खोदा पहाड़ और निकली चुहिया

बजट में कोई ठोस कदम न उठा कर प्रणव मुखर्जी ने अपने हाथ से एक बड़ा मौका गंवा दिया है
अपडेटेड Mar 16, 2012 पर 20:10  |  स्रोत : Moneycontrol.com

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का बजट ‘खोदा पहाड़ और निकली चुहिया’ वाली कहावत को एक दम सही साबित कर रहा है। उम्मीद थी की वित्त मंत्री कड़े फैसले लेंगे या फिर एक दम पॉपुलिस्ट बजट लाएंगे। लेकिन बजट में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा।


दरअसल बजट का गणित कुछ इस तरह है, प्रणव मुखर्जी ने कमाई बढ़ाने का इंतज़ाम तो किया है लेकिन खर्चों में बड़ी कटौती कहीं नहीं दिख रही है। इस लिहाज से फिस्कल कंसोलिडेशन की बात में बहुत दम नहीं है। वित्त मंत्री ने बड़े आर्थिक सुधारों को बजट में दरकिनाकर कर दिया है। वित्त मंत्री ने टैक्स स्लैब में मामूली बढ़ोतरी कर मिडिल क्लास को थोड़ी राहत तो दी है। लेकिन एक्साइज़ ड्यूटी और सर्विस टैक्स में जो बढ़ोतरी होगी उससे टैक्स स्लैब में मिली रियायतें हवा हो जाएंगी।


हालांकि वित्त मंत्री ने मौजूदा वित्तीय घाटे को 5.9 फीसदी से कम कर 5.1 फीसदी पर लाने का इरादा ज़ाहिर किया है वो काफी अच्छा है। वित्तीय घाटे में 0.80 फीसदी की कमी अगर वाकई में हो पाती है तो ये काफी बड़ी बात होगी। लेकिन देखने की बात ये होगी को वो इस लक्ष्य को हासिल कैसे करते हैं। आसार ज़्यादा हैं कि बीते साल की तरह वित्तीय घाटे का लक्ष्य फिर से हासिल न हो पाए। वित्तीय घाटे के लक्ष्य से भटकने के आसार इसलिए हैं क्योंकि वित्त मंत्री इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए टैक्स कलेक्शन में बढ़ोतरी पर काफी निर्भर हैं। कस्टम, एक्साइज़ और सर्विस टैक्स में बढ़ोतरी से सरकार को 45940 करोड़ रुपये मिलेंगे। जबकि डायरेक्ट टैक्स में रियायतों से कमाई में 4500 करोड़ रुपये की कमी आएगी। मतलब कुल फायदा 41400 करोड़ रुपये का ही होगा। टैक्स कलेक्शन का ये लक्ष्य हासिल हो पाना इसलिए मुश्किल लग रहा है क्योंकि जब इकोनॉमी की चाल सुस्त हो तो भला इतनी टैक्स आमदनी कैसे मुमकिन है? बीते साल भी तो ऐसा ही हुआ था।


सरकार की आमदनी बढ़ाने के लिए जो रास्ता निकाला गया है उसमें एक्साइज़ ड्यूटी में 2 फीसदी की चौतरफा बढ़ोतरी और सर्विस टैक्स की दर और दायरे में बढ़ोतरी शामिल है।17 सेवाओं को छोड़ बाकी सभी पर अब 10 के बदले 12 फीसदी की दर से टैक्स लगेगा। जाहिर है सब कुछ ठीक रहा तो आमदनी बढ़नी तो तय है।


टैक्स स्लैब में 2 लाख रुपये तक की छूट से करीब 2000 रुपये का फायदा होगा। जबकि बैंक में बचत खाते पर 10 हजार रुपये तक का टैक्स ब्याज टैक्स फ्री होगा। हालांकि इस रियायत का फायदा ग्राहकों के बदले बैंकों को ज्यादा होगा क्योंकि ग्राहक पोस्ट ऑफिस स्कीम की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे थे। बैंक लंबे समय से टैक्स फ्री बॉन्ड्स की मांग कर रहे थे ऐसे में उनके लिए सस्ता फंड जुटाने का ये आसान ज़रिया हो सकता है। सीनियर सिटीज़न्स को एडवांस टैक्स से राहत मिली है लेकिन इसे फायदा नहीं बल्कि सहूलियत माना जाएगा।


