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निवेश में कुछ अलग करना चाहते हैं तो ये थीम्स हैं बेस्ट

ऊंचे रिटर्न मिलने की संभावना के बावजूद इनमें मौजूद रिस्क को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
अपडेटेड Jan 22, 2020 पर 15:00  |  स्रोत : Moneycontrol.com

निखिल वालवलकर


स्मार्ट इनवेस्टर्स हमेशा मार्केट से मिल रहे रिटर्न्स के मुकाबले ज्यादा रिटर्न की तलाश में रहते हैं। हालांकि, इनवेस्टर्स के कोर पोर्टफोलियो में जल्दी-जल्दी बड़े बदलाव नहीं होते हैं, लेकिन कुछ रणनीतिक फैसले उन्हें जरूर मुनाफा देते हैं।


हर पोर्टफोलियो की एक कोर और एक सैटेलाइट एप्रोच होनी चाहिए। कोर फंड्स आपके बेहद पुख्ता, मजबूत और लगातार प्रदर्शन करने वालों से मिलकर बना होता है जिनमें कम या औसत जोखिम होता है। आपके सैटेलाइट पोर्टफोलियो में आपकी जोखिम भरी स्कीमें आती हैं। आपके पोर्टफोलियो का कितना हिस्सा कोर और सैटेलाइट बास्केट में है यह चीज आपके जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करती है।


यहां हम कुछ ऐसी ऑफ-बीट इनवेस्टमेंट थीम्स आपको बताने जा रहे हैं जिनकी सिफारिश वेल्थ मैनेजर्स अपने ग्राहकों को करते हैं।


गोल्ड


गोल्ड ने 2019 में 29 फीसदी रिटर्न दिया। ऐसे में कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि क्यों इनवेस्टर्स इस ओर खिंचे चले आ रहे हैं। वेल्थ मैनेजर्स गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) के जरिए गोल्ड में निवेश करने की सलाह देते हैं। एक्सिअम फाइनेंशियल सर्वेसेज के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर दीपक छाबड़िया कहते हैं, "किसी भी इनवेस्टर के पोर्टफोलियो में गोल्ड का होना जरूरी है क्योंकि यह सुरक्षित होता है और पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करता है।"


एंबिट वेल्थ मैनेजमेंट की चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर अमृता फरमान कहती हैं, "पूरी दुनिया में सेंट्रल बैंक (भारत में आरबीआई की तरह के केंद्रीय बैंक) गोल्ड को एक अहम डायवर्सिफिकेशन टूल के तौर पर देख रहे हैं। 2019 में सेंट्रल बैंकों की गोल्ड की खरीदारी 50 साल के रिकॉर्ड पर पहुंच गई। केंद्रीय बैंकों द्वारा गोल्ड की खरीदारी का इससे पिछला रिकॉर्ड 2018 का है।"


नेगेटिव यील्ड के चलते इनवेस्टर्स डेट से दूर हो रहे हैं और गोल्ड पर अपना भरोसा जता रहे हैं। सोवरेन डेट के मुकाबले गोल्ड को कहीं ज्यादा सुरक्षित निवेश माना जा रहा है। फरमान कहती हैं, "मिडल ईस्ट में पैदा हो रहे मौजूदा हालात चिंता की बड़ी वजह बन रहे हैं। हालांकि, फिलहाल किसी तरह की जंग की स्थिति बनती नहीं दिख रही है, लेकिन निवेशकों में इसे लेकर परेशानी है। यूएस-चाइना ट्रेड डील को लेकर भी अनिश्चितता का माहौल है, दूसरी तरह ब्रेग्जिट को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं। दुनिया भर में मची हुई इस तरह की उथल-पुथल से गोल्ड एक मजबूत निवेश का जरिया बनकर उभर रहा है।"


ऐसा नहीं है कि गोल्ड में निवेश में कोई जोखिम नहीं है। फाइनेंशियल मार्केट्स में अनिश्चितता कम हुई है साथ ही वैश्विक हालात भी सुधरे हैं। इसके अलावा रुपया भी मजबूत हुआ है। ऐसे में गोल्ड में निवेश का फैसला लेने से पहले आपको इन चीजों पर गौर करना चाहिए।


