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DHFL: कैसे चमकता सितारा डूब गया और बैंकों को पता भी नहीं चला

DHFL का कारोबार तेजी से बढ़ रहा था और कुछ एनालिस्ट इसकी तुलना अगले HDFC Bank से भी करने लगे थे
अपडेटेड Dec 01, 2020 पर 10:09  |  स्रोत : Moneycontrol.com

दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (DHFL) के घोटाले का जब सितंबर 2018 में खुलासा हुआ तब से ही बैंकों का बुरा वक्त शुरू हो गया। एक अनुमान के मुताबिक बैंकों के करीब 90,000 करोड़ रुपए इसमें अटके हुए हैं। लगभग सभी बड़े बैंकों ने DHFL को कर्ज दिया था।


DHFL को सबसे बड़ा लोन SBI से मिला था। यह करीब 10,000 करोड़ रुपए का था। बैंक ऑफ इंडिया के करीब 4125 करोड़ रुपए फंसे हैं। वहीं केनरा बैंक ने DHFL को 2681 करोड़ रुपए, NHB ने 2434 करोड़ रुपए, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने 2378 करोड़ रुपए दिए थे। नाम अभी खत्म नहीं हुए हैं। सिंडिकेट बैंक ने DHFL को 2229 करोड़ रुपए और बैंक ऑफ बड़ौदा ने 2075 करोड़ रुपए का कर्ज दिया है। DHFL में इंडियन बैंक का 1552 करोड़ रुपए, सेंट्रल बैंक का 1389 करोड़ रुपए, IDBI बैंक का 999 करोड़ रुपए और HDFC बैंक का 361 करोड़ रुपए का एक्सपोजर है। ब्याज जुड़ने की वजह से मुमकिन है कि अब यह आंकड़ा अलग होगा।


लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि सभी बैंक DHFL के चक्कर में फंस गए?


एक ऐसा दौर था जब DHFL एक बड़ा नाम हुआ करता था। यह कहानी भी कुछ हद तक किंगफिशर-विजय माल्या केस जैसा ही है। बैंकों ने सिर्फ माल्या के नाम पर कर्ज दिया था ना कि कंपनी के कैश फ्लो को देखकर। ठीक इसी तरह बैंकों ने DHFL के प्रमोटर कपिल वाधवन के नाम पर लोन दिया।  


DHFL का कारोबार फलफूल रहा था और एनालिस्ट यह भी मान रहे थे कि यह अगला  HDFC बैंक हो सकता है। लेकिन यह चमक बहुत कम रही। सितंबर 2018 में DHFL कैश क्रंच में फंस गई। IL&FS क्राइसिस के बाद  DHFL के क्राइसिस का दौर शुरू हो गया।
 
वाधवन ब्रदर्स के खराब मैनेजमेंट और कामकाज के खराब तरीकों का खुलासा हुआ। कंपनी की नकदी खत्म हो गई और RBI ने 20 नवंबर 2019 को DHFL के बोर्ड पर अपना कब्जा कर लिया। कंपनी को 3 दिसंबर 2019 में IBC की प्रक्रिया में शामिल किया गया था।


NCLT की प्रक्रिया अब कहां पहुंची?


एकसाल गुजरने के बावजूद DHFL के रेज्योलूशन में कुछ खास तरक्की नहीं हुई है। कुछ कंपनियां बोली लगाने को तैयार हैं। इनमें अडानी ग्रुप, ओकट्री कैपिटल, पिरामल ग्रुप और SC Lowy शामिल है।


इसमें सबसे बड़ी 33,000 करोड़ रुपए की बोली अडानी ने लगाई है। इसके बावजूद बैंकों को बड़ा हेयर कट (लोन की रकम में कटौती) करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ज्यादातर बैंकों ने ज्यादा प्रावधान या प्रोविजनिंग कर रखी थी। प्रोविजनिंग के मायने हैं लोन में लॉस की आशंका से एक रकम तय करके रखना। ऐसे में अगर DHFL रिकवर करता है तो बैंकों के लिए बोनस की तरह होगा।


SMC ग्लोबल सिक्योरिटीज के सीनियर एनालिस्ट सिद्धार्थ पुरोहित ने कहा, "वैसे तो सबसे बड़ी बोली को स्वीकार कर लिया गया है लेकिन बैंकों का लॉस बहुत बड़ा है। लेकिन शुरू में कोई भी इतनी बड़ी कीमत का अंदाजा नहीं लगा रहा था। इसलिए यह अच्छा सरप्राइज है।"


कपिल वाधवन ने भी NCLT में आवेदन किया है कि उन्हें क्रेडिटर्स ऑफ कमिटी की बैठक में हिस्सा लेने और DHFL के दस्तावेज एक्सेस करने दिया जाए।


DHFL का डूबना फाइनेंशियल दुनिया के लिए बहुत बड़ा सबक है। वाधवन ब्रदर्स ने गलत ट्रांजैक्शन का बिल्कुल जाल बुन दिया था।


ED के मुताबिक, वाधवन ब्रदर्स ने गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम के साथी और ड्रग ट्रैफिकर इकबाल मिर्ची के साथ भी डील की है। कपिल वाधवन ने कागजी कंपनियां बनाकर फंड इधर से उधर किया और बैंकों को चूना लगाया। बैंक बहुत लकी होंगे अगर वो अपना पैसा कंपनी से वापस हासिल कर सकें। उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं है।


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