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डेट फंड क्राइसिस के 5 सबक जानिए क्या-क्या हैं?

यील्ड का मतलब रिटर्न नहीं होता। किसी डेट फंड का अंडरलेइंग पोर्टफोलियो ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
अपडेटेड May 14, 2020 पर 08:31  |  स्रोत : Moneycontrol.com

विद्या बाला


सितंबर 2018 में IL&FS संकट के शुरू होने के वक्त से डेट फंड इनवेस्टर्स की मुश्किलें बढ़ गई हैं। तब से ऐसा चल रहा है कि जब यह लगता है कि एक बुरा वक्त बीत गया है, तब तक कोई दूसरी समस्या सामने आ जाती है।


अगर पिछले 18 महीने में आई मुश्किलों से हमें कुछ सबक भी सीखने को मिले हैं। आइए जानते हैं कि इनसे हमें क्या सीख मिली हैः


ज्यादा रिटर्न का लालच


कई लोग इक्विटी स्कीमों की तर्ज पर ही डेट फंड्स का भी चुनाव करते हैं। इनमें लोग कैटेगरी में सबसे ज्यादा रिटर्न वाली स्कीमें देखते हैं। आप शायद एक और स्टेप आगे बढ़ गए होंगे और इस बात पर गौर किया होगा कि यह कितना उतार-चढ़ाव भरा है। क्या इसमें नेगेटिव रिटर्न और ऐसी ही दूसरे वायके भी देखने को मिले हैं।


दुर्भाग्य से ज्यादा जोखिम वाला कोई भी डेट फंड इन सभी मानकों पर बेहतरीन दिखाई दे सकता है, लेकिन, जब यह फंड फेल हो जाता है तब सारी चीजें धरी रह जाती हैं।


नीचे दिए फ्रैंकलिन इंडिया अल्ट्रा शॉर्ट बॉन्ड फंड के ग्राफ को देखिए। यह उन छह डेट स्कीमों में से एक है जिन्हें अप्रैल में बंद कर दिया गया है।


यह ऐसा फंड था जिसने कैटेगरी के औसत से लगातार कम से कम 1.2 फीसदी ज्यादा रिटर्न दिया था। साथ ही इसके रिटर्न कैटेगरी के औसत से 3 फीसदी तक ज्यादा रहे थे। ऐसे में किसी लॉन्ग-टर्म निवेशक तक ने यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन इस फंड को बंद करना पड़ेगा।


सबकः इससे हमें सीख मिलती है कि रिटर्न जोखिमों को छिपा लेते हैं। क्रेडिट रिस्क वाला कोई फंड बेहद मजबूत दिख सकता है और इसमें बिना किसी उतार-चढ़ाव के ऊंचे रिटर्न मिल सकते हैं। लेकिन, जब ऐसा होता है तो आखिर आप क्या कर सकते हैं? जब कोई फंड खासतौर पर कम ड्यूरेशन वाली कैटेगरी में लगातार मजबूती से काफी ज्यादा रिटर्न दे रहा हो (डेट में 1-2 फीसदी ज्यादा रिटर्न कोई आम चीज नहीं होती है) तो अपने आप से सवाल पूछिए कि ये रिटर्न कहां से आ रहा है। यह चीज आपको इसके पोर्टफोलियो तक ले जाएगी।


यील्ड का मतलब रिटर्न नहीं है


ऐसे लोग जो यह सोचकर डेट फंड्स में पैसा लगाते हैं कि ऊंची यील्ड सीधे तौर पर ज्यादा रिटर्न में तब्दील होगी (एक्सपेंस रेशियो के बाद), तो इसे महज उनका भ्रम कहा जाएगा।


पिछले दो सालों से ऊंची यील्ड जोखिम के बारे में एक चेतावनी दे रही थी। आमतौर पर कोई भी फंड ज्यादा रिटर्न के लिए ज्यादा जोखिम लेता है। अब अगर आप नीचे दिए गए ग्राफ पर नजर डालें तो पाएंगे कि आदित्य बिड़ला सन लाइफ मीडियम टर्म की यील्ड कैटेगरी के औसत से मामूली ज्यादा थी, लेकिन एक वक्त पर यह कैटेगरी से काफी ऊपर पहुंच गई।


दूसरी ओर, फ्रैंकलिन इंडिया इनकम अपॉर्च्युनिटीज की लगातार ऊंची यील्ड्स थीं। इससे क्या पता चलता है? पिछली वाली स्कीम का रिस्क प्रोफाइल बढ़ गया। डाउनग्रेड से यील्ड बढ़ी और इस्तेमाल नहीं किए जा सके पुट ऑप्शंस से भी यील्ड बढ़ी। इसका सीधा मतलब यह है कि यह स्कीम पहले के मुकाबले ज्यादा जोखिम भरी हो गई।


दूसरी ओर, फ्रैंकलिन फंड लगातार ऊंची यील्ड दिखा रहा था। केवल हालिया वक्त में ही इसमें चढ़ाव का ट्रेंड दिखाई दिया। इससे संकेत मिला कि यह अब तक के अपने सबसे ज्यादा जोखिम लेने वाले दौर में है। वहीं, बिड़ला फंड ने सितंबर 2018 से ही खतरे का निशान दिखाना शुरू कर दिया था।


सबकः यील्ड का मतलब रिटर्न नहीं होता है। यह ऊंची यील्ड कहां से आ रही है यानी अंडरलेइंग पोर्टफोलियो को जानना बेहद अहम है।


