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तकनीकी विश्लेषण या फंडामेंटल्स - किस पर करें भरोसा?

शेयर बाजार में निवेश करने के वक्त तकनीकी या फंडामेंटल जानकारी की जगह, निवेश की अवधि को ध्यान में रखना जरूरी है।
अपडेटेड Aug 07, 2010 पर 15:17  |  स्रोत : Hindi.in.com

07 अगस्त 2010


सीएनबीसी आवाज़


 


निवेश करते समय किस पर भरोसा रखना चाहिए - तकनीकी विश्लेषण या फंडामेंटल्स। ये ऐसा सवाल है जो मुझसे एसेट मैनेजर होने की वजह से बार बार पूछा जाता रहा है।


 


आमतौर पर किसी भी कंपनी के शेयर पर जानकारों की राय को इन दो वर्गों में बांटा जाता है। जबकि, निवेश करने के वक्त तकनीकी या फंडामेंटल जानकारी की जगह, निवेशकों के लिए सबसे जरूरी ये जानना है कि वो कितनी लंबी या छोटी अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं। अगर निवेश कम समय के लिए है या आपका उद्देश्य शेयरों की खरीद-फरोख्त से मुनाफा कमाना है, तो आपके लिए तकनीकी विश्लेषण के आधार पर निवेश करना ठीक रहेगा। क्योंकि किसी भी कंपनी की मूलभूत (फंडामेंटल) जानकारी में हर रोज में बदलाव नहीं आता है।


 


एक कारोबारी दिन के दौरान शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव शेयरों के वॉल्यूम, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में कारोबार जैसे तकनीकी कारणों की वजह से दिखाई देता है। अगर लंबे समय की बात है तो उसमें तकनीकी विश्लेषण काम नहीं आता है। एक साल से ज्यादा अवधि में क्या शेयर बाजार में बदलाव को समझने और पूर्वानूमान लगाने में देश की आर्थिक स्थिति, महंगाई, विश्वीय अर्थव्यवस्था के हालात को मद्देनजर रखना होता है। वैसे ही कंपनी की बिक्री, मुनाफा, प्रबंधन जैसी मूलभूत वातों का असर कंपनी के शेयरों में दिखता है।


 


ज्यादातर निवेशक एक हफ्ते से ज्यादा और एक साल से कम की अवधि के लिए शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं। कई लंबे अवधि निवेशक भी महीने के महीने अपने पोर्टफोलियो (निवेश) पर मिल रहे रिटर्न को देखते रहते हैं और निवेश में बार बार बदलाव करने की गलती कर बैठते हैं। छोटी अवधि के निवेशक तो अपने पोर्टफोलियो बदलने के पहले एक दिन या ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता रुक पाते हैं।



ऐसे में निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि शेयर खरीदने का मतलब उस कंपनी के एक छोटे हिस्से को खरीदना है। अगर सिर्फ शेयर के चढ़ने-उतरने पर भरोसा करके किया गया निवेश काफी जोखिम भरा हो सकता है। ऐसी बात नहीं है कि तकनीकी जानकारी से किए गए निवेश से नुकसान हो सकता है। कई बार, कंपनियां व्यवसाय को नहीं बढ़ाती हैं, जिससे उनके शेयर असल से कम भाव पर रह जाते हैं। लेकिन, ऐसे शेयरों के भाव में सुधार की संभावनाएं काफी होती हैं।




अगर कंपनी के शेयरों पर फंडामेंटल्स का ही असर होता है, तो फिर तकनीकी विश्लेषण की क्या जरूरत है? तकनीकी विश्लेषण का बोलबाला ब्रोकरों द्वारा किया जाता रहा है। शेयर बाजार में सट्टेबाजी करने के लिए तकनीकी विश्लेषण काफी है। और निवेशक बिना सोचे समझे तकनीकी राय पर अमल करने की भूल कर बैठते हैं। फंडामेंटल विश्लेषण के लिए काफी समय और कुशलता की जरूरत होती है।



इन दिनों पिछले अनुभवों के आधार पर शेयरों का तकनीकी विश्लेषण किया जाता है, जिसकी आने वाले समय के लिए उपयोगिता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। जबकि, फंडामेंटल विश्लेषण के सिद्धांत बार-बार सफलतापूर्वक इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जैसे, जिन कंपनियों के अच्छे बिक्री के आंकड़ें, बढ़िया मुनाफा, पर्याप्त नकद और सक्षम प्रबंधन होते हैं, वो कंपनियां साल दर साल अपने निवेशकों को अच्छा रिटर्न देने में कामयाब रहती हैं।


 


जब तकनीकी विश्लेषण के सिद्धांत 10-15 साल के लिए कार्यरत साबित होते हैं, तभी तकनीकी विश्लेषण पर पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है। तब तक फंडामेंटल्स पर भरोसा करना ही अकलमंदी का काम है।

लेखिका राधिका गुप्ता, प्रमाणित क्वाटिटेटिव इंवेस्टमेंट मैनेजर और वेल्थ एडवाइजर होने के साथ फोरफ्रंट कैपिटल की सह-संस्थापक और डायरेक्टर हैं। आप उन्हें radhika.gupta@forefrontcap.com पर संपर्क कर सकते हैं।