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Budget 2019: ज्ञान, विज्ञान और राजनीति का संगम है इकोनॉमिक सर्वे-2019

सुब्रमण्यिन ने पौराणिक कथाओं के जरिए सामाजिक बदलाव का एजेंडा पेश किया है।
अपडेटेड Jul 04, 2019 पर 18:45  |  स्रोत : Moneycontrol.com

(Gaurav Chaudhary- Deputy Executive Editor at Moneycontrol)


लिटरेचर सिर्फ सॉनेट्स (14 पंक्तियों की कविता) तक ही सीमित नहीं है। शास्त्र का दायरा सिर्फ नैतिकता भरी बातों तक ही नहीं है। विज्ञान के मायने सिर्फ लैबोरेटरी ट्रायल से नहीं है। जटिल मानव बर्ताव को सिर्फ मनोविज्ञान के आइने से नहीं देखना चाहिए। और क्यों नैतिकता का सवाल सिर्फ एकेडमिक फिलॉस्फिकल बातचीत तक ही सीमित रहना चाहिए।


उपनिषद से लेकर चक्र संहिता, कौटिल्य से लेकर महात्मा गांधी, डेंग ज़ाओपिंग से लेकर एडम स्मिथ और जॉन मेनार्ड केंस और  चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर कृष्णमूर्ति वी सुब्रमण्यिन ने अपने पहले आर्थिक सर्वेक्षण में समसामयिक थिंकर्स के साथ प्राचीन बातों की जानकारी का बेहतरीन उदाहरण दिया है।    


कृष्णमूर्ति का आर्थिक सर्वे 2 वॉल्यूम और 21 चैप्टर में है। सर्वे की प्रस्तावना में सर आइजैक न्यूटन को उद्धरित किया गया है। न्यूटन ने कहा था, If I have seen further than others, it is by standing upon the shoulders of giants”. इसके मायने हैं कि अगर मैं औरों की अनदेखी करके आगे की और देखता हूं तो लगता है कि जमीन नहीं आसमान की तरफ देखकर चल रहा हूं।


आर्थिक सर्वे की कॉपी का रंग नीला है। इस रंग के बारे में मानना है कि यह नीले आसमान को दर्शा रहा है। सुब्रमण्यन ने मेनस्ट्रीम के अर्थशास्त्रियों के संतुलन साधने के तरीकों पर सवाल उठाया है। उनकी दलील है कि अब पुराने तरीकों से हटकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। Shifting Gears: Private Investment as the Key Driver of Growth, Jobs, Exports and Demand”, टाइटल वाले चैप्टर में उन्होंने फ्रेड्रिक वॉन हायक के एक बयान का जिक्र किया है। हायक को 1974 में नोबेल पुरस्कार मिला था।


हायक ने कहा था, यदि मनुष्य को सामाजिक-सुधार प्रयासों में औचित्य से अधिक आहत नहीं करना हो तो उसे यह सीख मिलेगी कि इसमें, जैसा कि हर क्षेत्र में होता है जिनमें एक संगठित प्रकार की अनिवार्य जटिलता की स्थिति रहती है। वह उस पूर्ण ज्ञान को हासिल नहीं कर सकता जो उसे घटनाओं का विशेषज्ञ बना सके। इसलिए उसे उसी ज्ञान का उपयोग करना होगा जो वह प्राप्त कर सकता है। परिणामों को वह स्वरूप प्रदान करने के लिए नहीं जो शिल्पकार अपनी कलाकृति को आकार देने के लिए करता है। बल्कि एक ऐसी रीति से समुचित वातावरण मुहैया कराते हुए विकास को आगे ले जाता है जैसे कोई माली अपने पौधों को बढ़ाने के लिए करता है। 


हायक के इस उद्धरण से साफ है कि ब्लूप्रिंट की शुरुआत इस दर्शन से होता है कि अर्थव्यवस्थाएं विस्तृत रूप में एक दूसरे से गुंथी हुई हैं। इसलिए इन्हें न तो कोठरियों के तौर पर सार्थक रूप में देखा जा सकता है और ना ही समय के साथ गतिमान प्रभावों का जिक्र किए बगैर इनका विश्लेषण किया जा सकता है।


