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आवाज़ अड्डा: भ्रष्टाचार निरोधक कानून में बदलाव की जरूरत!

प्रकाशित Thu, 05, 2018 पर 07:58  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

भ्रष्टाचार को रोकने के चक्कर में कहीं सरकार के कामकाज को ही तो ब्रेक नहीं लग रहा है। सवाल नए सिरे से उठ रहा है क्योंकि वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने सीधे भ्रष्टाचार विरोधी कानून पर ही सवाल उठा दिया है। उनका कहना है कि इस कानून के चक्कर में ईमानदारी से लिए गए फैसले भी गलत साबित हो जाते हैं। उनसे पहले दबी जुबान में ऐसी ही बातें सरकारी अफसर और बैंक या सरकारी कंपनियों के अधिकारी भी उठाते रहे है। बैंकों का संगठन आइबीए भी इस मामले पर विरोध जता चुका है। कर्ज देने में धांधली की जांच में बैंकों के कई आला अधिकारी जांच एजेंसियों की गिरफ्त में आ चुके हैं। इससे पहले भी हजारों करोड़ रुपये के 2जी और कोयला घोटाले में कई बड़े सरकारी अफसरों से जांच एजेंसियों ने पूछताछ की। कुछ के खिलाफ कार्रवाई भी हुई। जिस तरह से आला अधिकारियों पर जांच एजेंसियां शिकंजा कस रही हैं उससे क्या डर का माहौल नहीं बनेगा। सवाल ये उठ रहा है कि क्या भ्रष्टाचार रोकने का कानून अफसरों को काम करने से रोक रहा है।


जानकारों का कहना है कि 1988 का भ्रष्टाचार निरोधक कानून उस वक्त के रेगुलेटरी शासन को ध्यान में रखकर बनाया गया था। ये अब तक का सबसे खराब ड्राफ्ट किया हुआ कानून है। इसकी वजह से ईमानदारी से लिए गए फैसले भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ जाते हैं।


केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली कानून के जानकार भी हैं। उन्हें लगता है कि भ्रष्टाचार रोकने के कानून के डर से अफसर या बैंक के मैनेजर अब बड़े फैसले लेने से भी कतराने लगे हैं। जेटली मानते हैं कि हर डूबे हुए कर्ज को घोटाले का सबूत नहीं मानना चाहिए। कई मामलों में पुलिस ने बैंक अधिकारियों की गिरफ्तारी में जो तत्परता दिखाई है उसे लेकर वो राज्यों की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं।


हाल ही में पुणे पुलिस ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एमडी एंड सीईओ समेत टॉप मैनेजमेंट को गिरफ्तार कर लिया था। इन लोगों पर नियमों का उल्लंघन करके डेवलपर डीएसके ग्रुप को 94.5 करोड़ रुपये का कर्ज देने का आरोप लगा है। इस मामले में बैंक के पूर्व सीएमडी सुशील मुहनोत की भी गिरफ्तारी हुई। इस कार्रवाई से पूरा बैंकिंग सेक्टर सदमे में है। बैंकों के संगठन इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने इसकी निंदा करते हुए कहा था कि जांच एजेंसियां उन्हें गलत तरीके से टारगेट कर रही हैं।


नीरव मोदी और मेहुल चोकसी घोटाले के बाद जांच एजेंसियां एक्शन मोड में हैं। बैंकों के कर्ज देने में धांधली के मामलों की जांच हो रही है। कुछ बैंकों के अधिकारी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। हाल ही में केनरा बैंक के पूर्व चेयरमैन एस रमन ने आरबीआई की एक कमिटी से इस्तीफा दे दिया क्योंकि सीबीआई ने उनके खिलाफ विनसम डायमंड्स को कर्ज देने के मामले में जांच शुरू कर दी थी। बैंकिंग इंडस्ट्री के दिग्गज भी भ्रष्टाचार रोकने के कानून में बदलाव की वकालत कर रहे हैं।


हजारों करोड़ रुपये के 2जी और कोयला घोटाले जैसे मामलों में कई पूर्व अफसरों से पूछताछ हुई। उनके खिलाफ एक्शन भी हुआ। सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बना कानून आउटडेटेड हो गया है या ये कानून ईमानदार अफसरों को फैसला लेने से रोकता है? कानून से अफसरों के डरने की बात कितनी वाजिब है या अफसरों को इस बहाने अभय दान चाहिए और कानून अगर बेकार है तो इसे बदलने की पहल कौन करेगा!