आठवें से चौथा सबसे बड़ा कृषि निर्यातक बन सकता है भारत, सरकार ने बनाया रोडमैप

कृषि निर्यात की दिशा में हमने प्रगति तो की है लेकिन जो भी प्रगति हुई है, वह हमारी क्षमता के मुकाबले बहुत कम है
अपडेटेड Aug 04, 2020 पर 08:03  |  स्रोत : Moneycontrol.com

भुवन भास्कर (@bhuwanbhaskar)

एक समय था जब भारत लगभग हर कृषि उत्पाद के लिए दूसरे देशों से आयात पर निर्भर था, लेकिन फिर ’70 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति ने सब कुछ बदल दिया। देश में हर कृषि उपज का उत्पादन कई-कई गुना बढ़ा और भारत दर्जनों कृषि कमोडिटी के उत्पादन में न सिर्फ आत्मनिर्भर बन गया, बल्कि अपनी जरूरतों से ज्यादा उत्पादन करने लगा। यहीं से गड़बड़ी भी शुरू हो गई। ज्यादा उत्पादन के कारण भारतीय बाजारों में अधिकतर कृषि उपज की सप्लाई अक्सर मांग से आगे रहती है, और इसका सीधा असर उसकी कीमतों पर दबाव के रूप में सामने आता है। नतीजा होता है कि किसानों की दुर्दशा, जिन्हें कई बार तो उपज की लागत भी नहीं मिल पाती। इस परिस्थिति के सबसे प्रभावी समाधानों में से एक देश का कृषि निर्यात बढ़ाना है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि इस दिशा में हमने अब तक कोई प्रगति नहीं की है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि जो भी प्रगति हुई है, वह हमारी क्षमता के मुकाबले बहुत कम है।

कृषि निर्यातः सफर अब तक

साल 2016 के विश्व व्यापार संगठन (WTO) के आंकड़ों के मुताबिक भारत का स्थान कृषि उत्पादों के निर्यात में 10वां था, जो कि 2019 में 8वां हो गया है। साल 2007 से 2016 के बीच कृषि उत्पादों के निर्यात में भारत ने 9% की वृद्धि दर हासिल की है, जो कि चीन (8%), ब्राजील (5.4%) और अमेरिका (5.1%) की वृद्धि दर से कहीं ज्यादा है। वित्त वर्ष 2009-10 में भारत ने 11.3 अरब डॉलर का कृषि उत्पाद निर्यात किया था जो 2013-14 तक 42.86 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन इसके बाद पूरे विश्व के कमोडिटी बाजार में मंदी का जो दौर शुरू हुआ, उससे भारतीय निर्यात भी अछूता न रहा। वित्त वर्ष 2015-16 में 32 अरब डॉलर का निचला स्तर छूने के बाद 2018-19 में एक बार फिर यह 38.49 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।


फिर भी अभी यह यूरोपीय संघ (181 अरब डॉलर), अमेरिका (172 अरब डॉलर), ब्राजील (93 अरब डॉलर), चीन (83 अरब डॉलर), कनाडा (69 अरब डॉलर), इंडोनेशिया (46 अरब डॉलर) और थाईलैंड (44 अरब डॉलर) से पीछे है। हालांकि इस पूरे परिदृश्य का एक सार यह भी है कि भारत 6 साल पहले बनाए गये शीर्ष को फिर से छू पाने में नाकाम रहा है, जबकि इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश आकार और खेती लायक जमीन में भारत के मुकाबले बहुत कम होने के बावजूद हमसे कहीं ज्यादा कृषि उत्पादों का निर्यात कर पा रहे हैं।

कोरोना महामारी के कारण मांग में आई हालिया गिरावट के लंबा चलने के कारण यह भी साफ है कि आने वाले वर्षों में हालात बेहतर नहीं होने जा रहे। अंतरराष्ट्रीय संगठन खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार अगले 10 वर्षों तक वैश्विक कमोडिटी बाजार में मंदी जारी रहने की संभावना है। ऐसे में भारतीय कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कुछ ठोस नीतिगत और ढांचागत कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

कृषि निर्यात बढ़ाने का WTC फॉर्मूला


इसी संदर्भ में बीते हफ्ते दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, जिन पर नजर डालना जरूरी है। सबसे पहले हफ्ते की शुरुआत में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (डब्ल्यूटीसी) की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कहा गया है कि कृषि में क्षमता निर्माण पर ध्यान देकर और किसानों की मदद कर भारत, इंडोनेशिया और थाईलैंड को कृषि उत्पादों के निर्यात में आसानी से पीछे छोड़ सकता है। इसकी रणनीति का खुलासा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि देश भर में फैले 715 कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) किसानों को खेती संबंधी सलाह देने और किसानों की मदद कर उन्हें ऐसी कमोडिटी का उत्पादन बढ़ाने को प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिनकी वैश्विक स्तर पर मांग है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय कृषि उत्पाद कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसलिए खारिज कर दिए जाते हैं कि उनमें कीटनाशकों की मात्रा ज्यादा होती है।

