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Danish Siddiqui: 'हम नहीं जाएंगे, तो कौन जाएगा?', कंधार पहुंचने से लेकर मौत के आखिरी पलों तक की पूरी दास्तान

दानिश की मौत पत्रकारों के सामने किसी युद्ध और राजनीतिक संघर्ष को कवर करते वक्त आने वाले जोखिमों को दर्शाती है
अपडेटेड Aug 29, 2021 पर 10:08  |  स्रोत : Moneycontrol.com

"मेरी भूमिका एक शीशे के जैसी है। मैं आपको कड़वा सच दिखाना चाहता हूं और आपको इसका साक्षी बनाना चाहता हूं", साल 2020 में रॉयटर्स के फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी ने ये बात कही थी। दानिश ने शायद ये बात यूं ही तो नहीं बोली होगी, क्योंकि उनके कैमरे से ली गई एक-एक तस्वीर ये कहती है कि... हां मैं आपका सामना कड़वे सच से करा रही हूं। इसमें दानिश के लेंस के जरिए कैप्चर की गई दिल्ली में कोरोना महामारी में जलती चिताओं के अंबार से लेकर रोहिंग्या मुस्लिमों के हालात को बयां करने वाली कई मार्मिक तस्वीरें शामिल हैं।


सिद्दीकी जिस विदेशी न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम करते थे, उसके पास पत्रकारों, फोटोग्राफर और फोटो जर्नलिस्टों की कमी तो बेशक नहीं होगी, तो फिर दानिश सिद्दीकी ही आखिर इस जंग के मैदान के लिए क्यों चुने गए? दरअसल दानिश की मौत के बाद रॉयटर्स ने "फाइनल असाइनमेंट" शीर्षक की अपनी एक खास रिपोर्ट पब्लिश की, जो दानिश सिद्दीकी, उनके काम, उनके अफगानिस्तान कवरेज और आखिरी लम्हों में उनसे जुड़ी कई अहम जानकारियों को खुद में समेटे हुए है। इस रिपोर्ट में दानिश को अफगानिस्तान भेजने और उन्हें आगे बढ़ने या नहीं बढ़ने की मंजूरी किसने दी और किसने इसका विरोध किया ये सब भी बताया गया है।


"अगर हम नहीं जाएंगे, तो कौन जाएगा?"


रिपोर्ट की शुरुआत में रॉयटर्स ने दानिश सिद्दीकी को एक स्टार फोटो जर्नलिस्ट बताया। इसमें कहा गया कि जब जून में अफगानिस्तान को फिर से जीतने के लिए तालिबान का अभियान जोर पकड़ रहा था, सैकड़ों लोग लड़ाई में मर रहे थे और हजारों लोग भाग रहे थे। तब नई दिल्ली में रॉयटर्स के 38 साल के स्टार फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी ने एक बॉस से ये कहते हुए स्टोरी कवर करने में मदद करने का फैसला किया, "अगर हम नहीं जाएंगे, तो कौन जाएगा?"


रविवार, 11 जुलाई को, सिद्दीकी दक्षिणी शहर कंधार में अफगान विशेष बलों (Afghan Special Forces) के एक अड्डे पर पहुंचे। वहां वे सैकड़ों कमांडोज की एक टीम के साथ जुड़ गए, जिन्हें तालिबान लड़ाकों को खदेड़ने का काम सौंपा गया था, जो पिछले कुछ हफ्तों से लगातार क्षेत्र पर कब्जा कर रहे थे।


मंगलवार, 13 जुलाई को, सिद्दीकी विद्रोहियों से घिरे एक पुलिसकर्मी को बचाने के लिए एक सफल मिशन में शामिल हो गए। उनका काफिला वापस लौट रहा था, तभी उनकी गाड़ी RPG की चपेट में आ गई। इसका एक वीडियो उन्होंने ट्विटर पर भी शेयर किया था।


वीडियो देखने के बाद सिद्दीकी के एक दोस्त ने कहा, "ये तो पागलपन है।", इस पर उन्होंने कहा, "चिंता मत करो।" सिद्दीकी ने लिखा, "मुझे पता है कि मुझे यहां से कब निकलना है।"


