Rafale Fighter Jet बनाने वाली कंपनी Dassault Aviation ने पूरी नहीं की डील की शर्तें: CAG

CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि Dassault Aviation और यूरोपीय मिसाइल निर्माता कंपनी एमबीडीए (MBDA) ने अभी तक करार के तहत दी जाने वाली तकनीक भारत को नहीं सौंपी है
अपडेटेड Sep 24, 2020 पर 18:47  |  स्रोत : Moneycontrol.com

नियंत्रक और लेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट संसद में पेश कर दी है। अपनी रिपोर्ट में CAG ने राफेल फाइटर जेट (Rafale Fighter Jets) बनाने वाली कंपनी पर डील की शर्तें पूरी नहीं करने का आरोप लगाया है। CAG ने अपनी रिपोर्ट में ऑफसेट करार (Offset) से जुड़ी नीतियों को लेकर रक्षा मंत्रालय की भी आलोचना की है। इसी पॉलिसी के तहत भारत सरकार ने फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) से 36 राफेल विमानों के लिए डील की है। CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि Dassault Aviation और यूरोपीय मिसाइल निर्माता कंपनी एमबीडीए (MBDA) ने अभी तक करार के तहत दी जाने वाली तकनीक भारत को नहीं सौंपी है। आपको बता दें कि Dassault Aviation ने राफेल विमान बनाए हैं, जबकि MBDA विमान में लगने वाले मिसाइलों की आपूर्ति करती है।

संसद में पेश कैग की रिपोर्ट में भारत की ऑफसेट नीति की क्षमता पर भी सवाल उठाए गए हैं। CAG का कहना है कि उसने अभी तक एक भी ऐसा मामला नहीं देखा, जिसमें किसी विदेशी कंपनी ने भारत को उच्चस्तरीय टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया हो। CAG ने कहा कि देश को ऑफसेट नीतियों के अच्छे परिणाम नहीं मिले हैं, इसलिए रक्षा मंत्रालय को इस पॉलिसी और इसके इंप्लीमेंटेशन की समीक्षा करने की जरूरत है।

DRDO को नहीं सौंपी टेक्नोलॉजी

CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि रक्षा सौदे के तहत Dassault Aviation और MBDA ने डिफेंस रिसर्च और डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) को 30 फीसद उच्च तकनीक देने का प्रस्ताव किया था। लेकिन फ्रेंच फर्म ने अभी तक DRDO के प्रति अपने ऑफसेट शर्तों को पूरा नहीं किया है। ऑफसेट पॉलिसी के तहत यह शर्त है कि किसी भी विदेशी कंपनी के साथ हुई डील की कीमत का कुछ हिस्सा भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की तरह आना चाहिए, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, एडवांस कंपोनेंट्स की स्थानीय तौर पर मैन्युफैक्चरिंग या फिर नौकरियां पैदा करने की जिम्मेदारियां शामिल हैं। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) के इंजन कावेरी के निर्माण में DRDO तकनीकी सहायता चाहता है, लेकिन Dassault Aviation ने अभी तक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पुष्टि नहीं की है।

कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने में विफल

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2005 से लेकर मार्च, 2018 तक विदेशी कंपनियों के साथ कुल 66,427 करोड़ रुपये के 48 ऑफसेट करार हुए हैं। दिसंबर, 2018 तक Dassault Aviation को 19,223 करोड़ के ऑफसेट करार की भरपाई करनी थी। हालांकि अभी तक केवल 11,396 करोड़ का काम ही हुआ है जो कुल करार का 59% है। डील के तहत पांच राफेल जेट की पहली खेप 29 जुलाई को भारत पहुंच चुकी है। यह आपूर्ति 36 विमानों की खरीद के लिए 59,000 करोड़ रुपये के सौदे के चार साल बाद हुई है। बाकी विमान 55,000 करोड़ रुपये के विमान 2024 तक दिए जाने हैं। CAG का कहना है कि ऑफसेट करार के तहत ये दोनों कंपनियां इन बाध्यताओं को पूरा करने में विफल रही हैं। चूंकि करार का अधिकांश समय निकल चुका है, इसलिए इस देरी में निर्माता कंपनी को ही फायदा होता है।

हेलीकॉप्टर अपग्रेड प्रोग्राम में देरी पर सवाल

एमआई-17 (Mi-17) हेलीकॉप्टरों को अपग्रेड करने में हुई देरी पर CAG ने कहा कि आपूर्ति की समय सीमा में लगातार देरी होने के कारण इन हेलीकॉप्टरों को अपग्रेड करने में केवल दो साल का समय बचा है। इन हेलीकॉप्टरों को अपग्रेड करने का प्रस्ताव वर्ष 2002 में रखा गया था। लेकिन 18 साल बाद भी इन्हें अपग्रेड नहीं किया जा सका। इसीलिए इन हेलीकॉप्टरों के उड़ने की क्षमता बेहद सीमित हो गई है और इसके चलते देश की तैयारियों के साथ समझौता हो रहा है। कैग ने कहा कि इन हेलीकॉप्टरों के अपग्रेडेशन जुलाई 2018 से शुरू हुआ, जो 2024 तक पूरा हो पाएगा। अपग्रेड के बाद भी ये हेलीकॉप्टर केवल ढाई साल तक ही ऑपरेट करने लायक रहेंगे।

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