मोतीलाल ओसवाल प्राइवेट वेल्थ मैनेजमेंट के इनवेस्टमेंट एडवाइजरी के हेड आशीष शंकर सलाह देते हैं कि आपके पोर्टफोलियो में 10 फीसदी हिस्सा गोल्ड ईटीएफ या ऐसे फंड-ऑफ-फंड्स का होना चाहिए जो कि गोल्ड ईटीएफ की यूनिट्स में निवेश करते हैं। यह निवेश तीन साल के नजरिये से होना चाहिए।


स्मॉल-कैप फंड्स


यह एक ऐसी कैटेगरी है जिसमें निवेशक काफी तकलीफ का सामना कर चुके हैं। वैल्यू रिसर्च के मुताबिक, स्मॉल-कैप फंड्स ने गुजरे एक साल में तकरीबन कोई रिटर्न नहीं दिया है। गुजरे तीन साल में इन्होंने सालाना 6.44 फीसदी रिटर्न दिया है।


हालांकि, कई फंड मैनेजर दावा करते हैं कि फिलहाल कई स्मॉल कैप अच्छी वैल्यूएशन पर मौजूद हैं। बीएनपी पारिबा वेल्थ मैनेजमेंट के इनवेस्टमेंट हेड निमिष शाह के मुताबिक, "जोखिम  से बचने के लिए इनवेस्टर्स इनसे दूर बने हुए हैं। लेकिन, इस वक्त वैल्यूएशन निचले स्तर पर हैं और क्वॉलिटी स्टॉक्स बढ़िया डिस्काउंट पर मिल रहे हैं।"


शाह पोर्टफोलियो के 20 फीसदी हिस्से में स्मॉल कैप फंड रखने की सलाह दे रहे हैं। वह कहते हैं कि अगले 3-5 साल में यह पोर्टफोलियो को अच्छा रिटर्न दे सकता है।


ऊंचे रिटर्न की संभावना के बावजूद जोखिम को खारिज नहीं किया जा सकता है। इकनॉमी के सुस्त पड़ने या रिकवरी में वक्त लेने पर स्मॉल कैप स्टॉक्स पर ज्यादा चोट पड़ती है। अनिश्चित हालात में इन स्टॉक्स में तेज उतार-चढ़ाव होता है। इनमें निवेश का गुर यही है कि जब इनकी कीमतें बेहद कम हों तब इनमें पैसा लगाया जाए और गिरे हुए मार्केट्स के वक्त इनकी खरीदारी की जाए।


सेक्टर फंड्स


ऐसे वक्त पर जबकि मार्केट में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं है, उसमें कुछ सेक्टर दूसरों से अच्छा प्रदर्शन करते  हैं। शंकर सलाह देते हैं कि आक्रामक रूप से जोखिम ले सकने वाले लोग सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSE) ईटीएफ में पैसा लगाने पर विचार कर सकते हैं। वह कहते हैं, "हालांकि, अट्रैक्टिव वैल्यूएशन और ऊंची डिविडेंड यील्ड इन्हें निवेश का बढ़िया जरिया बना रही है, लेकिन इनके जोखिमों को देखते हुए  निवेशकों को इनमें रुक-रुककर ही पैसा लगाना चाहिए।"


छाबड़िया बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज एंड इंश्योरेंस (बीएफएसआई) सेक्टर इक्विटी फंड्स में पैसा लगाने की सलाह देते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंस सर्विसेज (IL&FS) में पैदा हुए संकट के बाद कई हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFC) के शेयरों में बड़ी गिरावट आई है। बैंकिंग सेक्टर लंबे वक्त से नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) की मुसीबत से जूझ रहा है।


इसे देखते हुए इस सेक्टर पर निगरानी की जरूरत है। एक कैटेगरी के तौर पर बीएफएसआई फंड्स ने गुजरे एक साल में 12.35 फीसदी रिटर्न दिया है। जोखिम से बचने के लिए बैंकिंग सेक्टर को ट्रैक करने वाले ईटीएफ पर भी गौर किया जा सकता है।


फरमान फार्मा और हेल्थकेयर फंड्स में पैसा लगाने की सलाह देती हैं। गुजरे पांच सालों में फार्मा फंड्स का प्रदर्शन कमजोर रहा है और इन्होंने महज 1.75 फीसदी रिटर्न ही दिया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कारोबारी मोर्चे पर लगातार कमजोर प्रदर्शन के चलते इस सेक्टर की वैल्यूएशन इसके हिस्टोरिकल एवरेज से काफी नीचे है जिसके चलते यह निवेशकों के लिए पैसा लगाने का एक मौका देता है।


