Moneycontrol » समाचार » आईपीओ - क्लासरूम

आईपीओ की बुनियादी जानकारी

क्यों आईपीओ निवेशकों को भा रहे हैं?
अपडेटेड Nov 18, 2010 पर 09:06  |  स्रोत : Hindi.in.com

moneycontrol.com



इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग्स (आईपीओ) क्या होते हैं? क्यों आईपीओ निवेशकों को भा रहे हैं? कैसे करें निवेश करते वक्त सही आईपीओ का चुनाव? क्यों पिछले कुछ सालों में कंपनियों में आईपीओ लाने की होड़ सी लग गई है?



कोटक इंवेस्टमेंट के एस रमेश और प्राइम डेटाबेस के पृथ्वी हल्दिया आईपीओ से जुड़े इन्हीं सवालों का जवाब देने वाले हैं।




सवाल: आईपीओ क्या होता है?



एस रमेश: जब कोई लिमिटेड कंपनी शेयर बाजार पर सूचीबद्ध होने के इरादे से शेयरों की आम निवेशकों को बेचने का प्रस्ताव रखती है उसे इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग्स या आईपीओ कहा जाता है। सूचीबद्ध होने के बाद कंपनी के शेयरों की खरीद-फरोख्त शेयर बाजार में हो सकती है।


सवाल: क्यों कंपनियां विस्तार के लिए आईपीओ को चुनती है?



पृथ्वी हल्दिया: जिन कंपनियों को पूंजी की जरूरत होती है वो आईपीओ लेकर आती हैं। साथ ही, विस्तार योजनाओं के लिए लगने वाले पैसे जमा करने के लिए भी कंपनियां आईपीओ चुनती हैं। अगर किसी कंपनी के पास नकद नहीं है, और कर्ज ले नहीं सकती है या इक्विटी बढ़ाना चाहती है, तो ऐसे में पूंजी जुटाने के लिए आईपीओ का सहारा लेती है। 



इसके अलावा आईपीओ द्वारा प्रमोटर कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचते हैं। इससे सूचीबद्ध होने के साथ कंपनी की इक्विटी में बदलाव नहीं आता है। बस कंपनी के इक्विटी की हिस्सेदारी बदल जाती हैं।



सरकारी कंपनियों के विनिवेश में भी यही होता है। आईपीओ के जरिए सरकार कंपनी में अपनी 5-10 फीसदी हिस्सेदारी रिटेल निवेशकों को बेचती है। इस तरह सरकार आईपीओ के जरिए पैसे उगाहती है। किसी निजी कंपनी के प्रमोटर हिस्सेदारी बेचता है, तो आईपीओ के पीछे पूंजी जमा करने के साथ कंपनी का मूल्याकंन बढ़ाने का भी मकसद होता है। जब तक कंपनी सूचीबद्ध नहीं होती है, तब तक कंपनी के मूल्यांकन जानकारी सभी को नहीं सकती है।



सूचीबद्ध होने के बाद कंपनी अपने शेयरों को अधिग्रहण या दूसरी किसी योजना में इस्तेमाल कर पाती है।




सवाल:  आईपीओ में निवेश करने से पहले निवेशकों को तय करना चाहिए कि वो आईपीओ में निवेश करना चाहते हैं या कंपनी में। ऐसा क्यों?



पृथ्वी हल्दिया: अगर निवेशक सिर्फ आईपीओ में निवेश करता है तो ऐसे में उसका इरादा शेयरों के लिस्ट होने पर मुनाफा काटना होता है। कंपनी में दिलचस्पी नहीं रखने वाले निवेशकों को लिस्टिंग के दिन की शेयर बेच देने चाहिएं।



लेकिन, अगर आईपीओ के जरिए कंपनी में निवेश किया है तो लिस्टिंग के दिन में हुए शेयर के उतार-चढ़ाव को नजरअंदाज करना ठीक रहेगा। क्योंकि, निवेश लंबी अवधि के लिए किया गया है। लिस्टिंग के दिन भारी गिरावट के बावजूद कई कंपनियों के शेयरों में बाद में अच्छी बढ़ोतरी दिखाई देती है।



जैसे, रूरल इलेक्ट्रिफाइंग कॉर्पोरेशन (आरईसी) का आईपीओ। लिस्टिंग होने के बाद आरईसी के शेयर करीब 50 फीसदी लुढ़के थे। लेकिन, कुछ दिनों में ही शेयरों की कीमतों में तीन गुना इजाफा देखा गया था।




सवाल: तो फिर आईपीओ में निवेश क्यों करना चाहिए? अनजानी कंपनी के शेयर में पैसा लगाने से निवेशकों को क्या फायदा मिलता है?



