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Coronavirus चीनी वैज्ञानिकों ने वुहान के लैब में बनाया, तथ्य छुपाने के लिए रची साजिश: ब्रिटिश रिपोर्ट

ब्रिटिश और नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में दावा किया है कि कोरोना की उत्पत्ति वुहान के उसी लैब में हुई जिस पर दुनिया को शक है
अपडेटेड May 31, 2021 पर 17:54  |  स्रोत : Moneycontrol.com

चीन से फैले कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में हाहाकार मचा दिया और इससे लाखों लोगों को जान चली गई। लेकिन अब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि कोरोना वायरस (SARS-CoV-2) की उत्पत्ति कैसे हुई। अब ब्रिटिश और नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन (Study) में दावा किया है कि कोरोना की उत्पत्ति (coronavirus origin) वुहान के उसी लैब में हुई जिस पर दुनिया को शक है।

ब्रिटिश और नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में दावा किया है कि चीनी वैज्ञानिकों ने वुहान के लैब में कोरोना वायरस बनाया और इस तथ्य को छिपाने के लिए साजिश रची। ब्रिटिश अखबार डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना वायरस महामारी स्वााभाविक रूप से पैदा नहीं हुई थी, बल्कि इसे चीन के वुहान लैब में चीनी वैज्ञानिकों ने पैदा किया था।

ब्रिटिश और नॉर्वे के शोधकर्ताओं ने अपने 22 पन्नेल के रिसर्च में वुहान लैब में वर्ष 2002 से 2019 के बीच हुए प्रयोगों के फॉरेंसिक विश्ले षण के आधार यह निष्किर्ष निकाला है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन की लैब में जब कोरोना वायरस तैयार हो गया, तब रिवर्स इंजीनियरिंग के दम पर उसे ऐसा दिखाने की कोशिश की गई कि ये वायरस चमगादड़ की वजह से फैला है।

डेलीमेल की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश प्रोफेसर एंगुस ड डलग्लीश (Angus Dalgleish) और नॉर्वे के वैज्ञानिक डॉ. बिर्गर सोरेन्सन (Dr Birger Sorensen) ने स्टडी में पाया कि चीन ने कोरोना को छुपाने के लिए रेट्रो इंजीनियरिंग के कागज तैयार किए और दुनिया को धोखे में रखा। इस स्टडी में कहा गया है कि वायरस की कृत्रिम उत्पत्ति छिपाने के लिए चीनी वैज्ञानिकों ने इसमें कई बदलाव किए।

वुहान लैब के वायरस विशेषज्ञों ने इसे बनाने बाद अपनी करतूत के सुबूत मिटाने के लिए रिवर्स इंजीनियरिंग से इसका नया स्वरूप पैदा किया, ताकि यह प्राकृतिक रूप से चमगादड़ से बना लगे। रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी वैज्ञानिकों ने गुफा में मिलने वाली चमगादड़ से मिले प्राकृतिक वायरस में स्पाइक जोड़े, जिससे यह बेहद घातक और तेजी से फैलने वाले नए कोरोना वायरस में बदल गया।

इस रिपोर्ट में अमेरिका में चलाए गए गेन ऑफ फंक्शन नाम के प्रोजेक्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें प्राकृतिक रूप से मिलने वाले वायरस को ज्यादा संक्रामक बनाने का काम शामिल था। इस प्रोजेक्ट को 2014 में गैरकानूनी घोषित कर दिया था।

इन सबूतों के बल पर दावा

अध्ययन में दावा किया गया, पिछले साल कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीन बनाने के दौरान वैज्ञानिकों को कुछ फिंगरप्रिंट्स दिखे, जो वायरस में थे। इनसे ये संकेत मिले कि वायरस किसी लैब से आया है। अध्ययनकर्ता सोरेन्सन के मुताबिक, कोरोना वायरस के स्पाइक में 4 अमीनो एसिड हैं, जो पॉजिटिव चार्ज रखते हैं।

इससे वायरस के स्पाइक मानव कोशिकाओं के नेगेटिव चार्ज वाली हिस्सों को मजबूती से जकड़कर संक्रमण फैलाते हैं। प्राकृतिक रूप से तीन अमीनो एसिड एक स्पाइक पर मिलना बहुत दुर्लभ है। मौजूदा वायरस में यह चार हैं, जो कृत्रिम रूप से बनाए जाने पर ही संभव है।

वैज्ञानिक तभी अपनी इस बात को छापना चाहते थे, लेकिन कई बड़े संस्थानों ने इनकार कर दिया और चमगादड़ वाली थ्योरी को ही सही माना। डलग्लीश और सोरेन्सन ने बताया उनके पास करीब एक वर्ष से चीन में वायरस बनाने बनाए जाने के साक्ष्य हैं, लेकिन अधिकतर वैज्ञानिक और विज्ञान पत्रिकाएं उनकी रिपोर्ट को अनदेखा करती आई हैं।

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