किसानों की कामयाबी की कहानी रच रहा गुजरात का बनास FPC

FPC के कारोबार में एक बार किसानों से खरीद के बाद बेचने पर जो मुनाफा होता है, उसका एक हिस्सा फिर से किसानों के पास आता है क्योंकि इसमें किसान ही कंपनी का शेयरधारक होता है
अपडेटेड Jul 06, 2020 पर 18:45  |  स्रोत : Moneycontrol.com

भुवन भास्कर


गुजरात में पाटन जिले के विक्रम भाई जडेजा के घर में जीरे का भंडार पड़ा था, जो उन्होंने मार्च के आखिर में हार्वेस्ट किया था और अब वह उसे बेचने की तैयारी में थे। तभी 25 मार्च को कोरोना प्रकोप के कारण हुए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हो गई। जडेजा को पैसों की जरूरत थी, लेकिन मंडियां बंद हो गई थीं। लिहाजा जडेजा ऊंझा में अपने आढ़तिये के पास पहुंचे और मदद मांगी। आढ़तिये को यह कारोबार का बेहतरीन मौका लगा और उसने जडेजा का जीरा खरीदने की पेशकश की। जडेजा ने भाव जानने की कोशिश की तो आढ़तिये ने कहा, “भाव कहां है कुछ। न बाजार है, न खरीदार। तो 115 रुपये किलो के हिसाब से दे दूंगा।” जडेजा को पता था कि यह बाजार में जीरे के भाव से काफी कम है। लेकिन उनके पास विकल्प नहीं था। उन्होंने अपना माल आढ़तिये को कम भाव में बेचकर पैसे लिए और वापस लौट गये। अगले दिन सांतलपुर ब्लॉक के अपने गांव वर्नोसरी में जब विक्रम भाई जडेजा की मुलाकात कर्षन भाई जडेजा से हुई, जो कि उनकी किसान उत्पादक कंपनी (FPC) के अध्यक्ष हैं, तो उन्होंने सारा वृत्तांत कह सुनाया। किसान उत्पादक कंपनियां दरअसल ऐसी कंपनियां होती हैं, जिनके शेयरधारक और सीईओ सहित तमाम अधिकारी किसान ही होते हैं। वाई के अलघ कमेटी की सिफारिश पर साल 2002 में यह कंसेप्ट आया जिसके तहत 10 या उससे अधिक किसान मिलकर कंपनी एक्ट के तहत इसे रजिस्टर कर सकते हैं और फिर उपज की खरीद, बिक्री, निर्यात जैसी गतिविधियां कर सकते हैं।


बनास FPC के किसान मुख्य रूप से जीरा और अरंडी की खेती करते हैं और साल का यह समय ऐसा होता है, जब इन दोनों ही फसलों की कटाई के बाद एफपीसी अपने किसानों से इनकी खरीद करती है। लेकिन 25 मार्च को एकाएक लॉकडाउन की घोषणा के बाद बनास FPC का कामकाज ठप पड़ा था। ऐसे में विक्रम भाई की कहानी ने जैसे बनास FPC के लिए एक झटके का काम किया। संगठन के अध्यक्ष कर्षन भाई ने तुरंत एफपीसी के दूसरे अधिकारियों से बात की और तय किया गया कि खरीदारी शुरू की जाएगी। सांतलपुर ब्लॉक के 21 गांवों में फैले बनास एफपीसी के 1225 शेयरधारक किसानों के लिए 5 गांवों में पहले से मौजूद इनपुट सप्लाई केंद्रों को खरीदी केंद्र में बदल दिया गया और खरीदारी शुरू हो गई। मंडियां बंद थीं, तो FPC ने तय किया कि कृषि कमोडिटी एक्सचेंज NCDEX के वायदा प्लेटफॉर्म पर चल रहे इन कमोडिटी के भाव के आधार पर ही खरीद कीमत तय की जाए।


बनास FPC ने लॉकडाउन के दौरान 71 किसानों से 132 रुपये प्रति किलो के औसत भाव पर लगभग 32.5 टन जीरे की खरीद की, जबकि इस दौरान 3667 रुपये प्रति क्विंटल के औसत भाव पर अरंडी की खरीद 80 टन रही। 23 अप्रैल को जीरे की और 4 मई को अरंडी की राधनपुर मंडी में खरीद शुरू होने के बाद वहां के भाव के आधार पर FPC ने खरीद शुरू किया। और मई के आखिर तक कुल मिलाकर बनास FPC ने 155 किसानों से जहां 62.5 टन जीरा खरीदा, वहीं 232 किसानों से 272 टन से कुछ ज्यादा अरंडी की खरीद की। इससे बनास FPC के किसान एक तो लॉकडाउन के दौरान भी अपनी उपज आसानी से बेच पाए, वहीं उन्हें बेहतर भाव मिला और तुरंत भुगतान भी हासिल हो गया।


