किसान हितों की आड़ में चल रहा किसान आंदोलन का 'खेल' खत्म हो गया!

किसान संगठनों के अस्तित्व पर अब बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है क्योंकि किसानों को आढ़तियों के बंधन से मुक्त कराने की लड़ाई संगठन नहीं दिखे तो किसान संगठनों का बचा-खुचा प्रभाव भी ख़त्म हो सकता है
अपडेटेड Apr 15, 2021 पर 16:28  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

हर्ष वर्धन त्रिपाठी


किसानों के हितों के नाम पर चल रहे आंदोलन का पांचवा महीना चल रहा है। दुनिया में किसी भी आंदोलन के इतने समय तक लगातार चलने के कम उदाहरण हैं। ऐसा भी उदाहरण ध्यान में नहीं आता है कि इतने लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं को घेरकर कोई भी वर्ग बैठा हो।


इससे दिखता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के इरादे कितने मज़बूत हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही आंदोलन है, उनके जीवन-मरण के प्रश्न जैसा दिख रहा है, लेकिन प्रश्न यह खड़ा होता रहा है कि आख़िर इतने मज़बूत आंदोलन और आंदोलन करने वालों के साथ देश भर का किसान क्यों खड़ा नहीं हो रहा है। इसकी वजह समझने की कोशिश करते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ध्यान में आते हैं


किसान नेताओं ने आंदोलन की शुरुआत ही धमकी से की थी और किसानों को भी धमकाकर ही दिल्ली की सीमाओं तक लाया गया था। यहां तक कि गांवों से लोग आ नहीं रहे थे तो पंजाब में स्थानीय गुरुद्वारों और पंचायतों के ज़रिये लोगों को दिल्ली जाने के लिए दबाव बनाया गया।


इससे भी बात नहीं बनी तो हरियाणा और पंजाब की कुछ पंचायतों ने प्रति परिवार पांच हज़ार रुपये तक का जुर्माना लगाने की बात भी कही। जब दिल्ली में ट्रैक्टर परेड की तैयारी हुई तो साथ ही यह ख़बरें भी आईं कि, पंजाब के गांवों में किसानों को विकल्प दिया गया है कि अपना ट्रैक्टर लेकर दिल्ली चलो या फिर एक ट्रैक्टर के दिल्ली जाने की रक़म दो।

दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे आंदोलन में लगातार एनजीओ के सदस्यों के बने रहने की ख़बरें भी आती रहीं। कमाल की बात थी कि किसी भी मुद्दे पर काम करने वाले एनजीओ के लिए कृषि क़ानून पर आंदोलन में शामिल होना ज़रूरी शर्त जैसा हो गया था।


इससे आगे बढ़कर किसान आंदोलन को कनाडा से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधी संगठनों से समर्थन मिल रहा था। पंजाब में निजी कंपनियों के टावर तोड़े गए। भारतीय कंपनियों को नुक़सान करने की भावना भड़काने की कोशिश की गई। यह अनायास ही नहीं रहा होगा कि किसानों के नाम पर हो रहे इस आंदोलन में पर्यावरणवादियों से लेकर विदेशी सितारों और अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी तक चिंताग्रस्त हो गईं और ट्वीट करके शामिल भी हुईं।


कनाडा में किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन को समर्थन देने की आड़ में भारत विरोधी प्रदर्शन किए गए। किसानों के हित बचाने के लिए चल रहे आंदोलन की ज़मीनी पड़ताल करते इन बिंदुओं को ध्यान से देखने पर इस बड़े प्रश्न का जवाब मिल गया कि आख़िर इतने मज़बूत आंदोलन और आंदोलन करने वालों के साथ देश भर का किसान क्यों खड़ा नहीं हो रहा है।


और, अब जब किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन के टेंट ख़ाली हो चुके हैं। टिकरी-सिंघु और ग़ाज़ीपुर सीमाओं पर बैठे किसानों को काजू-किशमिश-बादाम वाले दूध और छप्पन भोग व्यंजनों की जगह सूखी रोटी और दाल-चावल मिल पा रहा है तब जाकर समझ आया कि दरअसल यह आंदोलन पूरी तरह से आढ़तियों और बड़े किसानों के अवांछित लाभ को बनाए रखने के लिए हो रहा है।


इसका सबसे बड़ा प्रमाण तब सामने आया जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कहा कि, फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और दूसरी एजेंसियां सरकारी ख़रीद की रक़म किसानों के खाते में सीधे देंगी। पंजाब की अमरिंदर सरकार पहले तो आढ़तियों के ज़रिये ही किसानों को सरकारी ख़रीद की रक़म देने पर अड़ी रही।


लेकिन जब केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि सीधे किसान के खाते में रक़म देने की व्यवस्था राज्य सरकार नहीं करेगी तो सरकारी ख़रीद नहीं शुरू होगी, इसके बाद पंजाब की कांग्रेस सरकार ने आढ़तियों को बीच में डाल दिया और सरकारी ख़रीद के सॉफ़्टवेयर का हिस्सा पे नाऊ बटन को बना दिया, आढ़तिये के यह बटन दबाने के बाद ही किसान को भुगतान जाएगा।


हालांकि, केंद्र सरकार की तरफ़ से आढ़तियों के लिए बाध्यता की गई है कि 48 घंटे में किसान को रक़म देने की स्वीकृति दें और ऐसा नहीं करने पर 72 घंटे में स्वचालित तरीक़े से किसान के खाते में पूरी रक़म चली जाएगी, लेकिन इसके बाद आने वाली ख़बरों ने किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन की पूरी आड़ ख़त्म कर दी है।


पंजाब में आढ़तियों ने किसानों को उपज सरकारी ख़रीद में बेचने के लिए एक ऐसी शर्त लगा दी है जो स्पष्ट तौर पर किसानों को आर्थिक तौर पर बंधक बनाने की कोशिश है। पंजाब के कई ज़िलों से ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि आढ़तियों ने किसानों से ख़ाली चेक पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश शुरू कर दी है और, किसान को मिलने वाली सरकारी ख़रीद की रक़म में से तय रक़म हासिल करने का दबाव बना रहा है।


पंजाब में किसान कितना डरा हुआ इसका अनुमान इसी से लगता है कि किसान खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि क़रीब 5 महीने से किसानों के नाम पर चल रहा आंदोलन किसानों के हितों को नहीं बल्कि किसानों की आड़ में सरकारी ख़रीद के ज़रिये अवांछित लाभ कमाने वालों आढ़तियों, दलालों के हितों को बचाने की कोशिश है।


इसीलिए किसान अब इस आंदोलन का हिस्सा क़तई नहीं रह गए हैं। किसान आंदोलन के नाम पर जमावड़ा करने के लिए बनाए गए टेंट ख़ाली हो गए हैं। किसान संगठनों के अस्तित्व पर अब बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है क्योंकि किसानों को आढ़तियों के बंधन से मुक्त कराने की लड़ाई संगठन नहीं दिखे तो किसान संगठनों का बचा-खुचा प्रभाव भी ख़त्म हो सकता है। किसान आंदोलन की किसान हितों के लिए आंदोलन वाली आड़ ख़त्म हो चुकी है।


(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और हिंदी ब्लॉगर हैं)


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