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कोयले के सम्राटः पाब्लो एस्कोबार की याद दिला देगी अनूप मांझी और जॉयदेब मंडल की ये कहानी

लंबे वक्त से फरार चल रहे अवैध कोयले के खनन का धंधा करने वाले अपराधी केंद्रीय एजेंसियों के शिकंजे में आ गए हैं। इनसे गुप्त ठिकाने पर पूछताछ जारी है। यहां हम अनूप मांझी और जॉयदेब मंडल के मामूली कोयला चोर से लेकर हजारों करोड़ रुपये के अवैध कोयला खनन और दूसरे कारोबारों का साम्राज्य खड़ा करने की कहानी बता रहे हैं। इन दोनों की सल्तनत में लाखों लोग अपनी रोजी-रोटी कमा रहे थे। फर्जी कंपनियों के जाल, संदेहजनक कारोबारों की आड़ में पुलिस और नेताओं को मोटी घूस के जरिए ये दोनों बेफिक्र होकर पूरे देश में अपने कारोबारी साम्राज्य को फैलाए हुए थे
अपडेटेड Nov 27, 2020 पर 20:38  |  स्रोत : Moneycontrol.com

शांतनु गुहा रे


बंगाल के भगोड़े कोल डीलर अनूप मांझी और उनके दाहिने हाथ जॉयदेब मंडल से फिलहाल अलग-अलग जांच एजेंसियां किसी गुप्त ठिकाने पर पूछताछ कर रही हैं। इन दोनों से इनके अवैध खनन में कथित तौर पर शामिल होने और अपने संदेहजनक कारोबारों को पाकसाफ दिखाने के लिए फर्जी कंपनियां चलाने के आरोपों को लेकर पूछताछ की जा रही है। अनूप मांझी को उनके दोस्त लाला के नाम से बुलाते हैं।


पिछले हफ्ते केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और डायरेक्टेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई) ने कोलकाता में मांझी के 20 दफ्तरों पर छापे मारे थे। इसके अलावा धनबाद, पुरुलिया और आसनसोल में भी उनके दफ्तरों पर छापे पड़े थे।


एजेंसियों का दावा है कि उन्हें ऐसे दस्तावेज मिले हैं जिनसे साबित होता है कि मांझी और मंडल दोनों ही कोयले के एक अवैध साम्राज्य के मालिक हैं। एजेंसियों का कहना है कि इनका साम्राज्य 20,000 करोड़ रुपये का है।


अधिकारियों ने मनीकंट्रोल को बताया है कि ये दोनों गुजरे करीब 14 साल से फरार थे और 2006 के बाद से ही पुलिस के लगातार छापों से बचकर निकल जाते थे। हर बार जब भी पुलिस आती थी, ये दोनों विदेश चले जाते थे। अधिकारियों का कहना है कि ये दोनों ही कभी कुआलालंपुर, कभी सिंगापुर, बर्लिन, म्यूनिख, जिनेवा, लंदन तो कभी दुबई भाग जाते थे।


लेकिन, इस बार एसपी असीम विक्रांत मिंज की अगुवाई में धनबाद के पुलिस की टीम ने इन्हें पकड़ने के लिए एक दिलचस्प जाल बुना। मिंज ने इन दोनों का पीछा नहीं किया, बल्कि उन्होंने मांझी और मंडल के लिए काम करने वाले लोगों को निशाना बनाया।


मिंज और उनकी टीम ने एशिया की सबसे पुरानी सड़कों में से एक जी टी रोड पर एक फर्जी ट्रैफिक जाम तैयार किया। जी टी रोड बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को जोड़ती है।


पुलिसवालों ने आसनसोल, दुर्गापुर और धनबाद की खानों से अवैध कोयले की ढुलाई करने वाली गाड़ियों का इंतजार किया। जब ये गाड़ियां नजदीक आ गईं तो पुलिस ने इनके ड्राइवरों और क्लीनर्स को अरेस्ट कर लिया और इन गाड़ियों को जब्त कर लिया गया।


