फाइनेंशियल सिस्टम से जोड़ना। अपनी इस मुहिम को हम देश के स्कूल, कॉलेजों और गांवों तक ले जा रहे हैं और स्कूलों, कॉलेजों में हमें शानदार रिस्पॉन्स भी मिल रहा है। अगर आप भी अपने गांव, रेसिडेंशियल सोसायटी, ऑफिस, कॉलेज या स्कूल में जागरुकता फैलाना चाहते हैं और हमारी टीम की एक्सपर्ट एडवाइस चाहते हैं, तो हमें लिख सकते हैं फेसबुक पर सीएनबीसी-आवाज़ के पेज पर या फिर आप हमारी वेबसाईट www.pehlakadam.in (पहलाकदम डॉट इन) पर भी अपना मेसेज छोड़ सकते हैं।


सीएनबीसी-आवाज चाहता है कि देश में हर शख्स आर्थिक प्रक्रिया से जुड़े और इसी कड़ी में हमने पहल की पहला कदम की। पहला कदम हमारे और आपके बीच मौजूद हर उस शख्स को फाइनेंशियल इन्क्लूजन की प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना चाहता है जो अब तक उससे दूर रहा है। इस कार्यक्रम में हम आपको निवेश के तौर तरीके ही नहीं बताते बल्कि अपने दिमाग में उठ रहे सवालों के जवाब भी देते हैं। पहला कदम में इस बार हम बात कर रहे हैं म्युचुअल फंड की। पिछले एपिसोड में हमने आपको म्युचुअल फंड से जुड़ी शुरुआती जानकारी दी थी। इस बार हम उससे आगे की बात करेंगे और जानेंगे म्युचुअल फंड से जुड़ी टर्म यानि शब्दावली के बारे में जिन्हें लेकर अक्सर हम कन्फ्यूज हो जाते हैं।


म्युचुअल फंड की टर्म
म्युचुअल फंड की टर्म्स समझने से निवेश में आसानी होती है और फाइनेंशियल लक्ष्य के मुताबिक अलग अलग म्युचुअल फंड लेने चाहिए।


यूनिट
हर निवेशक को यूनिट का मतलब जानना जरूरी है और यूनिट से मतलब निवेशक की होल्डिंग से होता है। अगर इक्विटी में निवेश है तो यूनिट की तुलना शेयर से की जा सकती है और अगर डेट या गोल्ड फंड है तो इसे यूनिट कहते हैं। यूनिट दूसरी होल्डिंग से अलग होता है।


फोलियो
म्युचुअल फंड में निवेशक की होल्डिंग फोलियो के हेड में रखी जाती है और हर फोलियो को अलग नंबर दिया जाता है। ये बैंक या दूसरी फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस की ओर से दिए जाने वाले कस्टमर आईडेंटिफिकेशन नंबर जैसा होता है। एक फोलियो में कई होल्डिंग हो सकती हैं।


लोड
म्युचुअल फंड में पैसा लगाते वक्त निवेशक को जो अलग से पैसा देना होता है वो लोड कहलाता है। अब एंट्री लोड खत्म हो गया है लेकिन अभी भी म्युचुअल फंड खरीदने पर कुछ दूसरे चार्जेंस लगते हैं जैसे एक्जिट लोड अभी भी लगता है और फंड से बाहर आने पर चार्जेज लगते हैं जिसे एक्जिट लोड कहते हैं। एमएफ निवेश से जल्दी बाहर निकलने पर एक्जिट लोड लगता है। एक्जिट लोड आम तौर पर 1-1.5 फीसदी तक होता है और ये फंड बेचते वक्त काट लिया जाता है। एक्जिट लोड को कंटीन्जेंसी डेफर्ड सेल्स चार्ज भी कहा जाता है।


सेल प्राइज
निवेशक किसी भी फंड की जिस कीमत पर यूनिट खरीदता है वो सेल प्राइज कहलाती है और ये फंड के नजरिए से सेल प्राइज है। निवेशक के नजरिए से ये पर्चेज प्राइज है और कोई भी फंड की खरीददारी नेट एसेट वैल्यु पर होती है। नेट एसेट वैल्यु और सेल प्राइज में फर्क नहीं है।
 
रिपर्चेज प्राइज
जिस कीमत पर निवेशक अपना फंड बेचता है उसे रिपर्चेज प्राइज कहा जाता है और फंड के नजरिए से इसे रिपर्चेज प्राइज कहा जाता है। निवेशक के नजरिए से ये सेल प्राइज है। रिपर्चेज प्राइज भी नेट एसेट वैल्यु से ताल्लुक रखती है।


नेट एसेट वैल्यू
नेट एसेट वैल्यू को एनएवी कहा जाता है और निवेशक के म्युचुअल फंड की एक यूनिट की कीमत को एनएवी कहा जाता है। ये म्युचुअल फंड के सभी एसेट से कैलकुलेट की जाती है और इसमें पोर्टफोलियो की वैल्यू शामिल होती है। इसमें दूसरे चार्जेस भी शामिल किए जाते हैं जैसे ओपन एंडेड फंड में यूनिट रोजाना बदलती है इसलिए एनएवी को कैलकुलेट करना कठिन होता है। एनएवी रोजाना बदलती है।


म्युचुअल फंड स्कीम
म्युचुअल फंड में निवेश को स्कीम कहा जाता है लेकिन निवेशक और सलाहकार स्कीम टर्म का ही इस्तेमाल करते हैं और फंड हाउस अलग अलग म्युचुअल फंड को स्कीम ही कहते हैं। हर स्कीम में अलग अलग प्लान होते हैं मसलन एबीसी इक्विटी फंड को स्कीम कहा जाएगा और स्कीम के चुनाव के बाद उसमें शामिल प्लान चुना जाता है जैसे डिविडेंड पेआउट ऑप्शंस।


डिविडेंड पेआउट ऑप्शंस
नाम से जाहिर है निवेशक को इस स्कीम के तहत डिविडेंट मिलेगा और डिविडेंट का समय और रकम की सीमा फंड मैनेजर तय करते हैं। पेआउट ऑप्शंस में निवेशक के बैंक अकाउंट में डिविडेंड जमा कर दिया जाएगा और डिविडेंड इलेक्ट्रोनिक क्रेडिट या चेक से जमा करा दिया जाता है।


डिविडेंड रिइन्वेस्टमेंट ऑप्शन
ये डिविडेंड ऑप्शन का हिस्सा है और इसमें फंड मैनेजर की ओर से घोषित डिविडेंड का फायदा निवेशक को मिलता है लेकिन इसमें डिविडेंड सीधे निवेशक को नहीं मिलेगा। इस डिविडेंड को वापस फंड में निवेश कर दिया जाता है। रिइन्वेस्टमेंट से निवेशक को अलग से यूनिट मिल जाती हैं और इससे निवेशक को कंपाउडेंड आय होती है।


ग्रोथ ऑप्शन
ग्रोथ ऑप्शन में निवेशक को पेआउट नहीं मिलता और फंड का मुनाफा फंड में लगा दिया जाता है जिससे इसमें एनएवी बढ़ती रहती है। डिविडेंड ऑप्शन के मुकाबले ग्रोथ ऑप्शन में एनएवी ज्यादा मिलती है और इसमें निवेशक के पास यूनिट बेचने का विकल्प होता है। लंबे वक्त के निवेश में ये फायदेमंद होता है।


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