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आवाज़ अड्डाः 22 साल से लटका महिला आरक्षण बिल, बनेगी सहमति!

प्रकाशित Thu, 08, 2018 पर 20:42  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

इसमें कोई दो राय नहीं कि समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाएं ताकतवर हुई हैं। नौकरी से लेकर कारोबार तक में ऊंची उड़ान भरी है और दुनिया में शोहरत दौलत और इज्जत कमाई है। इन सबके बावजूद अभी तक उनको वो ताकत हासिल नहीं है जो सबसे बड़ा बदलाव ला सकती है। और वो है सत्ता की राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी। ये अब भी काफी कम है। पिछले दशक में कई राज्यों ने पंचायत और नगर निकाय में महिलाओं को 50 फीसदी तक आरक्षण दिया है। लेकिन संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का मामला अब भी लटका हुआ है। किसी पार्टी में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की इच्छा नहीं दिखती है। आवाज अड्डा में आज हम इसी पर चर्चा करेंगे कि आधी आबादी को उनका हक देने में आखिर दिक्कत क्या है। क्यों पार्टियां इसमें अड़चनें डाल रही हैं।


महिला दिवस पर इस बार भी सरकार से लेकर कॉरपोरेट तक ने समारोह किए, नई घोषणाएं की। प्रधानमंत्री ने राजस्थान के झुंझुनूं में इस मौके पर पोषाहार मिशन की शुरुआत की, अब तक 161 जिलों तक सीमित बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम का दायरा भी देश के सभी 640 जिलों तक बढ़ा दिया। प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम में कहा कि जब बेटियां फाइटर जेट उड़ाती हैं तो उनकी ताकत का एहसास होता है। लेकिन प्रधानमंत्री ने इस बात पर अफसोस भी जताया कि एक समाज के रूप में हमें आज भी बेटियों को बचाने के लिए अभियान चलाना पड़ता है। 


लेकिन बेटियों को ताकतवर बनाने में जुटे प्रधानमंत्री से विपक्ष महिला आरक्षण का हिसाब मांग रहा है। कांग्रेस की महिला विंग ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया, नारेबाजी की और तुरंत बिल लाने की मांग की


महिला आरक्षण के लिए सबसे पहले 1996 में देवेगौड़ा सरकार बिल लेकर आई थी। तब से लेकर 6 बार ये बिल संसद में लाया गया। आखिरी बार 2008 में मनमोहन सिंह ने इसे राज्यसभा में पेश किया और 9 मार्च, 2010 को वो ऐतिहासिक दिन भी आया जब ये बिल राज्यसभा में पास हो गया, लेकिन लोकसभा में आज भी पेंडिंग हैं।


सवाल उठता है कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का मामला अब तक क्यों लटका हुआ है? सवाल ये भी है कि मोदी सरकार के 4 साल के कार्यकाल में क्या महिलाओं की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है?