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फ्रैंकलिन टेम्पल्टन संकटः निवेशकों को कब मिलेगा अपना पैसा?

लंबे वक्त तक मैक्रोइकनॉमिक कमजोर रहती है तो निवेशकों को अपने पैसों के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है
अपडेटेड May 08, 2020 पर 17:56  |  स्रोत : Moneycontrol.com

निखिल वालवलकर


अपने 6 डेट फंड्स को बंद करने के बाद फ्रैंकलिन टेम्पल्टन (Franklin Templeton) AMC ने 23 अप्रैल 2020 को स्कीमों के मैच्योरिटी प्रोफाइल्स का ब्योरा जारी कर दिया है। आसान शब्दों में इसे ऐसे समझिए कि अगर सबकुछ उम्मीद के मुताबिक चला तो निवेशकों को अपने पैसे वापस मिलने की ये टाइमलाइन है।


मिसाल के तौर पर, यह साफ है कि फ्रैंकलिन इंडियन अल्ट्रा शॉर्ट बॉन्ड फंड (FIUBF) में लगाई गई 9 फीसदी रकम 23 अप्रैल 2020 से तीन महीने में मैच्योर हो रही है।


एफआईयूबीएफ और फ्रैंकलिन इंडिया लो ड्यूरेशन बॉन्ड फंड (FILDF) से पूरा पैसा पांच साल की अवधि पूरा होने के पहले ही मिल जाना चाहिए।


इसमें इतना वक्त क्यों लग रहा है?


आप यह सोच रहे होंगे कि एएमसी (एसेट मैनेजमेंट कंपनी यानी म्यूचुअल फंड) को पैसे लौटाने में इतना ज्यादा वक्त क्यों लग रहा है। जबकि फैक्ट शीट में टेबल के मुकाबले हमेशा कम औसत मैच्योरिटीज और मैकॉले ड्यूरेशन (MD) को दिखाया गया है।


इस मामले में आपको दो फैक्टर समझने की जरूरत है। पहला, पिछले एक साल में रिडम्पशन (पैसे निकासी) को पूरा करने के लिए फंड हाउस पहले ही कुछ शॉर्ट मैच्योरिटी लिक्विड पेपर्स को बेच चुका है। इसने स्कीम की एमडी को बढ़ा दिया है।


दूसरा, एमडी से सभी तरह के कैश फ्लो को शामिल करते हुए बॉन्ड के वेटेड एवरेज मैच्योरिटी का पता चलता है। यह वह वक्त नहीं होता है जब पिछला बॉन्ड मैच्योर होता है। आमतौर पर पोर्टफोलियो की एवरेज मैच्योरिटी एमडी से अधिक होती है।


ऐसे में आपको अपने पैसे को लेकर धैर्य रखने की जरूरत है। हालांकि, कुछ चरण ऐसे हैं जिनसे यह प्रक्रिया तेज हो सकती है।


मुझे मेरा पैसा जल्दी कैसे मिल सकता है?


बॉन्ड्स के मैच्योरिटी प्रोफाइल से पता चलता है कि यह कई निवेशकों के लिए मुश्किलभरा इंतजार साबित होने वाला है। यह उन लोगों के लिए ज्यादा दिक्कत पैदा करने वाला है जिन्होंने अपने फंड्स एफआईयूबीएफ और एफआईएलडीएफ में लगाए थे। अगर मैक्रोइकनॉमिक स्थितियां लंबे वक्त तक इसी तरह जारी रहती हैं तो निवेशकों को बॉन्ड्स के मैच्योर होने तक इंतजार करना पड़ सकता है।


मनी हनी फाइनेंशियल सर्विसेज के एमडी और सीईओ अनूप भैया कहते हैं, "हालांकि, अगर हालात में सुधार होता है और फाइनेंशियल मार्केट्स में उछाल आता है तो फंड हाउस सेकेंडरी मार्केट में बॉन्ड्स बेचने का मौका तलाश सकता है।"


जीईपीएल कैपिटल के म्यूचुअल फंड्स के हेड रूपेश भंसाली बताते हैं, "लॉकडाउन की वजह से मनी मार्केट में ट्रेडिंग के घंटे घट गए हैं। साथ ही यस बैंक की रीस्ट्रक्चरिंग ने भी इनवेस्टर्स की बॉन्ड्स में दिलचस्पी कम हुई है।"


लॉकडाउन के खत्म होने के बाद अगर मार्केट्स में बड़े पैमाने पर रिकवरी होती है तो फंड हाउस अच्छी कीमत पर मैच्योरिटी से पहले ही कुछ बॉन्ड्स बेचने पर विचार कर सकता है।


भंसाली कहते हैं, "इस तरह के सेकेंडरी मार्केट सेल से तय होगा कि क्या निवेशकों को जल्दी पैसा मिल पाएगा या नहीं।" निवेशकों को ध्यान रखना होगा कि सेकेंडरी मार्केट में सेल वैल्यू मैच्योरिटी वैल्यू से अलग होगी।


अगर कोई इश्यूअर बॉन्ड आउटस्टैंडिंग का पहले ही भुगतान करता है तो आपको पैसा जल्दी मिल सकता है। लेकिन, इस बात के आसार बेहद कम हैं क्योंकि कोविड-19 के दौर में कॉरपोरेट्स का हाथ काफी तंग है।


अनुमानों को अनदेखा न करें


पुट और कॉल ऑप्शंस वाले बॉन्ड्स अलग तरीके से चलते हैं। पुट ऑप्शन वाले बॉन्ड के लिए पहले पुट ऑप्शन की तारीख को मैच्योरिटी की तारीख माना जाता है।


आसान शब्दों में, बॉन्ड ऑप्शन से निवेशकों को पहले से तय रकमम पर बॉन्ड को इश्यूअर को सरेंडर करने की मंजूरी मिलती है। कॉल ऑप्शन वाले परपेचुअल बॉन्ड्स के मामले में, आने वाली कॉल डेट को मैच्योरिटी डेट माना जाता है।


कॉल ऑप्शन इश्यूअर को पहले से तय रकम के भुगतान पर बॉन्ड को रीकॉल करने की ताकत देता है।


इन प्रोजेक्शंस में स्कीम में शामिल बॉन्ड्स के कूपन रिसीट्स के साथ ही कैशफ्लो को भी नहीं लिया जाता है। इश्यूअर के डिफॉल्ट करने के मामले में आपको मिलने वाली रकम कम होती है।


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