एक अन्य चैप्टर में Homo Economicus: Leveraging the Behavioural Economics of “Nudge”,” में सुब्रमण्यिन ने महाभारत का उद्धरण किया है। इसमें लिखा है केवल तर्कपूर्ण चिंतन को ही परम सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह भी पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं है। वास्तविक लोगों के निर्णय पारंपरिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अव्यवहारिक मशीनी जानकारों से हटकर होते हैं।


एक अलग बॉक्स में -कर चोरी, विलफुल डिफॉल्ट और पवित्र दायित्व के सिद्धांत का जिक्र किया है। इसमें सुब्रमणियन ने लिखा है कि हिंदू धर्म में कर्ज ना चुकाना पाप और अपराध है। शास्त्रों में लिखा है अगर कोई व्यक्ति कर्ज नहीं चुका पाता और उसकी मौत हो जाती है तो उसकी आत्मा को मुश्किल होती है। इसलिए यह उनके बच्चों का दायित्व होता है कि वे ऐसी बुराइयों से बचाएं। अपने मृत माता पिता के कर्ज चुकाने का कर्तव्य या दायित्व एक समाजिक सिद्धांत पर आधारित है जिसे पवित्र दायित्व का सिद्धांत कहते हैं।  


इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद ने कहा है, अल्लाहुम्मानिया, ऊधीबिका मिन अल-मा, थमवा, ल-मघरम। इसका मतलब है कि या अल्लाह ताला मैं पाप और भारी कर्ज से बचने के लिए तुम्हार शरण में आना चाहता हूं। कोई भी व्यक्ति स्वर्ग में तब तक प्रवेश नहीं कर सकता जब तक उसका कर्ज ना चुक जाए।


उसके समूचे धन का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जा सकता है। अगर धन पर्याप्त नहीं है तो मृतक का एक या एक से ज्यादा वारिस स्वेच्छा से कर्ज चुका सकता है।


बाइबिल में कहा गया है कि दूसरों को प्रेम करने के कर्ज के अलावा किसी भी तरह का कर्ज बाकी ना रहने दे। रोमन 13:8, दुष्ट उधार लेता है और चुकाता नहीं है और धार्मिक व्यक्ति दया दिखाता है और देता है। स्रोत 37:21


सुब्रमण्यिन ने पौराणिक कथाओं के जरिए सामाजिक बदलाव का एजेंडा पेश किया है। इनमें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से लेकर BADLAV (बेटी आपकी धन लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी), स्वच्छ भारत से सुंदर भारत, LPG सब्सिडी छोड़ने और कर देने के लिए प्रोत्साहित किया है।


अर्धनारीश्व-भगवान शिव का आधा पुरुष और आधी नारी का स्वरूप, महिला पुरुष की समानता को दिखाता है। ऋग्वेद में अनेक महिला संतों को ज्ञान और दूरदर्शिता का खजाना माना गया है। महान विदुषी गार्गी, जिन्होंने अपनी वैदिक भजनावली में सभी की उत्पति पर सवाल उठाया है। महात्मा अगत्स्य और उनकी पत्नी लोपमुद्रा के बीच लंबी दार्शनिक बातचीत की पौराणिक कथाएं हैं। प्राचीन समाज में पुरुषों को उनकी मांओं के नाम से जाना जाता है। जैसे यशोनंदन, कौशल्या नंदन, गंधारी पुत्र और पुरुषों को उनकी पत्नियों के नाम से जाना जाता है। जैसे जानकी रमन, राधाकृष्ण।


सुब्रमण्यिन ने स्वच्छ भारत से सुंदर भारत से स्वस्थ भारत का जिक्र किया है। उन्होंने चरक संहिता का भी उद्धरण किया है। उन्होंने ऋग्वेद का जिक्र करते हुए लिखा है कि सभी सजीव-निर्जिव चीजों की आत्मा सूरज है। यह भी साफ है कि वेलफेयर योजनाओं के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जूरूरी है। नरेगा इसका साफ उदाहरण है।