Lockdown: किसानों की जिंदगी पटरी पर कब तक लौटेगी?

लॉकडाउन के बीच किसानों को काम करने की छूट तो है लेकिन क्या इससे उनकी मुश्किल आसान हो गई है
अपडेटेड May 14, 2020 पर 17:36  |  स्रोत : Moneycontrol.com

कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण देश भर में पैदा हुई मेडिकल इमरजेंसी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 40 दिनों के अभूतपूर्व देशव्यापी लॉकडाउन से वैसे तो हर कोई प्रभावित हुआ है, लेकिन देश के मजदूर और किसानों के लिए यह असर सीधे तौर पर उनकी आजीविका, आमदनी और जिंदगी से जुड़ा हुआ है। इनमें भी किसानों पर पड़ने वाली मार और विकट है क्योंकि मजदूर तो महीने-दो महीने बाद स्थितियां सामान्य होने के बाद अपने काम पर लौट सकता है और उसकी जिंदगी पटरी पर लौट सकती है।


लेकिन किसानों के लिए यह संकट डोमिनोज इफेक्ट पैदा करने वाला है क्योंकि यह लॉकडाउन ठीक उस समय हो रहा है, जब किसान के लिए अपनी महीनों की मेहनत से तैयार रबी फसल काटने का वक्त है। इस कटाई के बाद उसे फसल बेचनी है और बिक्री से मिली रकम से पिछले 4-6 महीनों के खर्चों, खरीफ की बुवाई का खर्च और आने वाले महीनों में अपने घर-परिवार के खर्चों को पूरा करना है।


ऐसे में किसानों के लिए यह लॉकडाउन जीवन-मरण का प्रश्न बन कर सामने आया है। इसीलिए केंद्र और कई राज्य सरकारों द्वारा किसानों को सीधे खाते में कुछ सहायता राशि पहुंचाने के बावजूद फसलों की कटाई और उनकी मार्केटिंग को लेकर कुछ पुख्ता प्रबंध करने का दबाव 25 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने के अगले ही हफ्ते से सरकारों पर बनने लगा था। इसी संदर्भ में 2 और 4 अप्रैल को भारत सरकार के किसान कल्याण मंत्रालय ने दो अधिसूचनाएं जारी कीं, जिनमें इस दिशा में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गये।


राज्य सरकारों से यह अनुरोध किया गया कि वेयरहाउसिंग डेवलपमेंट रेगुलेटरी अथॉरिटी (WDRA) से पंजीकृत वेयरहाउस को डीम्ड मार्केट (मंडियों) का दर्जा दे दिया जाए और किसानों तथा किसान समूहों (FPO, पैक्स, SHG इत्यादि) को सीधे वेयरहाउस से और अपने उपज संग्रहण केंद्रों से E-NAM (इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार) के जरिए अपनी उपज बेचने की सुविधा दे दी जाए। इसके लिए केंद्र ने राज्य सरकारों से कृषि उपज विपणन समिति (APMC) अधिनियम को भी फिलहाल स्थगित करने को कहा।


इतना ही नहीं, किसानों को तुरंत वित्तीय सहायता हासिल हो, इसके लिए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने वेयरहाउस से ई-नाम के जरिए होने वाली बिक्री पर e-NWR (इलेक्ट्रॉनिक निगोशिएबल वेयरहाउसिंग रिसीट) जारी करने की सहूलियत भी लॉन्च की। e-NWR की सुविधा 2017 में शुरू की गई थी, जिसके तहत WDRA से पंजीकृत वेयरहाउस इसे जारी कर सकते हैं और इसके आधार पर किसानों को न सिर्फ बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं से कर्ज की सुविधा मिल जाती है, बल्कि वे अपनी उपज को बिना वेयरहाउस से बाहर निकाले उसके किसी भी हिस्से को बेच सकते हैं या वायदा बाजार में उसका कारोबार कर सकते हैं।


ये आदेश महत्वपूर्ण होने के बावजूद नाकाफी थे, क्योंकि इस समय पूरे देश में WDRA के पास पंजीकृत वेयरहाउस की संख्या मात्र 1798 है और इनकी सम्मिलित क्षमता केवल 96.06 लाख टन है। सिर्फ गेहूं उत्पादन की बात करें, तो इस वर्ष वह 31 करोड़ टन रहने की उम्मीद है। चना, सरसों इत्यादि तो हैं ही। वहीं E-NAM पर पंजीकृत किसानों की कुल संख्या अभी 18 राज्यों में महज 1.66 करोड़ है। इनमें भी ऐसे किसानों की संख्या तो बहुत ही कम है, जिन्होंने वास्तव में ई-नाम पर अपनी उपज बेची है। जाहिर है कि करीब 12 करोड़ किसानों को राहत पहुंचाने का काम केवल इस आदेश से पूरा नहीं हो सकता था।


इसलिए 14 अप्रैल को देशव्यापी लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ाने की प्रधानमंत्री की घोषणा के अगले ही दिन गृह मंत्रालय ने जो दिशानिर्देश जारी किए, उनमें 20 अप्रैल से कृषि और हॉर्टिकल्चर की सभी गतिविधियों को बंदी से बाहर रखा गया है। अगले हफ्ते से मंडियों में गेहूं की आवक शुरू हो जाएगी। ऐसे में सभी MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) आधारित कामकाज और कृषि उपज की खरीद में लगी एजेंसियों को भी बंदी से बाहर रखा गया है। न केवल एपीएमसी मंडियों के कामकाज को अनुमति दी गई है, बल्कि APMC को मंडी परिसरों तक ही सीमित कर दिया गया है। इसका असर यह होगा कि कंपनियां और एजेंसियां गांव स्तर पर सीधे किसानों से उपज की खरीद कर सकेंगी।


खरीफ की बुवाई को देखते हुए कृषि में काम आने वाली मशीनें और उनके पुर्जे बेचने वाली दुकानें खुली रहेंगी और खाद, बीज और कीटनाशकों के खुदरा विक्रेताओं को भी काम करने की छूट दे दी गई है। इनके अलावा कटाई और बुवाई से संबंधित कृषि और हॉर्टिकल्चर उपकरणों और कंबाइंड हार्वेस्टर जैसी मशीनों के परिवहन को भी लॉकडाउन की बंदिशों से बाहर रखा गया है।


इसमें कोई शक नहीं कि ये कदम बिलकुल ठीक समय पर उठाए गये हैं और अब इस बात की पूरी उम्मीद है कि किसानों की समस्याओं का ठीक तरीके से समाधान हो सकेगा। लेकिन आम दिनों में मंडियों की गहमागहमी, एमएसपी खरीद केंद्रों की भीड़ और कृषि इनपुट की दुकानों पर होने वाली धक्कामुक्की को देखते हुए सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी कि व्यक्तिगत दूरी (Social Distancing) सुनिश्चित करते हुए इन तमाम निर्देशों को सही तरीके से अमल में लाया जा सके।


भुवन भास्कर- लेखक आर्थिक और कृषि मामलों के जानकार हैं


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