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क्या है NBFCs क्राइसिस, 5 बातें जो आपको पता होनी चाहिए

प्रकाशित Tue, 14, 2019 पर 11:39  |  स्रोत : Moneycontrol.com

एनबीएफसी सेक्टर एक संकट की ओर बढ़ रहा है। इन कंपनियों को कर्ज जुटाने में मुश्किल हो रही है। एसेट-लाइबिलिटी में भारी अंतर की वजह से एनपीए बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। कर्ज की मुश्किलों के चलते एनबीएफसी के लिए अगला एक साल बेहद अहम होने वाला है।


नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (एनबीएफसी) एक मुश्किल दौर से गुजर रही हैं। यह चीज किसी से छिपी हुई नहीं है। अब एक टॉप रैंकिंग सरकारी अफसर ने दावा किया है कि यह सेक्टर एक बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है। कॉरपोरेट अफेयर्स सेक्रेटरी इंजेती श्रीनिवास ने पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि नया कर्ज मिलना मुश्किल हो रहा है, जरूरत से ज्यादा कर्ज बांटा गया है, कुछ खास सेक्टरों को ज्यादा कर्ज दिया गया, इसके अलावा एसेट और लाइबिलिटीज के बीच में भारी अंतर है। साथ ही कुछ बड़े संस्थानों ने बड़े जोखिम भरे कदम भी उठाए। इन सब के चलते एनबीएफसी आज मुश्किलों का सामना कर रही हैं।


अगर आप यह सोच रहे हैं कि हम किस संकट की बात कर रहे हैं और यह क्यों अहम है तो यहां हम कुछ ऐसे ही जरूरी सवालों के जवाब दे रहे हैं जो आपके मन में उठ रहे होंगे।


क्या है एनबीएफसी संकट?


एनबीएफसी नकदी की कमी से जूझ रही हैं। इन कंपनियों के पास कर्ज देने के लिए पैसा नहीं है और पैसा जुटाने में इन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। एनबीएफसी आमतौर पर या तो बैंकों से पैसा उधार लेती हैं या फिर कमर्शियल पेपर्स म्यूचुअल फंड्स को बेचती हैं ताकि पैसा जुटाया जा सके। एनबीएफसी इसी पैसे को छोटी और मंझोली कंपनियों, रिटेल कस्टमर्स समेत अन्य इकाइयों को उधार देती हैं। जब एनबीएफसी के पास कर्ज देने के लिए पैसा नहीं होता है तो इससे अर्थव्यवस्था में कर्ज की गति कमजोर पड़ जाती है। इससे इकनॉमिक ग्रोथ पर बुरा असर पड़ता है और कई कर्जदार डिफॉल्ट भी कर जाते हैं।


यह परिस्थिति कैसे पैदा हुई?


इसके लिए हमें कुछ चीजों को समझना होगा। पहला, एनबीएफसी का बिजनेस मॉडल अपने आप में ही गड़बड़ी से भरा हुआ है। एनबीएफसी खुद शॉर्ट-टर्म लोन उठाती हैं और फिर इसे लॉन्ग-टर्म लोन के तौर पर बांट देती हैं। इस तरह से ये कंपनियां खुद ही कर्ज पर टिकी हुई हैं। इसके चलते एसेट-लाइबिलिटी में अंतर पैदा हो जाता है। मिसाल के तौर पर, 6-महीने के डेट पेपर्स बेचकर कोई एनबीएफसी पैसा जुटाती है और इस पैसे को 5 साल की अवधि वाले कार लोन के तौर पर बांट देती है। इसके चलते ऐसी परिस्थिति पैदा होती है जिसमें या तो एनबीएफसी को 6-महीने वाले डेट पेपर को रोल-ओवर (रिन्यू) करना पड़ता है या फिर उसे डेट पेपर का कर्ज चुकाने के लिए मार्केट से पैसा उधार लेना पड़ता है। अच्छे वक्त में यह चीज आराम से हो जाती है। लेकिन, अगर वक्त खराब हो तो ऐसा करना मुश्किल हो जाता है।


इसके चलते एक और फैक्टर पैदा होता है। IL&FS ग्रुप की कुछ कंपनियां डिफॉल्ट कर गईं और इससे यह साइकल टूट गया। इससे मार्केट में डर का माहौल पैदा हुआ। बैंक, म्यूचुअल फंड्स और उनके इनवेस्टर्स को लगा कि कहीं कुछ और कंपनियां भी डिफॉल्ट न कर जाएं। इस डर के बढ़ने के साथ ही कई संस्थानों ने एनबीएफसी को पैसा देने से इनकार कर दिया। एनबीएफसी के लिए कर्ज उठाने की लागत 1।5 फीसदी तक बढ़ गई।


संकट के और फैलने का डर क्या असली है?


