Moneycontrol » समाचार » राजनीति

आवाज़ अड्डाः सपा-बसपा के बीच समझौता, कितना फायदा!

प्रकाशित Tue, 06, 2018 पर 09:53  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के रिश्तों में 22 साल से जमी बर्फ पिघलती हुई दिख रही है। राज्यसभा, विधान परिषद और दो लोकसभा सीटों के उपचुनाव में दोनों पार्टियां एक दूसरे की मदद करेंगी। अब सवाल ये है कि क्या ये दोस्ती दूर तक जाएगी और 2019 में भी उत्तर प्रदेश में सपा और बीएसपी एक साथ मिलकर बीजेपी का मुकाबला करेंगे। फिलहाल इसपर स्थिति साफ नहीं है। अगर 2019 में भी सपा, बीएसपी साथ रहे तो इसमें कांग्रेस को मिलाकर एक राजनीतिक त्रिकोण बनेगा या नहीं, ये भी साफ नहीं है। इधर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने गैर बीजेपी, गैर कांग्रेस दलों का मोर्चा बनाने की बात कही है। यानि एक तरफ विपक्ष में एकता की सुगबुगाहट साफ दिख रही है तो दूसरी तरफ इसमें विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को लेकर कुछ भी साफ नहीं है।


2 जून 1995 को स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती पर जानलेवा हमलों के बाद ये पहला मौका है जब दोनों पार्टियां एक दूसरे के साथ दिखाई दे रही हैं। मायावती कह रही हैं कि राज्यसभा और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव में दोनों पार्टियां एक दूसरे की मदद से एक-एक उम्मीदवार जितवाएंगी। यही नहीं फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनावों भी बसपा ने समाजवादी पार्टी के लिए रास्ता छोड़ दिया है। 


साफ है कि मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ फिलहाल गठबंधन से इंकार किया है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। 1995 से अब तक गोमती में बहुत पानी बह चुका है। तब एक बीजेपी विधायक ब्रह्मदत द्विवेदी ने मायावती की जान बचाई थी, मगर आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए सपा और बीएसपी दोनों को बीजेपी से लोहा लेना है और मायावती के दुश्मन नंबर वन, मुलायम सिंह यादव को उनके बेटे ने ही लगभग राजनीतिक सन्यास पर भेज दिया है। लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुताबिक ये साथ लंबा चल ही नहीं सकता।


दिलचस्प बात है कि कर्नाटक में कांग्रेस को दरकिनार कर देवेगौड़ा की पार्टी जेडीयू से गठबंधन कर चुकी मायावती ने, उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस को तवज्जो देने से इंकार किया है। उनका कहना है कि राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उनका साथ देगी तो बदले में उनके विधायक मध्य प्रदेश में कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट देंगे। इधर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने गैर बीजेपी, गैर कांग्रेस दलों के मोर्चे की बात कही है और कहा है कि ममता बनर्जी ने उन्हें फोन भी किया था। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और जेएमएम नेता हेमंत सोरेन ने भी तीसरे मोर्चे की तैयारी की पुष्टि की है।


कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है कि बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी दलों की एकता जरूरी है। इसलिए कांग्रेस को लेकर अगर कुछ दलों को शिकायत है तो उसे दूर किया जाना चाहिए।


सवाल उठता है कि क्या विपक्षी पार्टियां एकजुट होने के लिए गंभीर भी हैं? बगैर कांग्रेस के कोई विपक्षी गठबंधन बीजेपी को चुनौती दे सकता है? और एक दिलचस्प सवाल ये भी है कि समाजवादी पार्टी और मायावती का साथ कितनी देर टिकेगा?