इसके तीन दिन बाद, 16 जुलाई को, सिद्दीकी और दो अफगान कमांडो तालिबान के हमले में मारे गए। उनकी मौत उस समय हुई जब अफगान स्पेशल फोर्स के जवान पाकिस्तान की सीमा से सटे स्पिन बोल्डक इलाके को वापस अपने कब्जे में लेने के लिए ऑपरेशन को अंजाम दे रहे थे, लेकिन सफल नहीं हो पाए।


एक दूसरे न्यूज संस्थान में सिद्दीकी के एक करीबी दोस्त ने बताया कि दानिश ने अफगानिस्तान जाने से पहले ही ये सोच लिया था कि वे खुद को सुरक्षा बलों का साथ जोड़ लेंगे ताकि वे सुरक्षा के साथ संघर्ष को करीब से देख सकें। युद्ध क्षेत्रों में सक्रिय समाचार संगठनों का ये एक आम तरीका है।


अमेरिका में रॉयटर्स ग्लोबल पिक्चर्स एडिटर रिकी रोजर्स ने बताया कि जुलाई की शुरुआत में काबुल पहुंचने पर, सिद्दीकी और रॉयटर्स के संपादकों ने पहले एक अफगान मिलिशिया नेता के साथ उन्हें शामिल होने पर जोर दिया। रॉयटर्स ने इस पर बाहरी सुरक्षा सलाहकार से सलाह भी मांगी। सलाहकार ने कहा कि अगर कुछ शर्तों को पूरा किया जाता है, तो ये एम्बेड संभव हो सकता है, लेकिन रोजर्स ने कहा कि मिलिशिया नेता के पीछे हटने के बाद ये विचार छोड़ दिया गया।


शनिवार, 10 जुलाई को दानिश को अफगान विशेष बलों के साथ जुड़ने का एक मौका मिला। रोजर्स ने कहा कि सुरक्षा मामलों पर अंतिम राय के साथ वरिष्ठ रॉयटर्स संपादकों के एक ग्रुप को अप्रूवल के लिए एक प्रस्ताव भेजा गया। सुरक्षा समूह ने एम्बेड योजना को मंजूरी दी। रोजर्स ने कहा, "हम अफगान विशेष बलों के बारे में बात कर रहे थे, जो एलीट फाइटर्स हैं।"


"उनके पास अपने बैकअप में सभी अस्पताल थे, एयर सपोर्ट सहित बाहर निकलने के लिए जरूरी सभी उपकरण थे।" सिद्दीकी को कंधार के पास उनके हेडक्वार्टर में शामिल होना था।


योजना के मुताबिक, सिद्दीकी रविवार, 11 जुलाई को कंधार के लिए रवाना हुए। उसी दिन भारत ने घोषणा की कि उसने शहर के पास भीषण लड़ाई के कारण अपने वाणिज्य दूतावास से सभी नागरिकों को निकाल लिया है।


सहयोगियों ने बताया कि सिद्दीकी उस रविवार को कंधार में विशेष बल के अड्डे में शामिल होने के बाद बहुत उत्साहित थे। इसके दो दिन बाद दानिश ने अपने काफिले पर हुए RPG अटैक का वीडियो शेयर किया था।


हमले के बाद एशिया पिक्चर्स के संपादक मसूद ने बताया कि उस समय मैंने सिद्दीकी से पूछा कि क्या वे अब भी अपना असाइनमेंट जारी रखना चाहते हैं? मसूद ने सिद्दीकी से कहा, "आप स्थिति को ज्यादा बेहतर तरीकी से समझते हैं। आप बिल्कुल काबुल वापस जा सकते हैं, क्या आप ऐसा करना चाहते हैं?" सिद्दीकी ने मामले पर कुछ सोचा और फिर मसूद से कहा कि वह जारी रखना चाहते हैं।


इधर एक मैनेजमेंट टीम डेली बेसिस पर स्पेशल फोर्स के साथ दानिश के कवरेज और उनकी सुरक्षा पर लगातार चर्चा कर रही थी। उन्होंने कहा कि इस टीम ने सिद्दीकी को कंधार बेस पर 24 घंटे सुरक्षा में रहने का निर्देश दिया ताकि ये देखा जा सके कि अगले दिन किसी और गश्ती दल पर हमला तो नहीं हुआ। सिद्दीकी ने वैसा ही किया और अगले दो दिनों में कोई हमला नहीं हुआ।


इसी कड़ी में सिद्दीकी बुधवार और गुरुवार को कंधार में स्पेशल फोर्स बेस पर रहे और स्पेशल फोर्सेज के अगले मिशन पर अपडेट का इंतजार करत रहे।