गुजरे कुछ सालों में खासतौर पर नोटबंदी के बाद, सिस्टम में इफरात में पैसा आ गया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बड़े पैमाने पर कैश बैंकों में जमा कर दिया गया। साथ ही इनवेस्टर्स ने म्यूचुअल फंड्स में भी काफी पैसा निवेश कर दिया। मनी मार्केट, एनबीएफसी में पैसा लगाने का हक रखने वाले फंड मैनेजरों की पहुंच सस्ते फंड्स तक हो गई। इससे ये बैंकों के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से कर्ज बांटने की हैसियत में आ गए।


लेकिन, इस कहानी का दूसरा पक्ष यह है कि म्यूचुअल फंड मैनेजर अपने निवेशकों के लिए ऊंचे रिटर्न की तलाश में थे, दूसरी ओर बैंक और एनबीएफसी भी इसी जुगत में लगे हुए थे। ज्यादा रिटर्न के लालच ने इन्हें जोखिम लेने और अंडरराइटिंग मानकों पर प्रेशर बनाने पर मजबूर कर दिया। ध्यान रखिए कि सिस्टम में मौजूद इफरात में पैसा न केवल एनबीएफसी तक पहुंचा बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों जैसी दूसरी फर्मों के हाथ भी लगा। यहीं से मुश्किलों के हालात पैदा होने शुरू हो गए।


क्यों यह संकट गंभीर है?


जैसा कि हमने पहले भी बताया है कि एनबीएफसी की अर्थव्यवस्था में एक बड़ी भूमिका है। कर्ज देने में इनकी हिस्सेदारी बढ़ी है क्योंकि ये कंपनियां ऐसे सेक्टरों को कर्ज देती हैं जिन्हें बैंक कर्ज देने से मना कर देते हैं।


अब चूंकि एनबीएफसी के लिए खुद पैसा जुटाना मुश्किल हो रहा है या उन्हें पैसे उधार लेने के लिए मोटा ब्याज देना पड़ रहा है तो इससे अर्थव्यवस्था में कर्ज दिए जाने की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। इससे एमएसएमई सेक्टर (माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज) को झटका लगेगा जो कि पहले से ही नोटबंदी और गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) की दोहरी मार झेल रहा था।


अहम बात यह है कि इससे इकनॉमी में खपत की मांग (कंजम्पशन डिमांड) पर चोट लगेगी। इनवेस्टमेंट डिमांड अभी पूरी तरह से उबर नहीं पाई है, ऐसे में कंजम्पशन यानी खपत ही इकनॉमी को आगे बढ़ाने का मुख्य जरिया बनी हुई थी। कर्ज मिलने और देने का सिस्टम कमजोर पड़ने से पूरी आर्थिक गतिविधि सुस्ती की चपेट में आ रही है और इसके लक्षण दिखाई देने लगे हैं।


इसके अलावा, क्रेडिट में कमी आने से कमर्शियल रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टरों में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (डूबे हुए कर्ज) बढ़ रहे हैं। इससे भी इकनॉमी के सामने बड़ी चुनौती पैदा हो रही है।


मिसाल के तौर पर, प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए इंफ्रा कंपनियों को वर्किंग कैपिटल की जरूरत होती है। प्रोजेक्ट पूरा होने पर इसी से उन्हें कमाई होती है। ऐसे में जब उन्हें फंड नहीं मिलता या यह बेहद महंगा कर्ज होता है तो इससे प्रोजेक्ट के फायदेमंद रहने की उम्मीद कमजोर पड़ती है। साथ ही इसमें पहले से लगे पैसे के भी फंसने के आसार बढ़ जाते हैं। इससे स्ट्रेस्ड एसेट्स बढ़ते हैं। जो म्यूचुअल फंड्स ऐसे प्रोजेक्ट्स में लगाते हैं उन्हें अपनी नेट एसेट वैल्यू कम करनी पड़ती है। इससे म्यूचुअल फंड्स के निवेशकों में पैसा निकालने की भगदड़ मच जाती है। इसके चलते म्यूचुअल फंड्स एनबीएफसी या दूसरे प्रोजेक्ट्स को पैसा उधार नहीं दे पाते हैं और यह एक पूरे साइकल की शक्ल ले लेता है।


एनबीएफसी, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की हालिया डाउनग्रेडिंग से यह संकट और गहरा गया है।


अब क्या होगा?


पिछले फिस्कल में रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मार्केट से 3 लाख करोड़ रुपए के सरकारी डेट पेपर खरीदे। मूल रूप में इसका मतलब यह है कि इतना पैसा बैंकिंग सिस्टम में डाला गया ताकि वे कर्ज दे सकें। एनबीएफसी की मदद करने का आरबीआई के पास यही इकलौता तरीका है क्योंकि केंद्रीय बैंक सीधे बैंकों को कर्ज नहीं दे सकता क्योंकि उनके पास गिरवी रखने के लिए सरकारी पेपर नहीं होते।



लेकिन, एनबीएफसी को अभी भी महंगा कर्ज लेना पड़ रहा है क्योंकि बैंक या तो जोखिम नहीं लेना चाहते या वे कर्ज देने की अधिकतम सीमा पर पहुंच चुके हैं।
इससे एनबीएफसी एक्सटर्नल कमर्शियल बौरोइंग (ईसीबी), पब्लिक बॉन्ड्स या एसेट्स को बेचने के जरिए पैसा जुटाने के दूसरे विकल्पों की ओर मुड़ेंगे। लेकिन, एनालिस्ट्स का कहना है कि उनकी ज्यादातर उधारी बैलेंस शीट की मरम्मत करने और कर्जों की रीफाइनेंसिंग में खर्च हो जाएगी। भले ही यह एक बड़ा संकट बनकर न भी उभरे, तब भी एनबीएफसी को पटरी पर लौटने में कम से कम एक साल का वक्त लग जाएगा।