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बजट 2021: अब टैक्स-फ्री नहीं रही यूलिप की मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम

केंद्रीय बजट 2021 में नए यूलिप निवेश पर टैक्स-फ्री मैच्योरिटी के फायदों को वापस ले लिया गया है, अगर इन उत्पादों में सालाना 2.5 लाख रुपये से ज्यादा का प्रीमियम दिया जाता है तो इस पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगेगा
अपडेटेड Feb 02, 2021 पर 15:48  |  स्रोत : Moneycontrol.com

प्रीति कुलकर्णी, जश कृपलानी


अगर आप यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसीज (यूलिप) में पैसा लगाने की सोच रहे हैं और आपका मकसद इस तरह से केवल मैच्योरिटी पर टैक्स-फ्री कमाई हासिल करना है तो आपको इस बारे में दोबारा सोचना चाहिए।  


बजट 2021 में प्रावधान किया गया है कि अगर यूलिप में जाने वाला प्रीमियम 2.5 लाख रुपये से ज्यादा है तो इसमें मिलने वाली यह छूट आपको नहीं मिलेगी। यह नियम 1 फरवरी 2021 को या इसके बाद खरीदी जाने वाली यूलिप पर लागू होगा।


ईवाई इंडिया के मयूर शाह कहते हैं, “इस तरह की यूलिप को कैपिटल एसेट के तौर पर लिया जाएगा और इन यूलिप से होने वाले मुनाफे और फायदों को कैपिटल गेन्स के तहत टैक्सेबल माना जाएगा।”


इक्विटी फंड्स के साथ टैक्स की समानता


इसका मतलब यह है कि यूलिप पॉलिसीज पर होने वाले फायदे रिडेंप्शन या मैच्योरिटी के वक्त शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म गेन्स (एलटीसीजी) टैक्स के अधीन माने जाएंगे। ऐसा ही दूसरे इक्विटी-आधारित निवेशों पर होता है।


टैक्सबीरबल.इन के डायरेक्टर चेतन चंडक कहते हैं, “सेक्शन 111ए और 112ए के प्रावधान इन यूलिप की बिक्री या रिडेंप्शन पर लागू होंगे और इसके होल्डिंग पीरियड पर 15 फीसदी शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (एसटीसीजी) या 10 फीसदी एलटीसीजी लगेगा।”


एक साल से ज्यादा होल्ड करने पर इक्विटी निवेश को लॉन्ग टर्म एसेट माना जाता है। हालांकि, पॉलिसीहोल्डर की मृत्यु होने पर उस पर निर्भर लोगों को मिलने वाली रकम अभी भी टैक्स-फ्री होगी।


मौजूदा इनकम टैक्स कानूनों के मुताबिक, लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसीज की मैच्योरिटी की रकम को सेक्शन 10 (10डी) के तहत टैक्स से छूट हासिल होती है।


यूलिप इनवेस्टमेंट और बीमा पॉलिसीज का मिलाजुला रूप होती हैं। इनका निवेश इक्विटीज, कॉरपोरेट डेट और सरकारी सिक्योरिटीज में होता है। इस लिहाज से इनकी तुलना म्यूचुअल फंड्स से की जा सकती है।


पुराने विद-एग्जेंप्शन टैक्स व्यवस्था में इक्विटी-लिंक्ड सेविंग स्कीम्स (ईएलएसएस) और यूलिप दोनों ही 80सी के तहत निवेश पर मिलने वाले टैक्स डिडक्शन की हकदार हैं।


यूलिप पांच साल के लॉक-इन पीरियड के साथ आती हैं और इसके बाद आप अपनी पॉलिसीज को सरेंडर कर सकते हैं और इस पर कोई चार्ज नहीं लगता है।


फायदे खत्म किए


सेक्शन 10(10डी) के तहत मिलने वाला एग्जेंप्शऩ यूलिप को इक्विटी म्यूचुअल फंड्स के मुकाबले बढ़त देता है। इसकी वजह यह है कि इक्विटी म्यूचुअल फंड्स पर इनके इक्विटी-आधारित निवेश पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (एलटीसीजी) लगता है। 2018 के केंद्रीय बजट में इन पर यह टैक्स लगाने का फैसला किया गया था।


किसी एक फाइनेंशियल ईयर में 1 लाख रुपये से ज्यादा के गेन्स पर 10 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है। हालांकि, अब से 2.5 लाख रुपये से ज्यादा के सालाना प्रीमियम वाली यूलिप पर टैक्स छूट का ये फायदा नहीं मिलेगा।


केंद्रीय बजट 2021 मेमोरेंडम में कहा गया है, “एक्ट के मौजूदा प्रावधानों के तहत पॉलिसी टर्म के दौरान किसी शख्स के सालाना चुकाए जाने वाले प्रीमियम पर कोई ऊपरी सीमा तय नहीं है। ऐसे मामले सामने आए हैं जहां ऊंची नेटवर्थ वाले लोगों ने भारी प्रीमियम वाली यूलिप में पैसे लगाकर इस क्लॉज के तहत एग्जेंप्शन का फायदा उठाया है। भारी प्रीमियम वाली पॉलिसीज को इस तरह की छूट देना इस क्लॉज के मकसद को नाकाम करता है। इसका मकसद जीवन बीमा के छोटे और वास्तविक मामलों को राहत मुहैया कराने का था।”


इसके साथ ही 30 लाख करोड़ रुपये वाली म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की यूलिप और एमएफ के बीच में टैक्स की समानता लाने की मांग कम से कम आंशिक तौर पर ही पूरी हो गई है।


एडलवाइज एएमसी की मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर राधिका गुप्ता कहती हैं, “यह एक स्वागत योग्य कदम है। कुछ साल पहले जब एमएफ पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (LTCG) लगाया गया था, उस वक्त यूलिप को इसके दायरे में शामिल नहीं किया गया था। यूलिप और एमएफ दोनों एक ही तरीके के पूंजी बनाने के उत्पाद हैं।”


म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का कहना है कि यूलिप को टैक्स के असमान फायदे के चलते निवशकों की यूलिप्स में दिलचस्पी ज्यादा बढ़ी है।


एक फंड हाउस के एग्जिक्यूटिव ने कहा, “ये उत्पाद अमीर निवेशकों को बेचे जा रहे थे क्योंकि गेन्स पर उन्हें टैक्स के फायदे इनमें मिल रहे थे। अब एमएफ उत्पाद यूलिप के साथ निवेश पर मिलने वाले रिटर्न के लिहाज से बराबरी कर सकते हैं।”


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