14 जुलाई को तालिबान, पाकिस्तान की सीमा से लगे, अफीम की तस्करी के लिए सबसे मशहूर धूल भरे शहर स्पिन बोल्डक की तरफ बढ़ गया था। स्पेशल फोर्सेज ने शहर को कब्जे से छुड़ाने की योजना बनाई और उन्होंने सिद्दीकी को भी साथ चलने का ऑफर दिया। सिद्दीकी ने अपने मैनेजर मसूद को अलर्ट किया, जिन्होंने गुरुवार, 15 जुलाई को अफगानिस्तान समयानुसार शाम 6.50 बजे रोजर्स को ईमेल कर सिद्दीकी को ऑपरेशन में शामिल होने की अनुमति मांगी।


इसके बाद एशिया के बाहर बैठे फोटो एडिटर और एक रॉयटर्स ऑपरेशंस मैनेजर के बीच करीब 43 मिनट तक ई-मेल एक्सचेंज हुआ। ऑपरेशंस मैनेजर ने लिखा, "अगर किसी को आपत्ति न हो, तो मुझे लगता है कि हमें साथ जाना चाहिए।" एक फोटो एडिटर ने भी सहमति में जवाब दिया। उस वक्त शाम के 7.33 बज रहे थे। मिशन आधी रात से पहले शुरू होने वाला था। मामले से वाकिफ एक शख्स के मुताबिक, इस फैसले पर दस्तखत कर दिए गए।


LEAVING BASE- ऑपरेशन की शुरुआत


गुरुवार 15 जुलाई की रात 11.04 बजे सिद्दीकी ने सिंगापुर में एशिया पिक्चर्स के संपादक मसूद को एक मैसेज भेजा, "Leaving Base" (बेस छोड़ रहे हैं)। वे मेजर सादिक करजई के साथ सवार थे, जो विशेष बलों के अनुसार, स्पिन बोल्डक हमले की कमान संभाल रहे थे।


दानिश सिद्दीकी ने अगली सुबह 6:33 बजे पाकिस्तान ब्यूरो चीफ और जो काबुल ब्यूरो की भी देखरेख करते हैं, जिब्रान पेशीमम को एक अफगान फोन नंबर से कॉल किया, उन्होंने करीब चार मिनट तक बातचीत की। सिद्दीकी ने उनसे कहा कि उन्हें उम्मीद है अगले कुछ मिनटों में तालिबानियों के साथ एनकाउंटर होगा।


सुबह 7.30 बजे सिद्दीकी ने भारी गोलबारी की जानकारी देते हुए पेशीमम को एक वॉयस मैसेज भेजा। एक मिनट बाद उनकी गाड़ी रोड पर पहुंच गई। जैसे ही कमांडो कवर लेते हैं, सिद्दीकी कवरेज करने के लिए अपने वाहन से उतरते हैं।


दानिश के कैमरे से मिली आखिरी तस्वीर, सुबह 7.34 बजे की है, जिसमें एक कमांडो को एक दीवार के पीछे झुके हुए और एक RPG लॉन्च करते हुए दिखाया गया है। ये इलाका स्पिन बोल्डक के केंद्र से 2.1 किलोमीटर दूर था। सेना ने घटनास्थल की पहचान शनाकी पेट्रोल स्टेशन और मस्जिद परिसर के रूप में की।


सुबह 7.41 बजे सिद्दीकी ने मसूद को वॉयस मैसेज भेजा, जिसमें भारी गोलाबारी की आवाज आ रही थी। मैसेज में सिद्दीकी को किसी दूसरे व्यक्ति से कहते हुए सुना गया, "ये क्या है, RPG?" इसके एक मिनट बाद, एक और वॉयस मैसेज आता है, "मसूद, मैं घायल हो गया हुआ।"


तीन मिनट बाद दोनों ने फोन पर बात की। सिद्दीकी ने मसूद को बताया कि उनके बाएं हाथ के पिछले हिस्से में छर्रे लगे हैं, तभी दानिश ने यूनिट के एक सदस्य को फोन दिया, जिसने मसूद को बताया कि घाव गहरा नहीं है। उस शख्स ने कहा, "हम इन्हें यहां से निकाल रहे हैं।"


