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हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ने से परेशान हैं तो इन उपायों से बचेगा पैसा

IRDAI के स्पष्टीकरण के बावजूद पॉलिसीहोल्डर्स को मुश्किल बनी रहेगी क्योंकि बीमा कंपनियों ने ऊंचे क्लेम्स की वजह बताते हुए हेल्थ कवर प्रीमियों में बढ़ोतरी कर दी है
अपडेटेड Dec 28, 2020 पर 17:14  |  स्रोत : Moneycontrol.com

प्रीति कुलकर्णी


इंश्योरेंस रेगुलेटर के हेल्थ इंश्योरेंस एक्सक्लूजंस के मानकीकरण पर अनिवार्य किए गए नियमों के 1 अक्तूबर 2020 से प्रभावी होने के बाद से ही कई पॉलिसीहोल्डर्स ने शिकायत की है कि उनके प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी हो गई है। हालांकि, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डिवेलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) ने स्पष्ट किया है कि नॉर्म्स में बदलाव की वजह से प्रीमियम में हुआ बदलाव 5 फीसदी से ज्यादा नहीं है।


आईआरडीएआई ने कहा है, “बीमा कंपनियों को मूल मंजूरी प्राप्त प्रीमियम दरों के बेस प्रीमियम में 5 फीसदी तक का बदलाव करने की इजाजत दी गई थी ताकि एक्सक्लूजंस के मानकीकरण की गाइडलाइंस का पालन किया जा सके। मौजूदा उत्पादों के आसान ट्रांजिशन के लिए एक मर्तबा के उपाय के लिए ऐसा करने की इजाजत दी गई है ताकि कंपनियों के लिए कारोबार फायदेमंद बना रहे और वे मार्केट में टिकी रह पाएं।”


रेगुलेटर ने कहा है कि 30 सितंबर 2020 तक कुल 388 उत्पादों में से केवल 55 में प्रीमियमों में 5 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है।


इसके अलावा, पांच हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स में प्रीमियम में 5 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है।


IRDAI के मुताबिक, इस बढ़ोतरी की वजह इनकर्ड क्लेम्स रेशियो रही है। इनकर्ड क्लेम्स रेशियो पूरे साल के दौरान इकट्ठे हुए प्रीमियम्स में से चुकाए गए कुल क्लेम्स के रेशियो को कहते हैं।


अगर यह रेशियो ज्यादा होता है तो इससे कारोबार फायदेमंद नहीं रह जाता है और इसकी वजह से बीमा कंपनियों को प्रीमियम की दरें बढ़ानी पड़ती हैं।


पॉलिसीबाजार.कॉम के आंकड़ों के मुताबिक, पॉलिसी रिन्यू कराने वाले कंपनी के कुल ग्राहकों में से करीब 10 फीसदी ने कहा है कि उनके प्रीमियम में 30 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। करीब 8 फीसदी पॉलिसीहोल्डरों के प्रीमियम 15-30 फीसदी तक बढ़ गए हैं।


पॉलिसीबाजार.कॉम के बिजनेस हेड (हेल्थ) अमित छाबड़ा कहते हैं, “प्रीमियम उम्र के साथ बढ़ते हैं। आमतौर पर पॉलिसीज में 5 साल के उम्र के स्लैब होते हैं। मिसाल के तौर पर, जब तक आप 30-35 साल की उम्र के दायरे में रहते हैं तब तक आपके प्रीमियम में कोई बदलाव नहीं होता है। जैसे ही आप 35 साल की उम्र से आगे बढ़ते हैं आप उम्र के अगले स्लैब में पहुंच जाते हैं और आपके प्रीमियम पहले से तय किए गए प्रीमियम ग्रिड में पहुंच जाते हैं। ज्यादातर मामलों में प्रीमियम में इजाफे की यह एक सबसे सामान्य वजह है।”


इसके अलावा, नए नॉर्म्स और विपरीत क्लेम रेशियो, कोविड-19 की वजह से हेल्थकेयर के खर्च में हुई बढ़ोतरी और दवाइयों और इलाज में आने वाली नियमित महंगाई की भी ओवरऑल हेल्थ प्रीमियमों में होने वाली बढ़ोतरी में एक बड़ी भूमिका होती है।


रूंगटा सिक्योरिटीज के फाइनेंशियल प्लानर हर्षवर्धन रूंगटा कहते हैं, “मेडिकल इनफ्लेशन बढ़ रहा है और हॉस्पिटलों की कीमतों पर कोई रेगुलेटरी कंट्रोल नहीं है। बीमा कंपनियां पैकेज दरों को तय करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन इससे भी मदद नहीं मिली है। जब दरों को इस तरह से तय किया जाता है तो हॉस्पिटल मरीजों बकाया की रकम चुकाने के लिए मजबूर करते हैं।”