वित्त मंत्री चाहते तो टैक्स का बोझ बढ़ाए बिना भी लोगों को राहत दे सकते थे। वित्त मंत्री अगर कड़े कदम उठाते और गैर-जरूरी खर्चों को कम करते तो लोगों को राहत मिलती। लेकिन वित्त मंत्री ने कड़े कदम उठाने से परहेज किया। वित्त मंत्री ने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाने का जिक्र तो एक बार फिर किया गया। लेकिन फिर भी सरकार का सब्सिडी बिल काफी बड़ा होगा तेल, रसोई गैस और केरोसिन सब्सिडी की वजह से 43580 करोड़ रुपये का, फर्टिलाइजर सब्सिडी से 77794 करोड़ रुपये का, जबकि फूड सब्सिडी की वजह से 77000 करोड़ रुपये का बोझ आएगा। कुल मिलाकर सब्सिडी बिल करीब 196000 करोड़ रुपये के करीब होगा। सब्सिडी बोझ का ये आंकड़ा यही थमेगा ये कहना भी मुश्किल है क्योंकि बीते साल सब्सिडी बिल का आंकड़ा अनुमान से कहीं पीछे छूट गया था। सब्सिडी बिल बढ़ने का अनुमान इसलिए भी है क्योंकि सोनिया गांधी की पसंदीदा स्कीम फूड सिक्योरिटी बिल के लिए प्रावधान काफी कम किए गए हैं। जबकि ग्लोबल इकोनॉमी में रिकवरी आई तो कच्चे तेल के दाम बढ़ने से भी फ्यूल सब्सिडी पर दबाव बढ़ेगा।


मौजूदा अनुमानों के हिसाब से तेल कंपनियों की डीज़ल, रसोई गैस और केरोसिन तेल की सालाना अंडररिकवरी का आंकड़ा 1,40,000 करोड़ रुपये से ऊपर जा सकता है। अगर मौजूदा स्तर पर कच्चे तेल के भाव बने रहे तो ओएनजीसी, ऑयल इंडिया और गेल पर बोझ डालने के बाद भी फ्य़ूल सब्सिडी के लिए जो 43580 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है वो काफी कम है। अगर अंडररिकवरी की भरपाई के लिए डीजल की कीमतें बढ़ा दी जाएं साथ ही कंपनयां सर्विस टैक्स और एक्साइज ड्य़ूटी का सारा बोझ ग्राहकों पर डाल दें तो महंगाई में इजाफा होना तय है। ऐसा हुआ तो ब्याज दरों में कटौती की सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। जाहिर है रिजर्व बैंक गवर्नर डी सुब्बाराव ने ऐसे हालातों का अनुमान लगाते हुए ही गुरुवार की क्रेडिट पॉलिसी में ब्याज दरें नहीं घटाईं। मुमकिन है कि अप्रैल की क्रेडिट पॉलिसी में भी ब्याज दरें न घटें। 


घाटे को कम करने के मामले पर सरकार के लिए स्थिति आसान नहीं है। तेल कंपनियों को अभी डीजल पर प्रति लीटर 12.17 रुपये, केरोसिन पर 28.66 रुपये और रसोई गैस पर 439 रुपये की अंडररिकवरी झेलनी पड़ रही है। अगर सरकार अंडररिकवरी के आधे के बराबर भी दाम बढ़ाने की कोशिश करती है तो महंगाई दर कहां तक पहुंचेगी इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। यही नहीं ममता एंड कंपनी और विपक्ष भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देगा।


अगर कीमतें नहीं बढ़ती हैं तो वित्तीय घाटा फिर से बीते साल की तरह बेकाबू हो जाएगा। सरकार का वित्तीय घाटा कम हो या नहीं लेकिन महंगाई दर हर हाल में बढ़नी है। महंगाई बढ़ने का मतलब है कि इकोनॉमिक सर्वे में जिस 7.6 फीसदी की ग्रोथ का अनुमान लगाया गया है उसकी बलि चढ़ जाएगी।


महंगाई दर बढ़ने से सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ेगा जिसे शांत करने के लिए अमीरों के लिए महंगी कारों और प्लेटिनम पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी गई है। सिगरेट और बीड़ी पर टैक्स बढ़ा दिया गया है, लेकिन बजट का सारा गणित धुएं में जा सकता है। प्रणव दा का बजट न तो इधर का रहा न उधर का। इस बजट से वित्तीय घाटा कम करने में न तो कोई मदद मिलेगी और न ही इंडस्ट्री में निवेश को बढ़ाने के लिए कोई भरोसा पैदा होगा। कुल मिलाकर प्रणव मुखर्जी ने अपने हाथ से एक बड़ा मौका गंवा दिया है।


(ये लेख आर जगन्नाथन ने लिखा है, जो मनीकंट्रोल डॉट कॉम के एडिटर-इन-चीफ हैं)