यह घटनाक्रम 19 अक्तूबर 2020 को हुआ। इन गाड़ियों के ड्राइवरों ने पूरी कहानी उगल दी। इन्होंने मांझी और मंडल के चलाए जा रहे अवैध खनन कारोबार का ब्योरा पुलिस को दे दिया। इसकी अगली शाम मांझी और मंडल के यहां तीन जांच एजेंसियों के 50 से ज्यादा अफसरों ने छापा मारा। इस छापेमारी में करीब 40 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियां और नकदी बरामद की गई।


सीबीआई के एक प्रवक्ता ने कहा, “ये लोग सहयोग कर रहे हैं और इनसे अभी भी पूछताछ चल रही है।”


सीबीआई के सूत्रों ने मनीकंट्रोल को बताया है कि मांझी ने एक लिखित बयान में स्वीकार किया है कि वे बंगाल में प्रभावशाली राजनेताओं को नियमित तौर पर मोटी रकम पहुंचाया करते थे ताकि उनका कारोबार बिना किसी अड़चन और दिक्कत के चलता रहे। मांझी ने यह भी बताया है कि वे और मंडल ऐसा दो दशक से ज्यादा वक्त से कर रहे हैं।


इस स्वीकारोक्ति में कथित तौर पर कहा गया है कि वे बड़ी संख्या में राजनेताओं से मेलजोल रखते थे। वे जिला स्तर के नेताओं से लेकर राजनीतिक पार्टियों के हाई कमांड तक के नेताओं के साथ बनाकर रखते थे।


सूत्रों ने कहा, “हम अभी भी उनके खाते देख रहे हैं और कंप्यूटरों से रिकॉर्ड्स को खंगाला जा रहा है। ऐसा अनुमान है कि ये लोग बंगाल के कुछ बड़े नेताओं को हर महीने 100 से 150 करोड़ रुपये देते थे।”


कृष्ण मुरारी कोयल के पदचिन्हों पर


अवैध कायला खनन के धंधे में मांझी और मंडल के तेज रफ्तार से ऊंचाई पर पहुंचने को बंगाल में बहुत सारे लोग एक और अवैध कोयला डीलर कृष्ण मुरारी कोयल के पतन के तौर पर देखते हैं। कृष्ण मुरारी को उनके यार-दोस्त बिल्लू के नाम से जानते हैं। जनवरी 2019 में गैर लाइसेंसी हथियार रखने के आरोप में कोयल को दुर्गापुर के कांस्का में गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद से ही वे बंगाल के नेताओं की नजर से उतर गए।


गिरफ्तार होने तक कोयल एक शक्तिशाली शख्स थे और यहां तक कि बंगाल सरकार के विदेशी निवेश आकर्षित करने के मकसद से सिंगापुर गए प्रतिनिधिमंडल में भी वे शामिल थे। कोयल के खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें कोयले की चोरी और इसका अवैध खनन करने जैसे आरोप शामिल हैं।


माना जाता है कि वे आयरन ओर के अवैध खनन और रियल एस्टेट कारोबार में भी लिप्त हैं। इसके अलावा टॉलिवुड की फिल्मों में पैसा लगाने के लिए भी वे मशहूर रहे हैं।


आसनसोल के लोगों का कहना है कि जब मुकुल रॉय टीएमसी में थे तब कोयल उनके काफी नजदीक थे, लेकिन रॉय के बीजेपी में शामिल होने के बाद से कोयल का खेल गड़बड़ा गया।


कोयल की धंधे पर पकड़ कमजोर होने के साथ ही मांझी और मंडल ने इस साम्राज्य पर पकड़ बनानी शुरू कर दी। हालांकि, ये दोनों भी काफी लंबे वक्त से इस धंधे में थे।


