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सीसीआई के रडार पर नामी गिरामी बिल्डर

कॉम्पिटीशन कानून तोड़ने का आरोप साबित होने पर बिल्डरों पर भारी जुर्माना लग सकता है।
अपडेटेड Sep 06, 2013 पर 19:40  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अगर आप घर खरीदना चाहते हैं तो शायद आपके पास बिल्डर के इशारों पर नाचने के सिवाए कोई चारा नहीं है। आपको बिल्डर के साथ वही कॉन्ट्रैक्ट साइन करना होगा, जिसमें छोटी सी गलती के लिए ग्राहक को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। जबकि, बिल्डर की जवाबदेही कुछ भी नहीं। लेकिन कुछ जागरुक ग्राहक देश की नामी गिरामी कंपनियों डीएलएफ, एलएंडटी और जेपी के खिलाफ केस लड़ रहे हैं, जिसमें बिल्डरों पर अपने प्रभाव को इस्तेमाल करके बाजार में कॉम्पिटिशन करीब-करीब खत्म करने और ग्राहकों को नुकसान पहुंचाने का आरोप है। यही नहीं, बहुत से और भी बड़े बिल्डर इस जांच के दायरे में हैं। कॉम्पिटीशन कानून तोड़ने का आरोप साबित होने पर इन बिल्डरों पर भारी जुर्माना लग सकता है।


नोएडा और ग्रेटर नोएडा के ग्राहकों की शिकायत पर कॉम्पिटिशन कमीशन की जांच में जेपी एसोसिएट्स पर लगे कई आरोपों को सही पाया गया है और अब सीसीआई ने मामले की फाइनल सुनवाई शुरू कर दी है। सीसीआई को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में सामने आया कि बिल्डर ने ग्राहकों को हाउसिंग प्रोजेक्ट की पूरी और सही जानकारी नहीं दी थी। जांच में जेपी के रवैये को कॉम्पिटिशन के खिलाफ और कंज्यूमर को नुकसान पहुंचाने वाला माना गया है। हालांकि, जांच में जेपी ग्रुप के खिलाफ प्रभावशाली स्थिति के दुरूपयोग का आरोप साबित नहीं हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक बिल्डर ने ग्राहक को बिल्डिंग के नक्शे की सही जानकारी नहीं दी थी और कंसट्रक्शन के दौरान बिना बताए बदलाव किए गए। ब्रोशर के मुताबिक जेपी को 24 फ्लोर बनाने थे। लेकिन बना दिए 30 फ्लोर। इस तरह बिल्डर ने 25 फीसदी ज्यादा कंस्ट्रक्शन किया। ऐसा ही किस्सा डीएलएफ के मैगनोलिया प्रोजेक्ट का भी है।


जेपी एसोसिएट्स और जेपी इंफ्राटेक के खिलाफ ये मुकदमा जेपी ग्रीन्स नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कुछ फ्लैट मालिकों ने 2012 में दायर किया था। उनका आरोप है कि वो बिल्डर के साथ एक तरफा कॉन्ट्रैक्ट साइन करने के लिए मजबूर हैं। एग्रीमेंट की शर्ते एकतरफा हैं। चाहे वो ग्राहक से पूछे बगैर प्रोजेक्ट की जमीन पर दूसरी बिल्डिंग बनाने की बात हो। या फिर बिना पूछे चार्ज या प्लान बदलने की आजादी। ग्राहकों का कहना है कि बिल्डर ने बुकिंग के समय सब जानकारी नहीं दी। मेटेनेंस डिपॉजिट, क्लब मेंबरशिप फी जैसी चीजें बाद में जोड़ी गईं। जानकारों का कहना है कि ग्राहकों को फ्लैट खरीदते वक्त इस बारे में काफी सावधान रहना चाहिए। 


जेपी, एलएंडटी के बाद यूनिटेक, पार्श्वनाथ और ओमैक्स समेत तमाम कंपनियों के खिलाफ कॉम्पिटिशन कमीशन की जांच जल्द पूरी होने वाली है। सूत्रों के मुताबिक कमीशन ने अभी तक की जांच में पाया है कि यूनिटेक, पार्श्वनाथ और ओमैक्स समेत तमाम बड़े बिल्डर्स और बिल्डर्स की संस्था क्रेडाई के सदस्य कार्टेल बना कर ग्राहकों से ऐसे एग्रीमेंट कर रहे हैं जिससे ग्राहकों को नुकसान हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक जेपी ग्रीन्स के खरीदार सीसीआई से दोबारा जांच कराने की मांग भी कर रहे हैं। कुछ ही दिन पहले एलएंडटी के बैंगलौर साउथ सिटी प्रोजेक्ट के ग्राहकों ने भी बिल्डर के खिलाफ प्रभावशाली स्थिति के दुरूपयोग के आरोप की दोबारा जांच की मांग की है। डीजी ने जांच के बाद ये केस बंद कर दिया था। इन बड़े बिल्डरों के परेशान ग्राहक भी डीएलएफ की तर्ज पर ही कार्रवाई की उम्मीद में कॉम्पिटिशन कमीशन के पास पहुंचे में हैं। दो साल पहले कमीशन ने डीएलएफ बेलेयर और पार्क प्लेस और मेगनोलिया के लोगों के दायर किए हुए ऐसे ही एक मामले में डीएलएफ पर 630 करोड़ रुपये की पेनल्टी लगाई थी। उस फैसले के खिलाफ अपील कॉम्पिटिशन एपलेट ट्रिब्यूनल में है।


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