New IT Rules: कितनी कारगर होगी सोशल मीडिया पर लगाम कसने की कवायद

IT के लिए दो दशक पुराने कानून हैं। उस कानून को आधार पर मानकर मंत्रालय ने नियम बनाए हैं
अपडेटेड Feb 28, 2021 पर 10:24  |  स्रोत : Moneycontrol.com

चंदन श्रीवास्तव


मिर्जा गालिब के वक्त में जारी पढ़ाई-लिखाई के चलन का पता देता एक शेर यों है कि मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये--हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले। हमारा वक्त मिर्जा साहेब के वक्त से कोई डेढ़ सदी दूर चला आया है और बहुत कुछ बदला है, तो बहुत कुछ नहीं भी बदला। इस लंबे अरसे में खत लिखने की बेचैनी नहीं बदली। लिखवैये सुबह से लेकर गई रात तक खत लिखने के लिए बेचैन दिखते हैं। कह लीजिए कि मिर्जा साहेब के वक्त में दिन जागने के लिए और रातें सोने के लिए होती थी तो अबके 24 इनटू 7 के वक्त के फार्मेट में किसी रात की कोई सुबह और किसी किसी सुबह की कोई शाम नहीं, अब चौबीस घंटे जाग ही जाग है।


हां, एक बात बड़े निर्णायक तौर पर बदल गई है। अब लोगों को खत लिखवाने के लिए गालिब सरीखे किसी कलम के धनी का इंतजार नहीं होता। सभी लिखवैये हैं। लोग अब अपनी ख्वाहिशों के नाम लिखे जाने वाले खत खुद ही लिखने और भेजने लगे हैं। गालिब के जमाने की तरह खतों को उनके पते पर पहुंचाने के लिए लोगों को अब किसी हरकारे का इंतजार नहीं होता, खत खुद ही से पहुंचाने भी लगे हैं लोग। खतों को हमारे वक्त में पोस्ट कहा जाता है, खत लिखने पर आमादा लिखवैयों को सोशल मीडिया यूजर्स और हरकारे का जिम्मा सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने संभाल लिया है !


और, हिन्दुस्तान में ये कमाल हुआ है स्मार्टफोन के सहारे।


सोशल मीडियाः देश से बड़ा देश और सरकार की मुश्किल


स्मार्टफोन्स की तादाद गजब की तेजी से बढ़ रही है। कोई साल भर पहले की बात है, मार्केट रिसर्च फर्म टेकएआरसी के हवाले से खबर आयी थी कि भारत में लगभग 50 करोड़ लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये भी लिखा था कि इंटरनेट की आभासी दुनिया में लोगों की जो आवन-जावन और धमाचौकड़ी यानि वेबट्रैफिक है उसका 77 फीसद हिस्सा सिर्फ स्मार्टफोन के जरिए हो रहा है। स्मार्टफोन की बढ़ती और वेबट्रैफिक की गलियारे में लोगों की बढ़ती धमाचौकड़ी का सीधा रिश्ता सोशल मीडिया के महाबलियों फेसबुक, ट्वीटर, ह्वाट्सएप्प, यूट्यूब वैगरह से है। एक आकलन के मुताबिक आज के हिन्दुस्तान में WhatsApp के 53 करोड़ उपभोक्ता हैं, यूट्यूब के 44.8 करोड़। फेसबुक 41 करोड़ उपभोक्ताओं के साथ तीसरे नंबर पर है तो इंस्टाग्राम 21 करोड़ उपभोक्ताओं के साथ चौथे नंबर पर। और, इन सबके पीछे-पीछे ट्वीटर की चिड़िया 1.75 करोड़ उपभोक्ताओं के आभासी आंगन में चहचहा रही है। पैदल गणित का नमूना पेश करते हुए अगर सोशल मीडिया प्लेटफार्म के इस यूजरबेस को एक साथ मिला दें तो कुल संख्या 160 करोड़ के पार चली जायेगी। मतलब, हिन्दुस्तान की आबादी से ज्यादा बड़ा हिन्दुस्तान अब सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर आबाद है।


