कोरोनावायरस संक्रमण की वजह से कृषि क्षेत्र में हुए कई बड़े सुधार

मोदी के सत्ता में आने के बाद मृदा परीक्षण से लेकर ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) तक कई नई परियोजनाएं शुरू हुईं और साथ ही वेयरहाउसिंग पर जोर देने से लेकर एपीएमसी कानून में सुधार तक की बातें लगातार सुनी गईं
अपडेटेड May 18, 2020 पर 13:29  |  स्रोत : Moneycontrol.com

भुवन भास्कर


कोरोना को चाहे आप गालियां लाख दे लें, लेकिन एक बात के लिए इसे श्रेय देना होगा कि इसने नरेंद्र मोदी सरकार को आखिरकार वह करने को मजबूर कर दिया, जिसका पूरे देश और खासकर, कृषि जगत को पिछले 6 साल से इंतजार था। जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तो कृषि को लेकर उनके रवैये में एक नयापन था। इससे पहले की तमाम सरकारों ने दशकों तक कृषि और किसानों के लिए ज्यादातर चुनाव के समय रेवड़ियां बांटने और सब्सिडी के खेल से सबको खुश करने तक ही अपने को सीमित रखा था। शायद ही कभी कृषि उपज की मार्केटिंग, किसानों को उपज का सही भाव दिलाने, उपज की गुणवत्ता में बढ़ोतरी करने के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने और कृषि में ज्यादा से ज्यादा तकनीक और मशीनों का इस्तेमालसुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस नीतिगत पहल की गई। लेकिन 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद मृदा परीक्षण से लेकर ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) तक कई नई परियोजनाएं शुरू हुईं और साथ ही वेयरहाउसिंग पर जोर देने से लेकर एपीएमसी कानून में सुधार तक की बातें लगातार सुनी गईं। लेकिन इन सबके बावजूद सरकार अंतिम तौर पर कृषि सुधारों से हिचकिचाती रही। न तो एपीएमसी में सुधार हुए, न ई-नाम में गति आई।


कृषि राज्य सरकारों का विषय है और आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र सरकार के सुधारों को बीजेपी शासित राज्यों तक में अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा था। इसी संदर्भ में शुक्रवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन की कृषि से संबंधित घोषणाएं ऐतिहासिक कही जा सकती हैं। वैसे तो 1.30 लाख करोड़ रुपये के मदद की ये घोषणाएं पिछले कुछ वर्षों में की गई कर्ज माफी की तुलना में भी छोटी नजर आती है, लेकिन इनमें जो सुधारात्मक दिशानिर्देश हैं, उनके परिणाम अगले 3-4 वर्षों में अद्भुत रूप में सामने आ सकते हैं। इन घोषणाओं के माध्यम से ही इन्हें संक्षेप में समझने का प्रयास करते हैं –


1. कृषि बुनियादी ढांचा कोषः केंद्र सरकार ने खेती-बाड़ी से संबंधित बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की मदद देने की घोषणा की है। यह रकम किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), प्राथमिक कृषि-सहकारिता समितियों (पैक्स), कृषि उद्यमियों, स्टार्टअप और संग्राहकों के माध्यम से फसलों की सफाई, ग्रेडिंग और असेईंग के लिए, उपज की खरीद के लिए और ठंडा घर तथा वेयरहाउसिंग के लिए खर्च की जाएगी। एफपीओ और पैक्स को मिलने वाली मदद से जहां किसानों को खेती में इन सुविधाओं का सीधा फायदा होगा, वहीं स्टार्टअप और कृषि उद्यमी इन फायदों को मॉनिटरी तौर पर भुना सकेंगे।किसानों के लिए किए गए फैसलों का फायदा उन्हें तभी मिल सकता है, जब उनके गुणवत्ता पूर्ण उत्पादों के लिए उचित बाजार तैयार हो और उस बाजार तक माल पहुंचाने के लिए सही चैनल मिल सके। इसी को ध्यान में रखते हुएइस कोष से इंडस्ट्री को भी जोड़ा गया है।इसका मतलब है कि किसानों की उत्पादकता बढ़ने और उनकी फसलों की गुणवत्ता बढ़ने सेउनके माल को न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी बाजार मिलने में सहूलियत होगी और कृषि उद्यमी तथा स्टार्टअप इसमें माध्यम की भूमिका निभाएंगे।