गरीबी में बीता बचपन


सूत्रों ने बताया कि मांझी और मंडल दोनों की ही परवरिश आसनसोल के सालानपुर इलाके में हुई है। लाला की उम्र अभी करीब 42 साल है। उनका जन्म बेहद गरीब परिवार में हुआ था। उनके परिवार में चार भाई और तीन बहनें थीं। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के रघुनाथपुर सबडिवीजन के नेतुरिया ब्लॉक में एक छोटा से कस्बे परबेलिया में उनका जन्म हुआ था। इस कस्बे की आबादी करीब 5,000 थी।


मांझी ने अपने कस्बे में एक मछली के वेंडर के तौर पर काम शुरू किया। लेकिन, वे परबेलिया में कुछ बड़ा करना चाहते थे। परबेलिया एक कोल माइनिंग इलाका है। उन्होंने कुछ पूंजी इकट्ठी की और अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर कोल ब्रिकेट मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री डाली।


कोल ब्रिकेट्स का इस्तेमाल पुरुलिया के देहाती इलाकों में ईंधन के तौर पर होता है। ब्रिकेट फैक्ट्री दरअसल इस पूरे कारोबार में उतरने का एक जरिया थी और यह मांझी के लिए दूसरी गैरकानूनी गतिविधियों को चलाने का एक मुखौटा साबित हुई। परबेलिया अंडरग्राउंड कोल माइन से कोयले की चोरी करना इन गतिविधियों में शामिल था। यह माइन ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के सोदेपुर इलाके में मौजूद है।


परबेलिया के इर्दगिर्द मौजूद कोयला हाई-ग्रेड वाला और लॉन्ग फ्लेम वाला कोयला है। पूरे देश में इस कोयले की अच्छी डिमांड है और यह प्रीमियम पर बिकता है। इस कोयले की खासियत यह है कि यह जमीन के अंदर ज्यादा गहराई में नहीं होता है।


मांझी को केवल कोयले की चोरी करने से संतोष नहीं था, ऐसे में उन्होंने अपनी खुद की ओपन कास्ट माइन शुरू कर दी। यह रघुनाथपुर के जंगलों में थी। जल्द ही बड़ी संख्या में स्थानीय लड़के मांझी के साथ जुड़ गए और वे एक स्थानीय हीरो बन गए।


इसमें जल्द ही राजनीति का खेल भी शुरू हो गया। नेताओं को मांझी के रूप में उनकी राजनीतिक फंडिंग करने का एक जरिया मिल गया था। इसके बदले में नेता मांझी को कानूनी और प्रशासनिक संरक्षण देते थे। मांझी को इस पर टैक्स भी नहीं चुकाने पड़ते थे।


स्थानीय लोगों का कहना है कि मांझी को शुरुआत में बंसा गोपाल चौधरी का समर्थन मिला जो कि उस वक्त आसनसोल से सीपीएम के एमपी थे।


मांझी अब पूरे पश्चिम बंगाल और उसके बाहर कोयला भेज रहे थे। सीबीआई के सूत्रों का दावा है कि मांझी अपनी स्कॉर्पियो में बड़े सूटकेसों में रकम रखकर कोलकाता के बड़े नेताओं के घर ले जाते थे।


कारोबारी सल्तनत का निर्माण


जल्द ही मांझी ने दुर्गापुर के राजू झा और जयदेब मंडल को पीछे छोड़ दिया जो कि उस वक्त कोयले के कारोबार के राजा हुआ करते थे। मंडल ने मांझी के साथ हाथ मिला लिया और उनके साथ काम करना शुरू कर दिया।
माना जाता है कि मांझी 22 इंडस्ट्रियल यूनिट्स के मालिक हैं। इनमें दुर्गापुर और आसनसोल में स्पॉन्ज आयरन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, रोलिंग मिल्स, सिलिकेट फैक्ट्रियां और हार्ड कोक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स शामिल हैं। वे दो हॉलिडे रिजॉर्ट्स के भी मालिक हैं और कोलकाता और दिल्ली में उनकी कई प्रॉपर्टीज हैं।


मांझी ने तेज रफ्तार से अपना कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया। बड़े नेताओं की ओर से ज्यादा पैसों की मांग ने मांझी को एक अजीब गठजोड़ करने के लिए मजबूर किया।