देश से बड़े इस देश को कैसे संभालें ? वक्त के 24 इन्टू सेवेन के फारमेट में इतनी बड़ी आबादी क्या गा-बजा, सुना-दिखा और लिख-पढ़ और पढ़वा रही है इसका पता कौन लगाये ? ये पता कैसे इस तरह लगाया जाय कि लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी और निजता के अधिकार में दखलंदाजी होती ना लगे ? और, जो पता ना लगाया जाय तो फिर इंटरनेट की आभासी दुनिया से चौबीसों घंटे देश की एकता, अखंडता, सांप्रदायिक सौहार्द् में खलल डालने की जो खुराफातें होती हैं, किसी को गुमनाम तो किसी को बदनाम करने के जो करतब दिखाये जाते हैं, उनपर लगाम कैसे लगे ? खुराफातों पर लगाम लगे लेकिन ख्यालों के इजहार की आजादी पर नहीं और जब लगाम लगे तो लोगों की जो प्रायवेसी है उसमें किसी किस्म की सेंधमारी ना हो — इन दो बातों का ख्याल लोकतंत्र में जिस हद तक सरकारें करती हैं उसी हदतक उन्हें लोकतांत्रिक निजाम माना जाता है। जाहिर है फिर सूचना प्रौद्योगिकी का मंत्रालय के जो इन्फार्मेशन टेक्नॉलॉजी (इन्टरमीडियरी गाइडलाइन्स एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रुल्स 2021 नाम के नये नियम आये हैं, उन्हें भी इसी नजरिए से देखा-परखा जायेगा।


क्या कहते हैं नए नियम


इस सिलसिले की पहली बात तो यही कि मंत्रालय नियम लेकर आया है, कानून नहीं। कानून तो दो दशक पुराना(आईटी एक्ट 2000) है, उस कानून को आधार मानकर नये नियम बनाये गये हैं। गजट में घोषणा हो जाने के बाद इन नियमों को अमल में आना है। आप मानकर चलिए कि ज्यादातर नियम तीन माह के अन्दर अमल में आ जायेंगे।


नये नियम सोशल मीडिया प्लेटफार्म, ओटीटी यानि ओवर-द-टॉप प्लेटफार्म( जैसे अमेजन वीडियो, नेटफ्लिक्स) और डिजिटल मीडिया के बाबत हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बारे में विधान है कि उन्हें किसी मैसेज या ट्वीट (संदेश) के फर्स्ट ओरिजिनेटर(उद्भावक) के बारे में बताना होगा। इसके पीछे सरकार की एक मंशा ये है कि सोशल मीडिया की कंपनियों को लेकर उपभोक्ताओं को कोई शिकायत है तो वे इस शिकायत का निवारण करें। 


इसका मैकेनिज्म ये है कि सोशल मीडिया कंपनियों को चीफ कंपलायन्स ऑफिसर (अनुपालन अधिकारी) रखना होगा। उसका जिम्मा नये नियमों का अनुपालन करवाने की होगी। एक नोडल आफिसर रखना होगा जो कानून के अमल से जुड़ी एजेंसी से आठो पहर संपर्क में होगा। और कंपनियों को एक रेजिडेंट ग्रेवांस ऑफिसर भी तैनात करना होगा जो शिकायत निवारण की विहित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए जरुरी कार्रवाई करेगा। ये तीनों ही अधिकारी भारत के निवासी होने चाहिए। अगर कोई ऐसी शिकायत आती है कि सोशल मीडिया के उपभोक्ता की गरिमा की हानि हो रही है, मिसाल के लिए किसी महिला की अस्मिता को चोट पहुंचाने वाला कोई कृत्य सोशल मीडिया पर चढ़ता और बढ़ता है तो ये अधिकारी तय करेंगे कि ऐसा संदेश 24 घंटे के अन्दर हटा लिया जाये। सोशल मीडिया कंपनियों को इस बाबत हर माह कंपलायन्स(अनुपालन) रिपोर्ट भी देनी होगी।