पुराने ग्राहक, नए उत्पाद


कुछ मामलों में दरों में जबरदस्त बढ़ोतरी की एक और वजह भी हो सकती है। अगर आप पिछले कवर को छोड़कर एक नई पॉलिसी लेते हैं तो प्रीमियम में इजाफा होता है।


पॉलिसीहोल्डर्स को इस तरह के मामलों में मौजूदा पॉलिसी जारी रखने का विकल्प नहीं दिया जाता है। मनीकंट्रोल ने पॉलिसीहोल्डर्स के बीच चिंता की एक बड़ी वजह रहे इस मसले को पहले भी उठाया है।


बेशक.ऑर्ग के फाउंडर महावीर चोपड़ा कहते हैं, “कुछ बीमा कंपनियां अपने मौजूदा उत्पादों को बंद कर चुकी हैं और उन्होंने अपने पॉलिसीहोल्डर्स को माइग्रेशन का विकल्प दिया था। इस चीज को IRDAI के स्पष्टीकरण में कवर नहीं किया गया है।”


इनमें नए उत्पाद पुराने उत्पादों के मुकाबले बेहतर हो सकते हैं जिनमें नए फीचर शामिल हो सकते हैं। लेकिन, पॉलिसीहोल्डर्स के लिए इसका मतलब सीधे तौर पर ज्यादा प्रीमियम हो सकता है और इसमें ग्राहकों को नए बेनेफिट्स पसंद हैं या नहीं इसका कोई ध्यान नहीं रखा जाता है।


मिसाल के तौर पर, 47 साल के राम मनोहरा रेड्डी को ही लीजिए। रेड्डी पिछले 17 साल से एक निजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी की पॉलिसी को जारी रखे हुए हैं।


यह एक फैमिली फ्लोटर पॉलिसी है जिसमें उनके 74 साल के पिता और 65 साल की मां को भी कवर किया गया है।


दिसंबर 2019 में कंपनी ने उनकी पॉलिसी को खत्म कर दिया और इसके पीछे अनउपलब्धता को वजह बताया। साथ ही कंपनी ने परिवार को एक नए प्रोडक्ट पर शिफ्ट कर दिया।


इसके साथ ही रेड्डी का प्रीमियम 21,762 रुपये से बढ़कर 66,667 रुपये पर पहुंच गया। यह बढ़ोतरी 200 फीसदी से भी ज्यादा थी। बीमा कंपनी ने इस बढ़ोतरी को जायज ठहराते हुए उन्हें बताया कि नई पॉलिसी में उन्हें रूम रेंट की पाबंदियों से मुक्ति मिलने जैसे ज्यादा फायदे मिल रहे हैं। साथ ही इसमें वेलनेस बेनेफिट्स और कवर रीलोड भी मिल रहे हैं।


रेड्डी कहते हैं, “मुझे सबसे ज्यादा यह बात खली की उन्होंने हमें पिछले 16 साल से उनकी कंपनी के साथ जुड़े रहने वाले एक लॉयल कस्टमर का कोई फायदा नहीं दिया। इस चीज का कोई लिहाज नहीं किया गया है मैं कंपनी से इतने वक्त से जुड़ा हुआ हूं।”


उन्होंने अपना विरोध-प्रदर्शन दर्ज कराया लेकिन, साथ ही वे इस पॉलिसी से भी जुड़े रहे। अक्तूबर 2020 के बाद जब मौजूदा पॉलिसीज के लिए आईआरडीएआई की स्टैंडर्डाइजेशन की गाइडलाइंस आईं तो उन्हें एक और एडवांस नोटिस मिला जिसमें उन्हें प्रीमियम में होने वाली एक और बढ़ोतरी के बारे में सूचित किया गया. उनसे कहा गया कि उनकी पॉलिसी के रिन्यूअल की तारीख पर उन्हें यह बढ़ा हुआ प्रीमियम चुकाना होगा।


नाराज रेड्डी कहते हैं, “इस बार उन्होंने प्रीमियम 64 फीसदी बढ़ाकर 1.09 लाख रुपये कर दिया है। कंपनी ने प्रीमियम में किए गए इस तगड़े इजाफे के पीछे मेडिकल ट्रीटमेंट के खर्च में हो रही तेज बढ़ोतरी को वजह बताया है।”


