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इंटरनेशनल इक्विटी फंड से जुड़ी अहम जानकारी

इंटरनेशनल फंडों से ना सिर्फ अच्छा रिटर्न मिलता है बल्कि बाजार के बुरे दौर में आपका पोर्टफोलियो भी बेहतर बना रहता है।
अपडेटेड Mar 31, 2012 पर 12:50  |  स्रोत : Moneycontrol.com

ज्यादातर निवेशकों को पोर्टफोलियो के डाइवर्सिफिकेशन की चिंता सताते रहती है। पोर्टफोलियो के डाइवर्सिफिकेशन की चिंता को दूर करने के लिए अब निवेशक इंटरनेशनल फंडों का सहारा ले सकते हैं। विकसित और विकासशील देशों में इंटरनेशनल फंडों की भरमार है।


बताना चाहेंगे कि साल 2008 और साल 2011 के दौरान बाजार के बुरे दौर में इमर्जिंग मार्केट की इक्विटी के मुकाबले विकसित मार्केट की इक्विटी ने अच्छा प्रदर्शन किया था। ऐसे में साफ जाहिर है कि इंटरनेशनल फंडों से ना सिर्फ अच्छा रिटर्न मिलता है बल्कि बाजार के बुरे दौर में आपका पोर्टफोलियो भी बेहतर बना रहता है।


आमतौर देखा गया है कि बाजार के अनिश्चितताओं भरे दौर में निवेशकों की रुचि विकसित देशों के इंडेक्स में बढ़ जाती है, जिससे म्यूचुअल फंड के जरिए निवेश कर फंड को हेज किया जा सकता है। वैसे ही अच्छे रिटर्न के लिए इमर्जिंग इक्विटियों में भी निवेश के लिए पुनर्विचार किया जा सकता है। गौरतलब है कि साल 2007, 2009, 2010 और 2012 के अच्छे दौर में इमर्जिंग मार्केट का प्रदर्शन बेहतर रहा है।


इंटरनेशनल फंडों से जुड़ा जोखिम


1. करेंसी का जोखिम


इंटरनेशल फंडों का निवेश विदेशी मुद्राओं में होता है, जिससे करेंसी का जोखिम बढ़ जाता है। हाल ही में देखा गया है कि इमर्जिंग मार्केट की करेंसियों के मुकाबले अमेरिकी डॉलर में ज्यादा बढ़त आई है, वहीं रुपया निचले स्तरों तक आ गया था।


2. देश से जुड़े राजनीतिक हालात


इंटरनेशनल फंडों की चाल हमेशा से उस देश पर आधारित होती है, जिसमें अर्थव्यवस्था और राजनीति की भूमिका काफी अहम होती है। कुछ इंटरनेशनल फंड केवल एक देश में ही निवेश करने पर ध्यानकेंद्रित करते हैं। लिहाजा अगर मान लीजिए कि उक्त देश में कोई संकट गहरा गया तो फंड के प्रदर्शन पर बुरा असर हो सकता है।


3. टैक्स से जुड़ा जोखिम


इंटरनेशनल फंड जो 65 फीसदी भारतीय इक्विटी में निवेश करते हैं और बाकी का निवेश अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में होता है जिसे इक्विटी फंड के रूप में भी जाना जाता है। इन फंडों पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के तहत 10 फीसदी की दर से वसूल जाता है लेकिन लॉन्ग टर्न कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स फ्री होता है।


इन सभी बातों पर गौर करने के बाद साफ जाहिर है कि इंटरनेशनल फंडों में निवेश करने पर निवेशकों का जोखिम कम होता ही है, साथ ही डाइवर्सिफिकेशन के जरिए रिटर्न भी अच्छे मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है। निवेशक अपने जोखिम के हिसाब से इमर्जिंग मार्केट या फिर विकसित देशों के इंटरनेशनल फंडों में निवेश करने की योजना बना सकते हैं।


इस लेख के लिए क्रिसिल रिसर्च की मदद ली गई है।