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आवाज़ अड्डाः पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा, विपक्ष के निशाने पर ममता

प्रकाशित Mon, 04, 2018 पर 20:37  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पश्चिम बंगाल में पिछले सप्ताह दो बीजेपी कार्यकर्ताओं की मौत पर बवाल मचा हुआ है। बीजेपी समेत बंगाल की तमाम विपक्षी पार्टियां इसे ममता बनर्जी की राजनीति से जोड़ रही हैं। लेकिन ये पहली बार नहीं है कि बंगाल की राजनीति में हत्या या हिंसा को एक हथियार के तौर इस्तेमाल करने के आरोप लगे हों। ये तो 70 के दशक से होता आ रहा है। लेकिन हाल के दिनों में बंगाल में हिंसा का नया सिलसिला दिखाई देता है। कभी सांप्रदायिक टकराव के नाम पर तो कभी राजनीतिक वजहों से हिंसा होती है, हिंसा के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाता है और निशाने पर होती पुलिस और ममता बनर्जी की सरकार।


पुरुलिया के बलरामपुर ब्लॉक में दो अलग अलग घटनाओं में बीजेपी के दो कार्यकर्ताओं की लाश झूलती हुई मिली है। वो भी सिर्फ दो दिन के अंतराल पर। आपको बता दें कि हाल में हुए पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा में करीब 50 लोगों की हत्या हुई थी। राज्य की लगभग एक चौथाई सीटों पर त्रिणमूल कांग्रेस के सामने किसी पार्टी ने उम्मीदवार नहीं दिया था। विपक्ष का आरोप है कि त्रिणमूल ने दादागिरी कर विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन नहीं करने दिया। उन सीटों के नतीजों पर सुप्रीम कोर्ट 3 जुलाई को सुनवाई करेगा। बाकी सीटों पर टीएमसी ने पूरे राज्य में भारी जीत हासिल की है। लेकिन पुरुलिया जिले और खासकर बलरामपुर में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया है। यही वजह है कि बीजेपी ने टीएमसी पर हत्या के जरिए चुनावी हार का बदला लेने का आरोप लगाया है और दोनों घटनाओं की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। यही नहीं बीजेपी और आरएसएस विपक्ष के दलों पर जानबूझकर चुप्पी साध लेने का आरोप लगाया है।


लेकिन विपक्ष के बड़े नेता भले ममता के खिलाफ कुछ ना बोलें, पश्चिम बंगाल में सीपीएम और कांग्रेस भी ममता बनर्जी के खिलाफ हमलावर हैं और ममता पर भय पैदा करने के लिए हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं।


पिछले दिनों रामनवमी के दौरान भी पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा की वारदातें हुई थीं और ब ने ममता बनर्जी की सरकार पर एकतरफा कार्रवाई के आरोप लगाए थे। सवाल उठता है कि क्या  ममता सरकार विरोधियों में भय पैदा करने के लिए हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं? बंगाल की हिंसा के बारे में वहां के राजनीतिक इतिहास का हवाला भी दिया जाता है। लेकिन क्या किसी भी आधार पर राजनीतिक फायदे के लिए हिंसा का सहारा लेने को जायज ठहराया जा सकता है?