सुबह 7.53 बजे सिद्दीकी ने काबुल में एक फोटो जर्नलिस्ट सहयोगी से बात की और बताया कि वह एक मस्जिद में शरण लिए हुए हैं। सुबह 7.59 बजे सिद्दीकी ने अपने स्मार्टफोन पर ट्रैकिंग फीचर के जरिए मसूद के साथ अपनी लाइव लोकेशन शेयर की। सुबह 8.01 बजे अपने आखिरी मैसेज में फोटोग्राफर ने मसूद के एक सवाल का जवाब दिया कि उनकी चोट कैसी है? उन्होंने कहा "बस दर्द हो रहा है।"


अगले एक घंटे में, सिद्दीकी का फोन सिग्नल धीरे-धीरे स्पिन बोल्डक से मुख्य सड़क के साथ कंधार की तरफ बढ़ने लगा। पेशीमम, मसूद और काबुल में सहयोगी सभी ने सिद्दीकी को समय-समय पर फोन करने की कोशिश की। सिद्दीकी का ट्रैकिंग सिग्नल सुबह 9.06 बजे वाट माउंटेन पर रुक गया।


सुबह करीब 10 बजे मसूद और काबुल में उनके एक सहयोगी ने सिद्दीकी के फोन पर कॉल की और फोन उठा, लेकिन दोनों ही बार उधर से कोई अजनबी शख्स बोला। इससे मसूद की चिंता और बढ़ गई। फोन उठाने वाले शख्स ने खुद को एक दुकानदार बताया।


वहां क्या हुआ था, ये समझाने के लिए मसूद ने एडिटर्स और ऑपरेशन मैनेजर्स के साथ एक कॉन्फ्रेंस कॉल की। उस कॉल के दौरान, काबुल में एक दूसरे रॉयटर्स फोटोग्राफर ने सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों के साथ मसूद को मैसेज किया। मसूद को तुरंत पता चल गया कि तस्वीरों में दिख रहा शख्स सिद्दीकी है। उन्होंने कॉन्फ्रेंस कॉल पर भी कहा, "हे भगवान, वो मारा गया है" और कॉन्फ्रेंस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया...


"उसे गोली मत मारो, वो पत्रकार है"


विशेष बल के कमांडर अलीजई ने रॉयटर्स को बताया सिद्दीकी ने मस्जिद में शरण ली थी, जहां उनके छर्रे की चोट के लिए स्पेशल फोर्सेज के एक डॉक्टर ने उनका इलाज किया था और करजई भी उनके साथ थे।


जिस वक्त सिद्दीकी को निकाला जा रहा था, तालिबान ने एक नया हमला किया और सभी जवानों को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। अलीजई ने कहा कि इस दौरान करजई, सिद्दीकी और डॉक्टर के साथ टीम का कम्यूनिकेशन टूट गया। उन्होंने गलती से सोचा कि तीनों लोग यहां से निकलने वाली गाड़ियों में चढ़ गए।


एक हमवी के ड्राइवर ने कहा कि उसने गाड़ियों में बैठने के लिए करजई के चिल्लाने की आवाज सुनी, लेकिन उस समय तालिबान के लोग अंदर आ गए और उन्होंने गाड़ी में बैठने के लिए भागते हुए सिद्दीकी, करजई और डॉक्टर को गोली मार दी। ड्राइवर ने कहा, "मैंने ये सब अपनी आंखों से देखा।" ये मानकर कि वे तीनों मर चुके हैं, ये ड्राइवर भी वहां से गाड़ी लेकर निकल गया।


अलीजई ने कहा कि उसके एक अधिकारी ने करजई के फोन पर कॉल की, फोन उठाने वाले ने खुद को तालिबान लड़ाका बताया, उसने कहा, "तुम भारतीयों को हमारे खिलाफ लड़ने के लिए ला रहे हो।" अधिकारी ने जवाब दिया, "उसे गोली मत मारो। वो पत्रकार है।" तालिबानी ने कहा, "हम पहले ही उस आदमी को मार चुके हैं।" इसके बाद कोई बात नहीं हुई।


जब रॉयटर्स के अंदर ही उठे सवाल


रॉयटर्स के अंदर, एक प्रतिष्ठित सहयोगी और दो छोटे बच्चों के पिता की मौत के बाद शोक की लहर दौड़ गई। इस दुख के बीच न्यज एजेंसी के कुछ पत्रकारों ने सवाल किया है कि क्या रॉयटर्स ने सिद्दीकी को असाइनमेंट पर पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की थी? ये रिपोर्ट रॉयटर्स के पत्रकारों द्वारा तैयार और एडिट की गई है, जो सिद्दीकी के मैनेजमेंट में या उनके असाइनमेंट को मंजूरी देने के फैसलों में शामिल नहीं थे।