उन्होंने कुख्यात पशु तस्कर इनामुल हक के साथ हाथ मिला लिया। मांझी उत्तरी बंगाल में मौजूद हक के नेटवर्क का इस्तेमाल अवैध कोयले को माल्दा, मुर्शिदाबाद, दिनाजपुर और उसके आगे बांग्लादेश तक भेजने में करने लगे।


कोयले के अलावा मांझी दामोदर और अजय नदी से बालू के अवैध खनन में भी काम करते हैं।


मांझी और मंडल ने इस पूरे इलाके में कोयले का अवैध खनन करने वाले दूसरे गुट को पछाड़ दिया और इस कारोबार पर नियंत्रण हासिल कर लिया।


एक सूत्र ने बताया, “इस धंधे के पुराने खिलाड़ी धीरे-धीरे इससे बाहर हो गए और बूढ़े हो चुके माफियाओं की जगह नए डॉन बन गए।”


मांझी और मंडल ने दुर्गापुर-आसनसोल बेल्ट में अपना काम शुरू कर दिया और साथ ही अपने कामकाज का विस्तार धनबाद तक कर लिया। वे इस धंधे में गहरे तक घुसे हुए थे और पुरुलिया, दुर्गापुर, धनबाद और आसनसोल की कोल बेल्ट में इन्हें खतरनाक लोग माना जाता था और इनके दफ्तर पूरे भारत में फैले हुए थे।


करीब 60,000 लोगों को इन्होंने नौकरी पर रखा हुआ था। इनके कारोबार का तरीका इतना संगठित है कि नौकरी पर रखे गए लोगों को हर महीने तनख्वाह मिलती है और यह पैसा बाकायदा बैंक ट्रांसफर के जरिए कर्मचारियों के खाते में जाता है। साथ ही हर महीने के पहले हफ्ते में इन कर्मचारियों को सैलरी ट्रांसफर कर दी जाती है।


चुनाव पास होने से राजनीतिक नफे-नुकसान का खेल


गृहमंत्री अमित शाह ने हाल में ही बंगाल का दौरा किया है। उन्होंने दो कोयले और बालू के डीलरों को पकड़ने के लिए पुलिस का धन्यवाद भी दिया। शाह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पुलिस को इस “बेहद अहम ऑपरेशन” के लिए बधाई दी।


बीजेपी महासचिव और पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने मनीकंट्रोल को बताया कि पश्चिम बंगाल में पोंजी स्कीमें चलाने वाली कंपनियों की दुकानें बंद होने के बाद अब कोयला और बालू माफिया और साथ में पशु तस्कर राजनीतिक पार्टियों के लिए फंड का नया जरिया बन गए हैं।


उन्होंने कहा, “इसमें भारी मात्रा में पूंजी शामिल है। इस कैश का एक हिस्सा नियमित तौर पर हवाला के जरिए विदेश भेज दिया जाता है। इस अवैध कारोबार को रोकने की जरूरत है।”


टीएमसी इन आरोपों से इनकार करती है। कोल डीलरों पर पड़े छापों पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इन छापों पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा है कि तीनों जांच एजेंसियों ने बंगाल पुलिस को पूरी तरह से अंधेरे में रखा है।


टीएमसी के आरोपों को खारिज किए जाने के बावजूद अवैध खनन बेधड़क जारी है।


धनबाद के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मनीकंट्रोल को बताया है कि 1990 के दशक में मांझी और मंडल ने सत्ता के खूनी संघर्ष में अपने विरोधियों को हरा दिया और इन दोनों का वसूली और हत्या का इतिहास रहा है। हालांकि, पुलिस अधिकारी जांच पूरी होने तक इसका ब्योरा साझा नहीं करना चाहते हैं।