मुश्किलों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है


जिन फंड्स को झटका लग चुका है उनके इनवेस्टर्स को अक्सर सलाह दी जाती है कि वे फंड्स में बने रहें क्योंकि चीजें इससे ज्यादा बुरी नहीं हो सकती हैं।


लेकिन, फ्रैंकलिन के संकट के बाद या बीओआई द्वारा कई पेपरों के लिए पिछले हफ्ते की गई कार्यवाही के चलते आदित्य बिड़ला एएमसी को अपनी कुछ स्कीमों में झारखंड रोड एसेट को मार्क डाउन करना पड़ा। ऐसा ही प्रिंसिपल एएमसी को अपने डीएचएफएल पेपर के लिए करने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन, इऩ सभी से यह पता चलता है कि एएमसी में अभी स्ट्रेस्ड एसेट्स की मार्किंग डाउन का दौर खत्म नहीं हुआ है।


हर एएमसी अलग रास्ता अख्तियार करती है और हरेक के पास ऐसे एसेट्स हैं जिनमें किस्तों में झटके झेलने पड़ रहे हैं। अगर ऐसा है तो फंड में यह सोचकर बने रहना कि बुरा दौर बीत चुका है, आपको जोखिम से मुक्त नहीं करता है। यानी आपको तब भी जोखिम के लिए तैयार रहना चाहिए।


IL&FS, DHFL, एस्सेल में पहली दो एसेट्स में अभी भी मुश्किलों का दौर खत्म नहीं हुआ है। इसके अलावा, वोडाफोन आइडिया और यस बैंक में भी मुश्किलें जारी हैं। ऐसे में ये फैक्टर्स निवेशकों के लिए लंबे वक्त के लिए परेशानी का सबब रह सकते हैं। जैसे-जैसे मुश्किलें बढ़ेंगी सामान्य वक्त की ओर लौट पाना उतना ही मुश्किल होगा।


नतीजाः जहां किसी पोर्टफोलियो में क्रेडिट रिस्क हो, वहां एक झटके से पोर्टफोलियो की सफाई नहीं हो सकती। आपको और झटके झेलने पड़ सकते हैं।


जोखिम वाले पेपर्स के जमावड़े से बढ़ जाती हैं मुश्किलें


जब फंड्स को किसी डिफॉल्ट या रिडेंप्शन (पैसे की निकासी) का सामना करना पड़ता है तो पोर्टफोलियो में मौजूद पेपर्स, खासतौर पर जिनकी बिक्री नहीं हो पाती या दूसरे कम क्वालिटी वाले पेपर्स, का जमावड़ा बढ़ जाता है।


पिछला 2018 का उदाहरण पीजीआईएम अल्ट्रा शॉर्ट टर्म (उस वक्त इसे डीएचएफएल प्रामेरिका अल्ट्रा शॉर्ट टर्म) में मिलता है। यह फंड डीएचएफएल के धराशायी होने के वक्त सबसे ज्यादा बुरी चोट खाने वाले फंड्स में था।


रिडेंम्पशन के भारी दबाव से जूझने के चलते इसका दूसरे पेपर्स में एक्सपोजर बढ़ गया। नीचे दिए गए आंकड़ों में एडीएजी ग्रुप में फंड की होल्डिंग का पता चलता है। यह ग्रुप इनसॉल्वेंसी का शिकार हो गया था।


इसकी 3.4 फीसदी होल्डिंग बढ़कर 100 फीसदी पर पहुंच गई। ऐसा इस वजह से हुआ क्योंकि दूसरे लिक्विड पेपर्स (ऐसे पपर्स जो आसानी से बेचे जा सकते हैं) रिडेंम्पशन के भारी दबाव में बेच दिए गए। जब एडीएजी ग्रुप डिफॉल्ट कर गया तो फंड को 100 फीसदी झटका उठाना पड़ा।


सबकः भारी रिडेम्पशन के चलते क्वालिटी पेपर्स को बेचना पड़ सकता है। इससे फंड में खराब क्रेडिट वाले या बिक्री न हो सकने वाले पेपर्स ही बचे रह जाते हैं और इससे पोर्टफोलियो का जोखिम चरम पर पहुंच जाता है।


औसत मेच्योरिटी एक छलावा हो सकती है


फ्रैंकलिन इंडिया की छह डेट स्कीमों के हाल में धराशायी होने पर फ्रैंकलिन इंडिया अल्ट्रा शॉर्ट बॉन्ड की औसत मैच्योरिटी मार्च 2020 में 0.6 साल थी।


ऐसे में यह सोचा गया कि फंड इस समय तक पैसे लौटा देगा। हालांकि, पोर्टफोलियो ड्यूरेशन के आकलन की जटिलता, पुट और कॉल ऑप्शनों के इस्तेमाल और उनका क्या असर है जैसे फैक्टरों का मतलब था कि बड़ी संख्या में पेपर वास्तविक मैच्योरिटी पोर्टफोलियो की औसत मैच्योरिटी तारीख को पार कर चुके थे।


सबकः किसी आम निवेशक के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह फंड की ड्यूरेशन की कैलकुलेशन की जटिलताओं को समझ सके। जब आप अपना टाइम फ्रेम फंड के साथ मैच करते हैं तो इसके लिए मैच्योरिटी को देखना काफी नहीं होता। आपको पेपरों की मैच्योरिटी (नॉन-गिल्ट, नॉन-एएए) को चेक करना होता है कि किसकी पोर्टफोलियो में सबसे बड़ी मैच्योरिटी है। किसी जोखिम के वक्त में यही आपका अधिकतम टाइम फ्रेम होगा।


(लेखिका प्राइमइनवेस्टर की को-फाउंडर हैं)


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