फार्मा और BFSI दोनों ही सेक्टर रिटर्न को बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखे जा रहे हैं। हालांकि, सेक्टर फंड्स होने के नाते इनमें डायवर्सिफिकेशन नहीं है और यह जोखिम की एक बड़ी वजह है।


इंटरनेशनल फंड्स


ऐसे कई मौके होते हैं जहां जोखिम से बचने की जरूरत होती है। सैंक्टम वेल्थ मैनेजमेंट की इनवेस्टमेंट हेड रूपाली प्रभु कहती हैं, "ज्यादातर इनवेस्टर्स किसी एक एसेट क्लास में ही इनवेस्टमेंट को तरजीह देते हैं। यह डायवर्सिफिकेशन के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। यह सिद्धांत कहता है कि अलग-अलग एसेट क्लास एक अवधि के दौरान अलग-अलग तरह से प्रदर्शन करते हैं।"


रूपाली विदेशी बाजारों में लिस्टेड शेयरों में निवेश करने वाले भारतीय म्यूचुअल फंड्स में पैसा लगाने की सलाह देती हैं।


एवेंडस वेल्थ मैनेजमेंट के प्रॉडक्ट्स एंड एडवाइजरी के हेड अरविंद बंसल कहते हैं, "इन फंड्स ने कमजोर रुपये के चलते काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। सभी निवेशकों को करेंसी रिस्क को कम करने और ओवरऑल पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन के लिहाज से पांच से सात साल के निवेश नजरिये के साथ पोर्टफोलियो में इन्हें शामिल करना चाहिए।"


एक कैटेगरी के तौर पर गुजरे एक साल और तीन साल की अवधि में इन फंड्स ने क्रमशः 25.49 फीसदी और 10.43 फीसदी रिटर्न दिया है। मौजूदा वैश्विक हालात, जिस भौगोलिक इलाके में आप निवेश कर रहे हैं उसकी कमजोर ग्रोथ और रुपये के मुकाबले डॉलर के कमजोर होने से इन फंड्स से मिलने वाले रिटर्न को झटका लग सकता है।


क्रेडिट रिस्क फंड्स


गुजरे एक साल में क्रेडिट रिस्क फंड्स और कई अन्य डेट स्कीमों ने ऐसे बॉन्ड्स में पैसा लगाया है जिनकी क्रेडिट रेटिंग को डाउनग्रेड किया गया था। ये फंड्स AA-रेटिंग वाले बॉन्ड्स और दूसरे कम रेटिंग वाले इंस्ट्रूमेंट्स में पैसा लगाते हैं ताकि बढ़िया रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न मिल सके।


शाह कहते हैं, "कमजोर ग्रोथ की आशंकाओं के चलते इकनॉमी और एनबीएफसी सेक्टर में स्ट्रेस जारी रह सकता है, लेकिन चुनौती सही फंड मैनेजर और ऐसी स्कीम का चुनाव करने की है जिसमें मैच्योरिटी की यील्ड शॉर्ट-टर्म और बैंकिंग एंड पीएसयू बॉन्ड फंड्स के मुकाबले 1.5 से 2.5 फीसदी ज्यादा हो।"


इस रणनीति की सफलता रिस्क मैनेजमेंट पर टिकी हुई है। जितना बड़ा आपका क्रेडिट रिस्क फंड होगा उतना ही ज्यादा यह डायवर्सिफाइड होगा। ऐसे में, कहीं क्रेडिट रिस्क में उतार-चढ़ाव होने से फंड की नेट एसेट वैल्यू में कोई बड़ी गिरावट नहीं आएगी।


हेक्सागन कैपिटल एडवाइजर्स ने सबसे बड़े 15 क्रेडिट रिस्क फंड्स के एक साल और तीन साल के रिटर्न्स की स्टडी की है। इस स्टडी में पता चला है कि इन फंड्स ने तीन साल की अवधि में ज्यादा रिटर्न दिया है और इनमें कम उतार-चढ़ाव देखा गया है, लेकिन, एक साल की अवधि में इन्होंने कम रिटर्न दिया है और इनमें ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।


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