पुलिस का दावा है कि ये दोनों ही ग्लोबल डेटा सेंटर्स की तरह से अपने कारोबार को चला रहे थे। अवैध कोयले और बालू को ढोने वाली लॉरीज के पास स्मार्ट कार्ड होता था जिससे उन्हें चेक पोस्ट्स पर रोका नहीं जाता था और वे पूरी पुलिस सुरक्षा में दुर्गापुर से कोलकाता पहुंच जाती थीं।


हर शाम अवैध कोयले और बालू की करीब 250 से 300 लॉरीज हाइवे को जाम कर देती थीं। दिन में कार से दुर्गापुर से कोलकाता पहुंचने में तकरीबन साढ़े तीन घंटे का वक्त लग जाता था।


शाम के बाद से इसी सफर को पूरा करने में छह घंटे से ज्यादा लग जाते थे क्योंकि पूरे हाइवे को लॉरियां घेर लेती थीं।


कोल इंडस्ट्री के एक बड़े सूत्र ने मनीकंट्रोल को बताया, “लॉरियों में कोयला और बालू होती थी जबकि कारों में नकदी होती थी। पूरे पुलिस संरक्षण में ये गाड़ियां कोलकाता पहुंचती थीं। रास्ते में मांझी और मंडल के लोग इन गाड़ियों पर नजर रखते थे।”


फलता-फूलता अवैध कारोबार


ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यह अवैध कोल कारोबार कितना बड़ा है?


आसनसोल-रानीगंज इलाके में करीब 3,500 अवैध कोल खदानें हैं। इनमें 55,000 से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। करीब 40,000 लोगों की आजीविका अप्रत्यक्ष रूप से इस कारोबार पर टिकी हुई है।


इस अवैध कारोबार का रोजाना का टर्नओवर करीब 200 करोड़ रुपये का है। आसनसोल और इसके आसपास के इलाकों में इस धंधे को एक समानांतर अर्थव्यवस्था के तौर पर माना जाता है।


यह अवैध कारोबार मोटा मुनाफा देने वाला जरिया है, हालांकि इसके फायदे बमुश्किल ही माइनर्स को मिल पाते हैं जो कि बिना किसी तकनीकी विशेषज्ञता या तकनीकी सपोर्ट के अपनी जान जोखिम में डालकर इस धंधे को चलाते हैं।


सभी टैक्स और उपकर मिलाकर कोयले की आधिकारिक कीमत करीब 10,000 रुपये प्रति टन है। दूसरी ओर, अवैध कोयले, जो कि डिस्को कोल के नाम से मशहूर है, की बिक्री 6,000 से 7,500 रुपये प्रति टन पर होती है। माना जाता है कि आसनसोल के बाराबनी, जमुरिया, रानीगंज और पंडावेश्वर में बड़े पैमाने पर होती है।


रानीगंज-आसनसोल कोल बेल्ट के बड़े इलाके पर कोल माफिया का कंट्रोल है। इन खानों को ईस्टर्न कोलफील्ड्स ने छोड़ दिया है। ईस्टर्न कोलफील्ड्स कोलकाता की कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की सब्सिडियरी है।


यह चीज अभी तक एक रहस्य है कि सीआईएल की सब्सिडियरियां इन छोड़ी गई इन खदानों से कोयले का खनन क्यों नहीं करती हैं। कागजों पर सीआईएल यह कहती है कि इन खदानों से कोयले का खनन करना मुनाफे लायक नहीं है क्योंकि इनमें बहुत ज्यादा जोखिम है। लेकिन, माफिया को इन जोखिमों की कोई फिक्र नहीं है और इसमें होने वाली मौतों से उनके कामकाज पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। ऐसे में उनके लिए यह कोयला आसान बैठता है।


इस पूरे कारोबार के केंद्र में मांझी हैं। माना जाता है उनका टर्नओवर आसानी से 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। सीबीआई और ईडी के अफसरों का कहना है कि उनकी मदद एक इनसाइडर ने की है जो कि मांझी का आदमी था और बाद में मुखबिर बन गया।


