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DHFL के लिए बोली लगाने के लिए लेंडर्स ने पिरामल ग्रुप को चुना

फाइनल राउंड में ओकट्री और पिरामल ग्रुप आमने-सामने थे, जिसमें पिरामल ग्रुप को बढ़त मिल गई है
अपडेटेड Jan 16, 2021 पर 10:26  |  स्रोत : Moneycontrol.com

दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन (DHFL) के लिए पिरामल ग्रुप को प्रीफर्ड बिडर्स (बोली लगाने के लिए सबसे सही) के तौर पर चुना गया है। इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि 15 जनवरी को क्रेडिटर्स ऑफ कमिटी (CoC) की वोटिंग के बाद यह फैसला लिया गया है।


नाम न बताने की शर्त पर एक सूत्र ने बताया, "माना जा रहा कि CoC का वोट पिरामल के पक्ष में है।" इस मामले की जानकारी रखने वाले एक अन्य सूत्र ने बताया कि पिरामल को 94 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं। किसी रेज्योलूशन प्लान को पास करने के लिए कम से कम 66 फीसदी वोट की जरूरत होती है।


सूत्र के मुताबिक, ओकट्री (Oaktree) के रेज्योलूशन प्लान को सिर्फ 45 फीसदी वोट मिले हैं। ओकट्री ने DHFL के लिए 38,400 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी। जबकि पिरामल ग्रुप की बोली 37,250 करोड़ रुपए की थी। बोली की रकम कम होने के बावजूद पिरामल ग्रुप के रेज्योलूशन प्लान की खासियत ये थी वह अपफ्रंट कैश ज्यादा दे रही है। इसी की वजह से बैंकों को पिरामल ग्रुप का प्लान ज्यादा बेहतर लगा। पिरामल ग्रुप के ऑफर से DHFL के क्रेडिटर्स के लगभग 43 फीसदी बकाया रकम की भरपाई हो जाएगी।


सूत्रों के मुताबिक, पिरामल ग्रुप स्थानीय कंपनी है जिसकी वजह से भी DHFL के क्रेडिटर्स ने इसे पसंद किया है। 6.5 फीसदी वोट के क्रेडिटर्स आज की बैठक में मौजूद नहीं थे।


क्रेडिटर्स ऑफ कमिटी की आज की बैठक में DHFL के लिए आए चारों रेज्योलूशन प्लान पर वोटिंग हुई थी। इस मामले में अगले हफ्ते एक औपचारिक बैठक होगी और पिरामल ग्रुप को लेटर ऑफ इंटेंट जारी किया जाएगा।


DHFL की बोली को लेकर पिछले कुछ समय से तनातनी चल रही है। इसके लिए फाइनल राउंड में ओकट्री और पिरामल ग्रुप आमने सामने थे। पिरामल एंटरप्राइज एक डायवर्सिफाइड भारतीय ग्रुप है। वहीं ओकट्री एक अमेरिकी एसेट कंपनी है। दोनों कंपनियों की बोली 37,000-38,000 करोड़ रुपए के बीच है। दोनों कंपनियों के रेज्योलूशन प्लान में कैश लेनदेन लगभग 17,000 करोड़ रुपए का था। बोली प्रक्रिया के दौरान पिरामल ग्रुप लगातार यह दावा करता आ रहा उसका पलड़ा भारी है।
 
कैसे दिवालिया हुई DHFL कंपनी


2018 में इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (IL&FS) के धराशायी होने के बाद DHFL को कैश की बड़ी दिक्कत हुई जिससे कंपनी कभी उबर नहीं पाई। इस पर मुसीबत यह रही कि कंपनी के प्रमोटर वाधवन के खिलाफ कई तरह की वित्तीय गड़बड़ी करने का आरोप लगा और जांच शुरू हो गई। दिसंबर 2019 में DHFL को मजबूरन नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (NCLT) में जाना पड़ा।


DHFL पर बैंकों का कुल 91,000 करोड़ रुपए का बकाया है। कंपनी पर सबसे बड़ा लोन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) का है। कंपनी पर SBI का 10,000 करोड़ रुपए का लोन है। इसके अलावा बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, NHB, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, सिंडिकेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा ने भी DHFL को कर्ज दिया है।   


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