इसी से जुड़ा एक हिस्सा ये है कि जिस संदेश को लेकर शिकायत है उसके फर्स्ट ओरिजिनेटर(प्रथम उद्भावक) के बारे में सोशल मीडिया कंपनियों को हर वक्त नहीं बल्कि विशेष आदेश पर बताना होगा। गाइडलाइन्स रुल्स(2021) के नियम संख्या 5(3) में स्पष्ट कहा गया है कि मैसेजिंग प्लेटफॉर्म जिसके उपभोक्ता केंद्र द्वारा निर्धारित संख्या से ज्यादा हों, उन्हें सक्षम न्यायाधिकरण(कंपिटेंट ज्यूरीस्डिक्शन) के आदेश पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 के तहत संदेश के प्रथम उद्भावक के बारे में अपने कंप्यूटर रिसोर्स के सहारे जानकारी देनी होगी। अगर संदेश को प्रथम उद्भावक भारत के बाहर का हुआ तो प्रथम उद्भावक उसे माना जायेगा जिसने भारत में संदेश-विशेष को पहली बार अपने पोस्ट या ट्वीट आदि में जगह दी या उसका प्रथम प्रसारक बना। 


नये नियमों में ओटीटी अमेजन वीडियो सरीखे ओटीटी कंटेट प्लेटफॉर्म डिजिटल न्यूज मीडिया को भी शिकायत निवारण का मैकेनिज्म तैयार करने को कहा गया है जिसका आधार स्व-नियमन(सेल्फ रेग्लेशन) होगा। जैसे फिल्मों के मामले में सेंसरबोर्ड करता आ रहा है उसी तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म को अपनी मूवी या प्रसारित की जा रही ऐसी ही किसी चीज का उपभोक्ता की उम्र के आधार पर वर्गीकरण करना होगा। यह वर्गीकरण कई आयु-वर्गों में होगा जैसे 13 साल और उससे ज्यादा उम्र, 16 साल और उससे ज्यादा उम्र और 18 साल तथा उससे ज्यादा उम्र। साथ ही, पैरेंटल लॉक की व्यवस्था रखनी होगी यानि अभिभावक जो कंटेट उचित मानेंगे उनके प्रतिपाल्य(वार्डस्) उसी को देख-सुन पायेंगे। जहां तक डिजिटल न्यूज मीडिया प्लेटफार्म का सवाल है, नये नियमों में कहा गया है कि उन्हें केबल टेलीविजन नेटवर्क रेग्युलेशन एक्ट के तहत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता संबंधी मान-मूल्यों का पालन करना होगा।


कहां तक कारगर होंगे नए नियम


जब मीडिया प्लेटफॉर्म पार-राष्ट्रीय हों और राष्ट्र जितना निवासी हिन्दुस्तानियों से बनता हो उतना ही अनिवासी हिन्दुस्तानियों से तो इन नियमों के सहारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, डिजिटल न्यूज मीडिया और ओवर द टॉप प्लेटफार्म का नियमन करना कुछ वैसा ही मानो कोई डोंगी के सहारे महासमुद्र पार कर रहा हो। पहला संकट तो यही है कि सोशल मीडिया पर चढ़े और पसरे संदेश को लेकर कोई शिकायत है तो उसका निदान कितनी तेजी से होता है। नये नियम में एक जगह कहा गया है कि शिकायत के पंद्रह दिनों के अन्दर कार्रवाई होगी और चौबीस घंटे के अन्दर संदेश को हटा लेना होगा। जहां समय सेकेंडों में नहीं और नैनोसेकेंडों में मापा जा रहा हो और इस नैनोसंकेंड की रफ्तार से ही ट्वीट और पोस्ट अपने निशाने पर पहुंचकर किसी की गरिमा का काम तमाम कर जाते हों वहां 24 घंटे और 15 दिन की अवधि संदेश से आहत किसी व्यक्ति को क्या राहत पहुंचायेगी इसका अनुमान आप खुद ही लगा सकते हैं।