लेकिन KVK किसानों के साथ मिलकर उन्हें वैश्विक मानकों के अनुरूप कीटनाशकों और अन्य रसायनों का इस्तेमाल करने पर सलाह दे सकते हैं। डब्ल्यूटीसी ने साफ कहा है कि भारत को अब मात्रात्मक उत्पादन से आगे बढ़कर गुणात्मक उत्पादन पर ध्यान देना चाहिए। खासतौर पर हॉर्टिकल्चर फसलों के उत्पादन में गुणवत्ता, रंग, आकार और रासायनिक तत्वों की उपस्थिति को वैश्विक मानकों के अनुरूप रखने की जरूरत है ताकि भारतीय फलों और सब्जियों की मांग विश्व में बढ़े।

इस संदर्भ में FAO के आंकड़े काफी प्रासंगिक हैं, जिनके मुताबिक फलों और सब्जियों के उत्पादन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश होने के बावूजद भारत की हिस्सेदारी इनके वैश्विक निर्यात में महज 1.8% है। पपीता और नींबू के उत्पादन में भारत पहले नंबर पर है, लेकिन दुनिया के पपीता की मांग को हम केवल 3.2% पूरा कर पाते हैं, और नींब की मांग पूरा करने में हमारी केवल 0.5% हिस्सेदारी है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि पिछले एक दशक में भारत ने जिस तरह शिमला मिर्च, अरंडी के तेल, तंबाकू एक्ट्रैक्ट, बासमती चावल, मांस और समुद्री उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय प्रगति की है, उसी कहानी को अन्य खाद्य उत्पादों में भी दुहराया जाना चाहिए।

वित्त आयोग के विशेषज्ञ समूह की सिफारिशें


दूसरा महत्वपूर्ण डेवलपमेंट शुक्रवार (31 जुलाई) शाम को हुआ, जब 15वें वित्त आयोग द्वारा गठित कृषि निर्यात पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपीं। इस समूह को दो मोर्चों पर सिफारिश करने के लिए कहा गया था। एक तो कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए और दूसरा कृषि आयात पर ज्यादा निर्भरता वाली फसलों को घरेलू स्तर पर प्रोत्साहित करने के लिए। लेकिन खास बात यह है कि उन्हें इस बात पर सलाह देनी थी कि इन दोनों लक्ष्यों को हासिल करने के लिए राज्यों को किस तरह पुरस्कृत किया जाए। केंद्र सरकार द्वारा अपनाया गया यह एक बेहद महत्वपूर्ण नजरिया है, जिसमें राज्यों को आगे रखते हुए कृषि निर्यात की रणनीति तैयार की जा रही है।


समूह ने अपनी रिपोर्ट में  22 फसलों की वैल्यू चेन विकसित करने पर ध्यान दिया है। समूह की सिफारिशों में निर्यात को बढ़ाने के लिए तीन स्तंभों की रणनीति तैयार करने की बात कही गई है, जिसमें राज्य इंजिन की भूमिका निभाएंगे और निजी क्षेत्र के कंधों पर सारा दारोमदार होगा। केंद्र की भूमिका सहयोगी की होगी और वह चीजों को आसान और सहज बनाने पर काम करेगा। समूह ने अपनी रिपोर्ट में योजना के कार्यान्वयन को समर्थन देने और उसके लिए फंड की व्यवस्था करने के लिए एक संस्थागत तंत्र तैयार करने का खाका पेश किया है। समूह ने राज्यों की अगुवाई में जिस निर्यात योजना की सिफारिश की है, उसके तहत किए जाने वाले काम, उनकी समयसीमा और लक्ष्य, तीनों पहले से तय होंगे। यह योजना फसलों की वैल्यू चेन क्लस्टर पर आधारित होगी, जो कि उस क्लस्टर की निर्यात महत्वाकांक्षाओं को हासिल करने के लिए मौजूद अवसरों, पहल और निवेश की जरूरतों का निर्धारण करेगी।


उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि यदि इनपुट (खाद, बीज, कीटनाशक इत्यादि), बुनियादी ढांचा, प्रोसेसिंग और मांग में बढ़ोतरी के लिए आवश्यक कदम उठाने पर सरकार 8-10 अरब डॉलर का निवेश करने को तैयार हो, तो निर्यात की मात्रा को आसानी से बढ़ाकर 70 अरब डॉलर तक ले जाया जा सकता है। इतना ही नहीं, इससे निर्यात क्षेत्र में रोजगार के 70 लाख से 1 करोड़ नए अवसर भी पैदा होंगे और यह खेतों में बेहतर उत्पादकता और किसानों की आदमनी में बढ़ोतरी का रास्ता भी खोलेगा।


कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) एक्ट, आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA) और कॉन्ट्रैक्ट खेती जैसे कृषि सुधारों की घोषणा कर सरकार ने जिस इच्छाशक्ति का परिचय दिया है, उसी को आगे बढ़ाते हुए यदि डब्ल्यूटीसी और विशेषज्ञ समूह के सलाहों और सिफारिशों को सही तरीके से अमल में लाया जा सके तो भारत को आने वाले कुछ वर्षों में चौथा सबसे बड़ा कृषि उत्पाद निर्यातक बनने से कोई नहीं रोक सकता।


(लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)


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