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सेबी की पोस्ट आईपीओ लॉक इन नियमों में नरमी की तैयारी, जानिए क्या है एक्सपर्ट्स की राय

सेबी का कहना है कि प्रमोटर की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें संशोधन की जरुरत है.
अपडेटेड May 16, 2021 पर 15:48  |  स्रोत : Moneycontrol.com

सेबी ने हल ही में ICDR (Issue of Capital and Disclosure Requirements)नियमों में नरमी लाने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत प्रमोटरों के लिए पोस्टआईपीओ  लॉक इन नियमों में सरलता लाई जा सकती है और प्रमोटर ग्रुप की परिभाषा में भी बदलाव किया जा सकता है।


सेबी ने अपने एक बयान में कहा है कि किसी आईपीओ के बाद प्रमोटरों की कम से कम 20 फीसदी होल्डिंग 3 साल के लॉक इन पीरियड में रहती है।  अब इस  लॉक इन अवधि को घटाकर 1 साल किया जा सकता है। इसके अलावा  20 फीसदी से ऊपर और प्री आईपीओ नॉन प्रमोटर शेयर होल्डिंग पर लागू 1 साल के लॉकइन अवधि को भी घटाकर 6 महीने किया जा सकता है।


सेबी का कहना है कि प्रमोटर की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें संशोधन की जरुरत है औऱ यह जरुरत तब और बढ़ जाती है जब प्राइवेट इक्विटी निवेश वाली कंपनियां लिस्ट होना चाहती है। इसके अलावा तमाम नई पीढ़ी की टेक कंपनियां किसी एक परिवार के मालिकाना हक वाली नहीं है। इसके साथ ही इनका कोई आसानी से पहचाना जानेवाला प्रमोटर ग्रुप भी नहीं है। जिसको ध्यान में रखकर अब प्रमोटर की परिभाषा बदले जाने की जरुरत है।



सेबी ने इस मुद्दे पर पब्लिक फीडबैक लेने की भी बात कही है। इसके अलावा सेबी IPO prospectus में टॉप 5 लिस्टेड अथवा अनलिस्टेड ग्रुप कंपनियों के फाइनेंशियल और दूसरे विवरणों के खुलासे के नियम को खत्म करने के पक्ष में भी है।


जानकारों का कहना है कि सेबी के इस कदम से उन कंपनियों को फायदा होगा जिनमें प्राइवेट इक्विटी फंडों का निवेश है। इसके अलावा सेबी का प्रस्ताव प्रमोटर की अवधारण बदलकर पर्सन इन कंट्रोल करने की है।


मनी कंट्रोल ने इस मुद्दे पर कई कानूनी दिग्गजों और बाजार जानकारों से बात की है। जिनमें से अधिकांश की राय है कि अगर सेबी का ये प्रस्ताव लागू हो जाते हैं तो इससे भारतीय इक्विटी मार्केट पर काफी अच्छा असर देखने को मिलेगा।


जे सागर एसोसिट्स (J Sagar Associates)के आनंद लकरा (Anand Lakra) का कहना है कि प्रमोटर की जगह persons in control शब्द का उपयोग ज्यादा बेहतर होगा। और यह एक बार प्रमोटर बनने पर सदैव प्रमोटर बने रहने के वर्तमान स्थिति में एक बड़ा बदलाव होगा। वर्तमान नियमों के तहत जबकि रीक्लासिफिकेशन नहीं होता ऐसे प्रमोटर शेयर होल्डरों को अपनी जिम्मेदारी का बोझ ढोना पड़ता है। जिनके हाथ में कंपनी का कोई कंट्रोल नहीं रह जाता है। इस स्थिति में बदलाव के लिए सेबी को जल्द ही संशोधन करना चाहिए।


वहीं इंडस लॉ के पार्टनर मनन लाहोटी का कहना है कि प्रमोटर्स की परिभाषा में बदलाव से डिस्कलोजर नियमों के बोझ में कोई बहुत बड़ी कमी नहीं आएगी। प्री आईपीओ इनवेस्टर्स के लिए लॉक-इन पीरियड घटाने के लिए सेबी के प्रस्ताव पर बाजार दिग्गजों का कहना है कि इससे प्राइवेट इक्विटी निवेशकों को राहत मिलेगी।


डीएसके लीगल के Aninda Pal का कहना है कि ICDR नियमों में प्रमोटर ग्रुप और दूसरे शेयर होल्डरों के लिए इस तरह की नरमी से दूसरी कंपनियों को बाजार से आईपीओ के जरिए पूंजी जुटाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। वहीं लाहोटी का कहना है कि प्री आईपीओ इनवेस्टमेंट नियमों में नरमी से भारतीय बाजारों के नियम विकसित देशों के नियमों के बहुत करीब पहुंच जाएंगे। 


मनी कंट्रोल से बात करते हुए एवरस्टोनग्रुप की प्रतिभा जैन ने कहा कि निवेशक बहुत समय से लॉक-इन पीरियड में कटौती की मांग कर रहे थे। वर्तमान समय में जब प्राइवेट इक्विटी फर्म भारत में बड़े-बड़े कट्रोलिंग डील कर रहे हैं वो प्रमोटर बनने के सभी पात्रता रखते हैं। जिसकी वजह से वर्तमान नियमों के चलते किसी कंपनी में किया गया उनका निवेश एक निश्चित अवधि के लिए लॉक हो जाता है। जिससे बड़े निवेशक देश में निवेश करने से हिचकिचाते हैं। क्योंकि उनके पास अपनी इच्छा के अनुसार कंपनी से निकलने का विकल्प नहीं होता।


प्राइवेट इक्विटी निवेशकों को सही समय से एग्जिट रूप उपलब्ध कराने की जरूरत है। जिससे कि वे किसी एक कंपनी से निकलकर किसी दूसरी नई निजी कंपनी में निवेश कर सकें। अगर सेबी के ये प्रस्ताव नियम बन जाते हैं तो भारत विदेशी निवेशकों के लिए एक बेहतर निवेश विकल्प बनकर उभरेगा।


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