इसके बाद बनास FPC ने जब लॉकडाउन खुला, तब ऊंझा के बड़े व्यापारियों से सीधे मोलभाव कर 142 रुपये प्रति किलो के भाव पर 6 टन जीरा बेचा, वहीं 30 टन जीरा 146 रुपये के भाव पर सीधे तमिलनाडु भेज दिया। इसके अलावा 15 टन जीरा उसने एनसीडीईएक्स के वायदा प्लेटफॉर्म पर बेचा। इसी तरह अरंडी में भी बनास एफपीसी ने 80 टन माल NCDEX पर बेचा, जबकि करीब 200 टन सीधे बड़े व्यापारियों को बेचा। जहां व्यापारियों को सीधे माल बेचने से उनका मुनाफा मार्जिन बेहतर हुआ, वहीं NCDEX पर हेजिंग के जरिए उन्होंने सीधी कमाई करने के अलावा कई तरह की छूट का लाभ भी उठाया जो बाजार नियामक सेबी के निर्देशानुसार एक्सचेंज किसान संगठनों को देता है। जीरे में यह छूट 6.5 रुपये प्रति किलो तक है, जो सीधे FPC के मुनाफा मार्जिन में जुड़ता है।


FPC के कारोबार में एक बार किसानों से खरीद करने के बाद बेचने पर जो मुनाफा होता है, उसका एक हिस्सा फिर से किसानों के पास आता है क्योंकि इसमें किसान ही कंपनी का शेयरधारक होता है। बनास FPC के अपने लेजर के मुताबिक इस पूरे कारोबार में हर जीरा किसान को 5665 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हुई, जबकि अरंडी के हर किसान को 4037 रुपये अतिरिक्त मिले। यानी यदि ये किसान FPC की जगह अपना माल मंडी में लेकर गये होते तो उन्हें इतना कम आमदनी होती। और खास बात यह है कि ये उस दौरान हुआ, जब पूरे देश का आम किसान अपनी उपज को औने-पौने दामों में बेचने के लिए मजबूर हो रहा था।


बनास FPC ने इस मुश्किल समय को जिस तरह अपने किसानों के लिए उपयोग किया, उसी का नतीजा था कि जहां पिछले पूरे साल में कंपनी का कुल टर्नओवर 3.12 करोड़ रुपये रहा, वहीं सिर्फ मार्च-जून तक के तीन महीनों में कंपनी ने 2.1 करोड़ रुपये का कामकाज कर लिया। इतना ही नहीं, बनास एफपीसी ने 6 जून को एपीएमसी कानून में सुधार के लिए जारी अध्यादेश के महज 2 दिनों बाद यानी 8 जून को अपना माल बिना मंडी सेस दिए ऊंझा में बेचा। यह एक रोचक कहानी है, जिसमें किसान सशक्तीकरण के लिए एक महीन संदेश भी छिपा है। बनास एफपीसी के अध्यक्ष कर्षन भाई ने कहा, “हम 6 टन जीरे से भरी ट्रॉली लेकर ऊंझा जा रहे थे, तभी FPC के फ्लाईंग स्क्वॉड ने हमें रोक लिया। उन्होंने हमसे सेस रसीद मांगी। जब हमने उन्हें कहा कि सरकार ने नियम बदल दिये हैं और हमें सेस देने की कोई जरूरत नहीं है, तो वे मानने को तैयार ही नहीं थे। लेकिन हमने पास में एक अखबार की कतरन रखी थी और साथ ही अध्यादेश का एक प्रिंट भी रखा था। सो उन्हें मानना ही पड़ा।”


FPC के पहले के नियम अनुसार बनास FPC यदि राधनपुर मंडी एरिया में माल बेचती, तो उसे 100 रुपये पर 50 पैसे का सेस देना होता, लेकिन यदि वह ऊंझा एपीएमसी एरिया में माल बेच रही होती, तो उसे 100 रुपये पर 80 पैसे का सेस देना होता था। “केंद्र सरकार के इस नए नियम से जहां किसानों को कुछ अतिरिक्त आय हुई है, वहीं सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमारा करीब 2 दिन का समय बचा, जो हमें मंडी सेस की रसीद में लगाना होता था। अब हम दिन या रात, कभी भी गाड़ी भर कर माल बेचने कहीं भी जा सकते हैं। इसी दौरान हमने पहली बार तमिलनाडु भी माल भेजा है,” कर्षन भाई ने कहा।


बनास FPC की यह कहानी न तो कारोबारी सफलता की है, और न ही ज्यादा मुनाफेदारी की। यह कहानी दरअसल किसानों की आर्थिक आजादी और सशक्तीकरण की है। बनास FPC जैसे देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे एफपीसी एक ऐसा मॉडल पेश कर रहे हैं, जो दरअसल हर तरह की सरकारी नीतियों की सफलता की गारंटी बन सकते हैं। इसीलिए 5 साल में 10000 एफपीसी तैयार करने का मोदी सरकार का लक्ष्य वास्तव में भारतीय कृषि और कृषकों की तस्वीर बदल सकता है, बशर्ते कि उनकी नींव मजबूत हो और संचालन की जिम्मेदारी ईमानदार और उत्साही हाथों में हो।


लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं.


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