Moneycontrol » समाचार » कंपनी समाचार

को-लोकेशन स्कैम: NSE पर 1000 करोड़ का जुर्माना, जानिए क्या है यह स्कैम?

सेबी ने 625 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है. इस पर 5 साल के लिए 12 फीसदी इंटरेस्ट भी चुकाना होगा
अपडेटेड May 01, 2019 पर 13:53  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

बाजार रेगुलेटर सेबी ने मंगलवार को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE को को-लोकेशन स्कैम में ड्यू डिलिजेंस ना करने का दोषी पाया है। ड्यू डिलिजेंस के मायने बहीखातों की ऑडिटिंग से है। सेबी ने एक्सचेंज पर 625 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही पिछले पांच सालों के लिए 12 फीसदी इंटरेस्ट भी चुकाना होगा।


अगर सिंपल इंटरेस्ट के हिसाब से भी यह रकम जोड़े तो कुल 1000 करोड़ रुपए होते हैं। अगर कंपाउंड इंटरेस्ट के हिसाब से जोड़ें तो कुल रकम 1300 करोड़ रुपए होगी।


सेबी के ऑर्डर के मुताबिक, अगले 6 महीनों तक NSE कैपिटल मार्केट से दूर रहेगी। यानी कोई पब्लिक इश्यू या नए प्रोडक्ट लॉन्च नहीं करेगी। इसका मतलब है कि NSE के IPO लाने की योजना भी 6 महीने के लिए टल गई। सेबी ने कहा है कि अगले 45 दिनों के भीतर NSE को जुर्माना जमा कराना होगा।


सेबी ने अपनी जांच में NSE के मैनेजिंग डायरेक्टर रवि नारायण और चित्रा रामकृष्णा दोनों को दोषी पाया है। मार्केट रेगुलेटर ने दोनों को अगले 3 साल तक किसी लिस्टेड कंपनी या मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर से दूर रहने की हिदायत दी है। साथ ही नारायण को फिस्कल ईयर 2011 से लेकिर फिस्कल ईयर 2013 के बीच मिली सैलरी का 25 फीसदी इनवेस्टर प्रोटेक्शन फंड में देना होगा। वहीं रामकृष्णा को फिस्कल 2014 की सैलरी का 25 फीसदी फंड में जमा करना होगा।  


क्या है मामला?


NSE पर आरोप है कि उसने अपने कुछ ब्रोकर्स का सर्वर NSE के सर्वर के पास लगाया। कंपनी ने तकनीकी स्तर पर कुछ ऐसे बदलाव किए जिससे एक्सचेंज की जानकारी सबसे पहले इन ब्रोकर्स के सिस्टम पर आती थी।


NSE ने अपने मेंबर्स के लिए 2010 में को-लोकेशन फैसिलिटी शुरू की थी। इस सर्विस के तहत एक्सचेंज के सर्वर के नजदीक ब्रोकर्स के सिस्टम लगाए जाते थे। यह पूरा सेटअप इस तरह लगाया जाता था कि यह सर्विस लेने वाले ब्रोकर्स के सिस्टम 10 गुना ज्यादा तेजी से चलते थे। लिहाजा ये ब्रोकर्स 1 सेकेंड से भी कम वक्त में एक्सचेंज पर हजारों ऑर्डर एग्जिक्यूट कर देते थे।  जिन ब्रोकर्स ने यह सुविधा नहीं ली थी उन्हें मार्केट की जानकारी देर से मिलती है।


सेबी ने अजय शाह को निर्देश दिए हैं कि वह दो साल तक किसी मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी ने ना जुड़े और ना ही एक्सचेंज में कोई पोजीशन ले। अजय शाह ही वह ब्रोकर हैं जिसे सर्वर को-लोकेशन का फायदा मिला।


सेबी ने इंफोटेक फाइनेंशियल्स से जुड़े सुनीता थॉमस और कृष्णा दागली को भी 2 साल तक किसी मार्केट कंपनी से दूर रहने को कहा है। इन पर आरोप है कि इन्हें NSE से कुछ खास जानकारियां मिलीं लेकिन इन्होंने उसे मार्केट प्लेयर्स को नहीं दी और सिर्फ खुद फायदा उठाया।


उधर एनएसई के सीईओ विक्रम लिमये का कहना है कि सेबी के आदेश से बाजार के कामकाज पर असर नहीं पड़ेगा। एनएसई पर 6 महीने तक नए डेरिवेटिव लॉन्च नहीं कर पाएंगे और भारतीय बाजार पर ग्लोबल निवेशकों का भरोसा बना रहेगा। लिमाये के मुताबिक एनएसई के सामने सभी कानूनी विकल्प खुले हैं। एनएसई अगले 6 महीने तक आईपीओ नहीं ला पाएगी।