पॉलिसीहोल्डर्स के पास सीमित विकल्प


पॉलिसीहोल्डर्स और उनमें भी खासतौर पर ऐसे पॉलिसीहोल्डर्स जो कि लंबे वक्त से अपने प्रीमियम चुका रहे हैं, उनके लिए प्रीमियमों में बढ़ोतरी एक बड़े झटके जैसा है।


ऐसा इस वजह से भी है क्योंकि पहले से मौजूद बीमारियों के वेटिंग पीरियड क्रेडिट को रखते हुए दूसरे प्रोडक्ट पर शिफ्ट होना ऐसी उम्र में आसान नहीं होता है।


चूंकि, सीनियर सिटीजंस इस उम्र में कई तरह की बीमारियों से जूझ रहे होते हैं, ऐसे में दूसरी बीमा कंपनियां उन्हें उचित प्रीमियम्स पर अपने साथ जोड़ने को तवज्जो नहीं देती हैं।


चोपड़ा कहते हैं, “ये बदलाव ईकोसिस्टम लेवल पर होने चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों के पास सीमित विकल्प होते हैं। ऐसे में एक पर्याप्त हेल्थ फंड तैयार करना एक विकल्प हो सकता है। इसके जरिए अगर आपके पास पर्याप्त पैसे हैं और आप लंबे वक्त पर अपने इलाज का खर्च खुद निकाल सकते हैं तो आप अपनी पॉलिसी को खत्म करने के बारे में सोच सकते हैं। हालांकि, आपको यह बात दिमाग में रखनी होगी कि अलग-अलग तरह के इलाज के खर्च में कितनी बढ़ोतरी होगी इसका अंदाजा लगा पाना आपके लिए मुश्किल साबित होगा।”


ऐसे में यह भी अनुमान लगा पाना आसान नहीं है कि आपको अपने लिए कितने पैसों का एक हेल्थकेयर फंड खड़ा करना चाहिए।


रूंगटा कहते हैं, “साथ ही, आपको याद रखना चाहिए कि आपके हेल्थ इंश्योरेंस का सम इंश्योर्ड हर साल दोबारा उतना ही हो जाता है, भले ही आपने क्लेम ले लिया हो. आपके बनाए गए फंड के साथ ऐसा नहीं होता है। एक बार इलाज पर पैसे खर्च करने के बाद आपको फंड में होने वाली कमी को पूरा करने के लिए अलग से बचत करनी होगी।”


हालांकि, आपका तैयार किया गया फंड किसी तरह के डिडक्शंस की भरपाई करने में बखूबी काम आ सकता है। डिडक्शंस ऐसी कटौतियां होती हैं जिनका भुगतान आपके हॉस्पिटलाइजेशन बिल को चुकाते वक्त बीमा कंपनी नहीं करती है। ये पैसे आपको देने पड़ते हैं। यह फंड आपके लिए तब भी कारगर साबित होता है जबकि आप ज्यादा उम्र वाले दौर में हों और आपके पास किसी भी तरह का बीमा कवर नहीं हो।


पॉलिसीबाजार के छाबड़ा सिफारिश करते हैं कि अगर आपका प्रीमियम आपके सम इंश्योर्ड के 10 फीसदी से ऊपर निकल जाता है तो आपको दूसरी बीमा कंपनियों या उत्पादों पर पोर्ट करने के विकल्प के बारे में सोचना चाहिए।


वे कहते हैं, “अगर आपको लगता है कि प्रीमियम में होने वाली बढ़ोतरी बेवजह है तो आप पोर्ट करने के विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। सीनियर सिटीजंस के लिए मौजूद पॉलिसीज समेत आप मार्केट में मौजूद दूसरी सस्ती पॉलिसीज पर विचार कर सकते हैं. हालांकि, यह नोट कर लीजिए कि इनमें कई तरह की पाबंदियां हो सकती हैं जिनमें 30 फीसदी तक को-पेमेंट और दूसरी सीमाएं हो सकती हैं। ऐसे में यह एक मिलाजुला खेल है. पॉलिसीज सस्ती हो सकती हैं, लेकिन आपको उन पाबंदियों पर भी गौर करना चाहिए जो कि आपके खर्च को बजट से बाहर ले जा सकती हैं।”


अपनी जरूरतों, बजट और क्या ऑफर किया जा रहा है, इन चीजों को देखते हुए आप इस तरह के प्लान्स पर विचार कर सकते हैं। एक बैकअप के तौर पर अपना हेल्थकेयर फंड तैयार कीजिए ताकि कम सम-इंश्योर्ड या को-पे और रूम रेंट की सीमाओं के मौके पर आप अपनी जेब से भुगतान कर सकें।


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