सिद्दीकी के साथ काम करने वाले दिल्ली स्थित एक संवाददाता कृष्णा एन दास ने कहा कि कुछ सहयोगियों ने रॉयटर्स के संपादकों के उस फैसले पर ध्यान दिया है, जिसमें फोटोग्राफर को 13 जुलाई के RPG हमले के बाद भी दानिश को अफगान बलों के साथ रहने की अनुमति दी गई थी। दास ने पूछा, "उन्हें वापस जाने की अनुमति क्यों दी गई? उन्हें वहां से निकाला क्यों नहीं गया?"


हालांकि, कुछ दूसरे साथियों का मानना है कि सिद्दीकी को इस संघर्ष की कहानी दिखाने के लिए, जो असाइनमेंट दिया गया था, उसे पूरा करने के लिए अफगान फोर्स के साथ शामिल होना ही एक सही तरीका था।


अपनी वॉर फोटो के लिए प्रसिद्ध रॉयटर्स के एक साथी फोटोग्राफर गोरान टोमासेविक ने सिद्दीकी के फाइनल असाइनमेंट के बारे में कहा, "अगर आपको इस तरह के किसी मिशन में शामिल होने का मौका मिले, तो आप इसे ले लीजिए। इस तरह के सैनिकों के ग्रुप ही अक्सर रहने के लिए सबसे सुरक्षित स्थान हैं।"


इस फैसले की जानकारी रखने वाले न्यूज रूम के कुछ सदस्यों का कहना है कि अफगानिस्तान में सिद्दीकी को सैनिकों के साथ जुड़े रहने के फैसले को वरिष्ठ फोटो संपादकों का समर्थन हासिल था, जिसकी बाहरी सलाहकारों और न्यूजरूम मैनेजर्स की तरफ से जांच की गई थी, जो असाइनमेंट के दौरान सुरक्षा संभालते हैं।


साथ ही शीर्ष संपादकों का एक ग्रुप इस तरह के फैसलों की समीक्षा करता है और संभावित खतरे पर विचार करने के लिए नियमित रूप से उनकी बैठक होती है। इस ग्रुप में प्रधान संपादक एलेसेंड्रा गैलोनी, कार्यकारी संपादक जीना चुआ, जो सुरक्षा की देखरेख करते हैं और ग्लोबल मैनेजिंग एडिटर फॉर विजुअल जॉन पुलमैन शामिल थे, जिन्होंने इस फैसले पर हस्ताक्षर किए थे।


रॉयटर्स के मैनेजर्स और स्टाफ के साथ इंटरव्यू और ईमेल की समीक्षा से संकेत मिलता है कि दक्षिण एशिया में संपादक सिद्दीकी को अफगान कमांडो के साथ भेजने के फैसले का हिस्सा नहीं थे और उन्हें स्पिन बोल्डक मिशन की कोई अग्रिम जानकारी भी नहीं थी।


"पिता बनने के बाद से लगने लगा डर"


सिद्दीकी की मौत अंतरराष्ट्रीय मीडिया और लोकल आउटलेट दोनों में पत्रकारों के सामने किसी युद्ध और राजनीतिक संघर्ष को कवर करते वक्त आने वाले जोखिमों को दर्शाती है। कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर 2010 से अब तक 600 से ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। अफगानिस्तान विशेष रूप से खतरनाक रहा है, अगस्त की शुरुआत में इन कुल मौतों में से 35 अफगानिस्तान में हुईं और उनमें से 28 स्थानीय पत्रकार थे।


बहुत पहले सिद्दीकी ने रॉयटर्स में एक सहयोगी से कहा, उन्हें शायद ही कभी अपनी पूरी नौकरी में डर का एहसास हुआ हो, लेकिन जब से वो बाप बने हैं, अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर, वे अपनी सुरक्षा के बारे में ज्यादा सोचने लगे।


दानिश ने कहा था, "मैंने कठिन परिस्थितियों में और अलग-अलग असाइनमेंट पर काम किया है और मैंने कभी डर महसूस नहीं किया है, लेकिन जब से मैं एक पिता बना हूं, मुझे वास्तव में डर लगने लगा है।"


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