2. एपीएमसी निष्प्रभावीः सीतारमन ने कोरोना के कारण पैदा हुए डर के माहौल का भरपूर दोहन करते हुए कुछ ऐसे महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले किए हैं, जो सामान्य समय में राज्यों और विपक्षी पार्टियों को एक बार फिर केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट होने का बहाना बन सकते थे। इनमें सबसे बड़ा कदम एपीएमसी (कृषि उत्पाद विपणन समिति) कानून में बदलाव करने का है। हालांकि सरकार अब तक पिछले 6 सालों से इसमें सुधार के लिए लगातार प्रयास कर रही थी, लेकिन स्थानीय मंडियों की राजनीति और दबाव समूहों के कारण राज्य सरकारें इसमें खास रुचि नहीं ले रही थीं। अब शुक्रवार को निर्मला सीतारमन ने कृषि विपणन के लिए एक नया केंद्रीय कानून बनाने की घोषणा कर सारा खेल पलट दिया है। अब न किसानों को अपना माल मंडियों में बेचने की बाध्यता होगी और न ही एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता होगी।


3. अनिवार्य वस्तु अधिनियम 1955 में सुधारः


इसके साथ ही सरकार ने अनिवार्य वस्तु अधिनियम 1955 में भी संशोधन की घोषणा की है, जो दरअसल व्यापारियों को कालाबाजारी और मुनाफाखोरी से रोकने के लिए बनाया गया था। पिछले 65 सालों में हालांकि इसमें कई सुधार किए गये हैं, लेकिन अब भी यह कानून किसानों का सबसे बड़ा दुश्मन साबित हो रहा था। वो इसलिए क्योंकि इसके कारण किसान दलहन, तिलहन जैसी फसलों के दाम गिरने पर तो किसान तबाह हो सकता था, लेकिन यदि दाम किसी कारण से बढ़ जाएं, तो उसे उसका फायदा नहीं मिल सकता था। अब नए नियम के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में इस अधिनियम का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। इससे व्यापारी अब ज्यादा स्टॉक भी कर सकेंगे।हालांकियहांयहकहना बहुत आवश्यक है कि इस कानून के न होने का का दुरुपयोग न हो और वास्तव में किसानों को इसका फायदा मिल सके, इसके लिए सरकार को कृषि विपणन व्यवस्था को डायनेमिक बनाने की अपनी योजनाओं को अधिकतम प्रभाव के साथ कार्यान्वित करना होगा, नहीं तो किसान एक बार फिर व्यापारियों के लोभ का शिकार बन सकते हैं।


4. कृषि आधारित व्यवसायः बजट में की गई मत्स्य संपदा योजना के लिए 20000 करोड़ रुपये की घोषणा की गई है, जिसमें से 11000 करोड़ रुपये समुद्री और मीठे पानी की मछलियों के पालनऔरएक्वाकल्चर में खर्च किए जाएंगे, जबकि 9000 करोड़ रुपये सप्लाई चेन विकसित करने और फिशिंग हार्बर, कोल्ड चेन जैसे बुनियादी ढांचे पर खर्च किए जाएंगे।


5. हर्बल खेती को बढ़ावाः कृषि को विदेशी मुद्रा का साधन बनाने और किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख हेक्टेयर जमीन पर आयुर्वेदिक खेती को बढ़ावा देने का फैसला किया है और इनसे बने उत्पादों को प्रोत्साहन देने के लिए 2 लाख माइक्रो फूड एंटरप्राइजेज की मदद के लिए 10000 करोड़ रुपये का फंड मुहैया कराया गया है।


गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने पिछले कुछ दिनों में पहले ही एपीएमसी कानून को बदलकर किसानों को अपना माल लाभ के लिहाज से सीधे बेचने की सहूलियत दी है। ये ऐसे सुधार हैं, जिनके साथ भारतीय कृषि ने एक चक्र पूरा कर लिया है। फिलहाल अगले कुछ वर्षों या कहें कि दशकों के लिए, अब सरकारों की चुनौती इन्हीं सुधारों का पूरा लाभ किसानों को दिलाने तक सीमित रहेगी। इन अर्थों में सचमुच कोरोना को भारतीय कृषि के युगांतर में महत्वपूर्ण मील के पत्थर के रूप में याद किया जाएगा।


लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं


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