इस शख्स ने ही एजेंसियों को मांझी के ताकतवर होने की पूरी कहानी बताई है। इसने बताया है कि कैसे मांझी ने 1990 के दशक में मंडल के साथ गठजोड़ किया था। कैसे इन दोनों ने झारखंड से लेकर बंगाल और कोलकाता तक पुलिस को भारी घूस दी और कैसे पुलिस ने खदानों से लेकर सिलीगुड़ी तक जाने वाली कोल लॉरीज पर अपनी आंखें बंद कर लीं। सिलीगुड़ी के जरिए ही उत्तर पूर्व के सात राज्यों का रास्ता जाता है। साथ ही बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और यहां तक कि राजस्थान तक के लिए भी जाने का यह एक दरवाजा है।


छापे में शामिल CBI के एक अफसर ने बताया, “उनके पास नकदी है, राजनीतिक सपोर्ट है। उनके पास असाधारण ताकत है।” अधिकारी ने बताया कि इन दोनों ने फिल्मों, मिनी स्टील प्लांट्स, ईंट भट्टों और नेपाल, हांगकांग और थाइलैंड के कैसिनो में अपना पैसा निवेश किया है। यहां तक के ये धार्मिक त्योहारों और स्थानीय फुटबॉल क्लबों की फंडिंग करने के काम भी करते थे।


मंडल को 2011 में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन उसे बेल मिल गई। जब उन्हें कोलकाता में पकड़ा गया था, तब उनके पास एक करोड़ रुपये की नकदी मिली थी, साथ ही उनके पास से कुछ सेल्फ-लोडिंग राइफलें और कारतूस भी मिले थे।


उन्होंने पुलिसवालों को बताया था कि यह पैसा कुछ छिटपुट खर्चों के लिए है और हथियार अपनी सुरक्षा के लिए हैं क्योंकि कोल माइनिंग एक खतरनाक धंधा है। पुलिसवालों ने दावा किया कि मंडल ने बंगाल की राजनीतिक पार्टियों को बिहार के मुंगेर से असलहे और कारतूस भी सप्लाई की है।


पुलिस ने दावा किया था कि पकड़े जाने के वक्त मंडल कोलकाता में हथियारों का एक सौदा करने आए थे। मंडल कोयले की तस्करी के कई मामलों में वांछित थे और राज्य की पुलिस और सीबीआई उन्हें खोज रही थी। लेकिन, कभी पता चलता था कि वे मलेशिया हैं, कभी पता चलता था कि वे सिंगापुर या स्विट्जरलैंड में हैं।


कभी सीपीएम के नजदीक रहे मंडल 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान टीएमसी कार्यकर्ता अक्षय बौरी की हत्या में मुख्य आरोपी हैं। टीएमसी के सत्ता में आने के बाद उन्होंने सीपीएम से नाता तोड़ लिया।


जून 2011 में रियल्टर और पूर्व तस्कर राम लखन यादव की आसनसोल में दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद झारखंड और बंगाल की पुलिस ने कोल माफिया पर नकेल कसनी शुरू कर दी। इसके चलते मंडल को अंडरग्राउंड होना पड़ा।


आयकर अधिकारियों का दावा है कि दोनों की एक हजार से ज्यादा नामचारे की कंपनियां थीं जिनके पते कोलकाता के चौरंगी ऑफिस कॉम्पलेक्स में थे। इन कंपनियों के नाम पर नकदी का हेरफेर किया जाता था और आखिर में यह पैसा प्रभावशाली नेताओं के परिवारों के खातों में पहुंच जाता था ताकि मांझी का अवैध कारोबार बदस्तूर जारी रह सके।


लेकिन अब, इन अवैध कोल डीलरों पर प्रेशर बढ़ रहा है। बंगाल में 2021 में एक कड़ा विधानसभा चुनाव होना है। इन गिरफ्तारियों के साथ राजनीतिक हल्कों में भी सरगर्मी है क्योंकि माफिया नियमित तौर पर राजनीतिक पार्टियों को पैसे मुहैया कराते थे।


शांतनु गुहा रे दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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