दूसरी मुश्किल से संदेश के प्रथम उद्भावक की खोज और पहचान से जुड़ी है। यों सरकार ने स्पष्ट किया है कि संदेश के प्रथम उद्भावक के बारे में जानकारी लेने का अर्थ यह नहीं है कि उसके संदेशों में कोई ताक-झांक की जा रही है। मंशा बस ये जानने की है कि `बदमाशी` किसने शुरु की ? यह भी कहा है कि प्रथम उद्भावक को जानने के पीछे नीयत ये है कि दोषी की पहचान हो, उसकी कारस्तानी की जांच हो, मुकदमा चले और दंड मिले और अदालत या कोई सक्षम प्राधिकरण प्रथम उद्भावक की जानकारी तभी मांगेगा जब उसे लगेगा कि संदेश से देश की एकता-अखंडता, दूसरे देशों से संबंध और देश की सुरक्षा-व्यवस्था को खतरा है।


लेकिन, सरकार की इस सफाई के बावजूद प्रश्न बने रहेंगे। इसलिए कि सोशल मीडिया पर अभी सिर्फ व्यक्ति ही नहीं बल्कि सेलिब्रेटी भी हैं, राजनेता ही नहीं राजनेताओं के समर्थक भी हैं, स्वयंसेवी संस्थाएं और उनके एजेंडे को अपने कंधे पर ढोने वाले लोग हैं तो वे भी जिन्हें प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी कहा और वे लोग भी जिन्होंने आंदोलन और आंदोलनजीवियों को देश की रक्षा या फिर अमन-चैन के लिए खतरा बताया।


परस्पर विरोधी हितों की आवाज को एक साथ एक मंच पर लाते हम एक ऐसे वक्त में रह रहे हैं जहां अपने विचारों से असहमत को गद्दार बताने और अपने पीछे लगी भीड़ को उकसाते हुए `गोली मारो` का  नारा देने का चलन है। लोगों को देश के  गद्दार और देश के वफादार के खेमे में गोलबंद करते, वफादारी और गद्दारी की पुरानी चली आ रही समझ को ध्वस्त करके इन शब्दों की नई समझ गढ़ते इस समय में सोशल मीडिया के पोस्ट और वीडियो के सहारे दंगे में शामिल लोगों की पुलिस पहचान कर रही है और सोशल मीडिया पर टंगे वीडियो के ही सहारे ऐसे आरोपियों को अदालत बरी कर रही है। ऐसा दिल्ली दंगे के मामले में हुआ और किसान-आंदोलन के संदर्भ में टूलकिट शेयर करने वाली नवयुवती दिशा रवि के मामले में भी। ऐसे में संदेश के प्रथम उद्भावक को बताने का विधान करना अगर एक तरफ से जरुरी नियमन कहला सकता है तो दूसरी तरफ से असहमति को दबाने की नई तरकीब।


जहां तक ओटीटी प्लेटफार्म के कंटेट के उपभोक्ताओं की उम्र के हिसाब से वर्गीकरण और डिजिटल न्यूज मीडिया का पत्रकारिता के मान-मूल्यों का पालन करते हुए चलने का सवाल है, हमें ज्यादा उम्मीद नहीं पालनी चाहिए। सुशांत सिंह राजपूत-रिया चक्रवर्ती प्रकरण में देश ने देखा कि अदालतें पत्रकारों, अखबारों, एंकरों और न्यूज चैनल्सों को फटकार के स्वर में कह रही थीं कि सनसनी मत फैलाइए, समाचार बताइए, फैसले मत सुनाइए लेकिन अदालत का ये कहना अपनी करनी पर तुले चैनलों, अखबारों और पत्रकारों के बोल ना रोक पाया। और, हम ये भी जानते हैं कि स्मार्टफोन चलाने के मामले में बच्चे अब मां-बाप से ज्यादा सयाने हो रहे हैं।


इस लंबे लेख का लब्बोलुआब ये कि एक ऐसे समय में जब सोशल मीडिया और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म पर फर्जी न्यूज की फैक्ट्रियां चलाकर एक सत्याभासी (पोस्ट-ट्रूथ) संसार रचा जा रहा हो, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के नये नियम उम्मीद कम जगाती हैं और आशंकाएं ज्यादा।


लेखक सामाजिक सांस्कृतिक स्कॉलर हैं।



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