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आवाज़ अड्डा: सहयोगी नाराज या दबाव की राजनीति!

प्रकाशित Thu, 07, 2018 पर 08:06  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

संपर्क फॉर समर्थन कार्यक्रम के तहत मुंबई पहुंचे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने रतन टाटा और माधुरी दीक्षित जैसी नामचीन हस्तियों के साथ-साथ शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से भी मुलाकात की। इस मुलाकात को 2019 में शिवसेना को साथ रखने की एक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। उद्धव साफ कर चुके हैं कि वो अलग लड़ेंगे। इसके बावजूद अगर बीजेपी उन्हें मनाने की कोशिश कर रही है तो इसकी जायज वजह है। उपचुनावों में कैराना और गोंदिया-भंडारा की सीटें गंवाने के बाद लोकसभा में 271 पर पहुंच चुकी बीजेपी का अपने दम पर बहुमत का दावा खत्म हो चुका है। इधर विपक्ष गोलबंद हो रहा है और एनडीए के बड़े दल एक-एक कर दबाव बना रहे हैं।


बीजेपी अगर उद्धव ठाकरे को नहीं मना पाई तो 2019 में बीजेपी के लिए महाराष्ट्र बड़ी परेशानी बन सकता है। शिवसेना महाराष्ट्र और केंद्र सरकार में बीजेपी की पार्टनर है लेकिन 2014 चुनावों के बाद से ही कम हिस्सेदारी और उपेक्षा के चलते नाराजगी जताती आ रही है और विधानसभा और बीएमसी के चुनाव अलग लड़ चुकी है। और 2019 में अलग चुनाव लड़ने की जिद पर अभी भी अड़ी हुई है।


हाल में हुए उपचुनावों के नतीजों के बाद विपक्षी एकता और बीजेपी का गिरता ग्राफ चर्चा में है। देश की तमाम छोटी बड़ी पार्टियां 2019 की रणनीति बनाने में जुट गई हैं। ऐसे में 47 दलों के एनडीए का हर फ्रेंड बीजेपी के लिए जरूरी है। और ऐसे माहौल में पंजाब में अकाली दल और उत्तर प्रदेश में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे दल तेवर दिखा रहे हैं। शिवसेना 2019 में साथ छोड़ने पर आमादा है तो आंध्र को विशेष राज्य के दर्जे की मांग पर चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम एनडीए छोड़कर जा चुकी है और अब जेडीयू भी यही मांग दोहरा रही है और बिहार में बड़ी भूमिका के नाम पर दबाव बना रही है।


माना जा रहा है कि 2019 में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बीजेपी को खासकर दक्षिण भारत में कुछ नए पार्टनरों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में जरूरी है कि एनडीए के पुराने सहयोगी साथ बने रहें। शिवसेना इस मामले में मोदी-शाह की जोड़ी का टेस्ट केस होगा। क्या ये दोस्ती 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बनी रहेगी?