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आवाज़ अड्डाः इच्छामृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला, कैसे रोकेंगे गलत इस्तेमाल!

प्रकाशित Fri, 09, 2018 पर 20:52  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दे दी है और खास परिस्थिति में लिविंग विल यानि इच्छामृत्यु को भी कानूनी मान्यता मिल गई है। इसका मतलब ये नहीं कि कोई भी व्यक्ति इच्छामृत्यु की मांग कर सकता है। लेकिन कोर्ट के इस फैसले ने विशेष परिस्थिति में सम्मानजनक मौत को व्यक्ति का अधिकार माना है।  इस फैसले ने मेडिकल साइंस, धर्म, नैतिकता और समाज विज्ञान वगैरह के नजरिए बड़े सवालों को जन्म दे दिया है। आज आवाज़ अड्डा में इसी पर बात होगी, लेकिन उससे पहले इस फैसले को ठीक से समझ लेते हैं और ये भी देखते हैं कि समाज में कैसी प्रतिक्रियाएं हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ कॉमन कॉज की याचिका पर ये फैसला दिया है कि जब किसी व्यक्ति की जिंदगी सिर्फ नाम के लिए बची हो और उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम के भरोसे रखा जा रहा हो तो उसे सम्मान के साथ मौत को गले लगाने का अधिकार है। इसके लिए कोर्ट ने सिर्फ नाम की जिंदगी जैसी खास परिस्थितयों को भी चिह्नित किया है।


पहली स्थिति तो ये हो सकती है कि जब कोई मरीज स्वयं होश में हो, मृत्यु की इच्छा जताए और लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटवाने के लिए तैयार हो। ऐसी स्थिति में डॉक्टर और परिजनों को उसका फैसला मानना पड़ेगा। 


दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि मरीज होश में ना हो लेकिन उसने पहले ही ऐसी परिस्थिति के लिए इच्छामृत्यु की वसीयत कर रखी हो। तीसरी स्थिति ये संभव है कि मरीज न तो स्वयं होश में हो और ना ही उसने इच्छामृत्यु की वसीयत कर रखी हो। तब डॉक्टर और परिजन तय प्रक्रिया के तहत उसके लिए पैसिव यूथेनेसिया की मांग कर सकते हैं।


लेकिन स्थिति कोई भी हो सिर्फ और सिर्फ पैसिव यूथेनिसिया यानि लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत होगी, ना कि एक्टिव यूतेनेसिया यानि मृत्यु को संभव बनाने के लिए किसी तरह की दवा या उपकरण का प्रयोग करने की इजाजत नहीं होगी।


सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला उन लोगों और उनके परिजनों के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, जो जिंदा लाश की तरह महीनों अस्पताल में पड़े-पड़े मौत का इंतजार करते रहते हैं, बिल बढ़ता रहता है और बचने की कोई संभावना नहीं होती।


लेकिन इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है। पहले से इच्छामृत्यु मांग रहे लोग तरह-तरह की परिस्थितियों का हवाला दे रहे हैं..इसमें बढ़ापे से लेकर विकलांगता और ऑर्गन डोनेशन तक का तर्क शामिल है।
 
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कई सवाल भी खड़े हो गए हैं। कोई इच्छामृत्यु का पात्र है या नहीं ये तय करने का तरीका कितना वैज्ञानिक होगा। हमारे देश में जहां 130 करोड़ की आबादी के बड़े हिस्से को स्वास्थ्य की सुविधा भी अबतक नहीं मिल पाई है, इच्छामृत्यु की अर्जियां निपटाने के लिए सरकार कारगर सिस्टम बना पाएगी? या वहां भी तारीख पर तारीख ही मिलती रहेगी। औऱ इस फैसले के गलत इस्तेमाल को रोकना आसान होगा क्या। इंसानी रिश्ते, संवेदना और चमत्कार की आस जैसी कुछ बातें तो अलग हैं ही।