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निवेशकों के लिए डेट फंड की जानकारी

डेट म्यूचुअल फंड में विभिन्न तरह के बॉन्ड या डिपॉजिट में निवेश करके निवेशकों के लिए रिटर्न मिलता है।
अपडेटेड Jun 25, 2013 पर 13:19  |  स्रोत : Moneycontrol.com

पिछला वित्त वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ खास नहीं रहा क्योंकि कंपनियों की कमाई में गिरावट आई. निवेश में कटौती हुई, करेंट अकाउंट घाटा काफी बढ़ा और जीडीपी में गिरावट एक दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। इन चिंताओं के साथ ही महंगाई, करेंसी में उतार चढ़ाव और सरकारी आर्थिक नीतियो में अस्थिरता और वैश्विक मोर्चे पर अनिश्चितता के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफी मुश्किल दौर बन गया।


पिछले साल ब्याज दरों में 1 फीसदी की कमी आई और लगता है कि ये मौजूदा स्तरों पर बनी रहेंगी। इसके चलते बॉन्ड स्कीमें बेहतर कर सकती हैं। इस समय किन बॉन्ड स्कीमों में पैसा लगाना सही रहेगा। बॉन्ड स्कीम उन निवेशकों के लिए होती हैं जो अन्य सुरक्षित निवेश विकल्प जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट से थोड़ा ज्यादा रिटर्न चाहते हों।


जब ब्याज दरें ऊपर चढ़ती हैं तो बॉन्ड कीमतें नीचे आती हैं और जब ब्याज कीमते नीचे जाती हैं तो बॉन्ड कीमतें ऊपर चढ़ती हैं। लेकिन अगर ब्याज दरों में कोई बदलाव ना हो तो बॉन्ड मौजूदा ब्याज दरों या यील्ड के मुताबिक रिटर्न देते हैं। इस समय बाजार की स्थिति इसी प्रकार की है जिससे ये समय बॉन्ड में निवेश करने के लिए अच्छा समय है। इसके लिए सबसे पहले डेट फंड के बारे में कुछ आधारभूत बातें जान लें।


डेट म्यूचुअल फंड में विभिन्न तरह के बॉन्ड या डिपॉजिट में निवेश करके निवेशकों के लिए रिटर्न मिलता है। इसमें मुख्य तौर पर पैसा उधार रखा जाता है और उस उधार रखे गए पैसे पर ब्याज मिलता है।


इसी तरह निवेशक भी अपना पैसा फिक्स्ड डिपॉजिट में डालकर रखते हैं। जब आप बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट करते हैं तो आप अपना पैसा बैंक को देते हैं। डेट फंड को समझने का यही सबसे अच्छा तरीका है कि उन्हें भी बॉन्डों में निवेश करने से ब्याज मिलता है।


एफडी की तरह ही म्यूचुअल फंड बॉन्डों में निवेश करते हैं जो शेयरों की तरह खरीदे बेचे जा सकते हैं। जिस तरह शेयर बाजार में शेयर की खरीद फरोख्त होती है उसी तरह डेट मार्केट होता है जहां कई तरीके के बॉन्ड खरीदे बेचे जाते हैं। डेट बाजार में बॉन्ड की कीमत चढ़ती गिरती रहती है ठीक उसी तरह जैसे शेयर बाजार में होता है। अगर एक म्यूचुअल फंड एक बॉन्ड खरीदता है और इसकी कीमत चढ़ती जाती है तो इससे रकम बढ़ती जाती है जो कि ब्याज की आय से कहीं ज्यादा होती है। इसके चलते निवेशकों को ज्यादा बेहतर रिटर्न मिलते हैं।


लेकिन बॉन्ड कीमतें ऊपर नीचे क्यों जाती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ब्याज दरों में परिवर्तन होना है। या ब्याज दरों में होने वाले बदलाव की उम्मीद इसकी वजह होता है। मान लीजिए कि एक बॉन्ड 9 फीसदी सालाना का ब्याज अदा करता है। इसके बाद अर्थव्यवस्था में गिरावट आती है और नए बॉन्ड 8 फीसदी की दर से ब्याज देना शुरु करते हैं। इसलिए पुराने बॉन्ड पर पहले के मुकाबले अब ज्यादा रिटर्न मिलेगा। आखिरकार इसमें निवेश किए गए पैसे पर ज्य़ादा रकम मिल पाएगी और इसकी कीमत बढ़ जाएगी। म्यूचुअल फंड जिसने इस बॉन्ड में निवेश किया है उसे इसे बेचने पर इससे ज्यादा मुनाफा मिल पाएगा। और इसका विपरीत होगा जब ब्याज दरें बढ़ती है। डेट फंड में निवेश के जरिए आप बॉन्ड कीमतों में होने वाले उतार चढ़ाव से आप अपने पोर्टफोलियो के रिटर्न को बढ़ा सकते हैं।


पारंपरिक तौर पर फिक्स्ड डिपॉजिट एक सुरक्षित और गारंटीड रिटर्न वाला निवेश उत्पाद है। लेकिन फिक्स्ड डिपजिट के गारंटीड रिटर्न के आराम के अलावा डेट फंड सभी उम्र के निवेशकों के लिए कहीं बेहतर निवेश उत्पाद है। डेट फंड में लिक्विडिटी के रुप में एक अतिरिक्त लाभ मिलता है और रिटर्न भी बेहतर मिलते हैं। ब्याज दरों में गिरावट लंबी अवधि के गिल्ट और इंकम फंड के लिए अच्छा रहेगा। जिन निवेशकों का निवेश काल 1 से ज्य़ादा हो उनके लिए सही तरह से प्रबंध किए हुए गिल्ट फंड और इंकम फंड अच्छा प्रदर्शन करते हैं। वो निवेशक जिनका निवेश लक्ष्य 6 महीने से ज्यादा हो उन्हें अल्ट्रा शॉर्ट टर्म फंड में निवेश करना चाहिए जिनका मैच्योरिटी समय 3-6 महीने होता है। अपनी छोटी अवधि के चलते इन फंडो में निचली ब्याज दरों का जोखिम कम होता है। जो निवेशक 1 साल से ज्यादा समय के लिए निवेश करना चाहते हैं वो छोटी अवधि के फंड में निवेश कर सकते हैं जो कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश करते हैं। ऐसे ज्यादतर फंडों की मैच्योरिटी 2-3 साल में होती है। 


लंबी अवधि के गिल्ट और इंकम फंड ने पिछले 1 साल में 10 फीसदी से ज्यादा रिटर्न दिया है। जबकि शॉर्ट टर्म फंड भी पीछे नहीं हैं।


ये लेख जुजर गाबजीवाला ने लिखा है जो वेंचुरा सिक्योरिटीज लिमिटेड के डायरेक्टर हैं।