एस रमेश: जब किसी कंपनी का आईपीओ आता है तो शेयरों की कीमतें असली मूल्य से थोड़ी कम होती हैं। इसलिए, छोटे निवेशकों के लिए आईपीओ में पैसे लगाना फायदेमंद रहता है।



साथ ही, अच्छा कारोबार वाले कई नए क्षेत्रों की कंपनियों में से कोई भी सूचीबद्ध नहीं होती है। ऐसे में निवेशकों के पास दूसरी कंपनियों के सामने मिसाल कायम करने का मौका होता है। जैसे, डॉमिनोज पिज्जा, जूबिलियंट फूडवर्क्स के आईपीओ को रिटेल निवेशकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला।



तीसरी वजह है कि आईपीओ में निवेशकों के पास कम कीमत पर ज्यादा शेयर खरीदने का मौका होता है। आज कल हर निवेशक शेयर बाजार में सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि पैसा कमाने के लिए उतरता है। सस्ते में खरीदे गए इन शेयर, आगे चल कर निवेशकों को काफी अच्छा रिटर्न देते हैं।


सवाल: आईपीओ और एफपीओ में क्या अंतर है?



एस रमेश
: इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग्स को आईपीओ कहा जाता है। एफपीओ का मतलब है फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर। एफपीओ में पहले से सूचीबद्ध कंपनी अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचती है।


सवाल: निवेशकों को कैसे पता चल सकता है कि आईपीओ में तय किया गया भाव सही है या नहीं?



पृथ्वी हल्दिया: आईपीओ में निवेशकों को दो गुटों में बांटा जा सकता है। पहला गुट है क्यूआईबी यानि क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स। इन निवेशकों के पास किसी कंपनी के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए जरूरी संसाधन होते हैं। साथ ही, आईपीओ आने से पहले कंपनियां विशेषझों को मदद से क्यूआईबी कंपनी का सही मूल्यांकन कर सकती है।



लेकिन, छोटे और रिटेल निवेशकों के पास कंपनी की जानकारी ढूंढने का जरिया नहीं होता है। इस बात को ध्यान रखते हुए 1999 से आईपीओ का 50-60 फीसदी हिस्सा क्यूआईबी के लिए रिर्जव रखा जाता है। ओपन बुक बिल्डिंग सिस्टम से रिटेल निवेशक पता लगा सकते हैं कि आईपीओ को क्यूआईबी की ओर से कैसा रिस्पॉन्स मिल रहा है।



देखा गया है कि जिन आईपीओ में क्यूआईबी ने दिलचस्पी दिखाते हैं, उनमें रिटेल निवशकों के हिस्से शेयर कई गुना सबस्क्राइब हुए हैं।



साथ ही, रिटेल निवेशक आईपीओ के लिए सबस्क्राइब करते वक्त कट-ऑप ऑप्शन चुनते हैं। कट-ऑफ ऑप्शन का मतलब होता है कि निवेशक शेयर के लिए उतनी कीमत चुकाने को तैयार जितनी क्यूआईबी ने तय की है।



सेबी ने क्यूआईबी को आईपीओ के लिए 100 फीसदी मार्जिन जमा करने का निर्देश दिया है। रिटेल निवेशकों को कंपनी की बुक पर भी ध्यान रखना चाहिए। फिलहाल, कंपनी की बुक बिल्डिंग आईपीओ के आखिरी दिन ही होती है। ऐसे में रिटेल निवेशकों को क्यूआईबी से ही संकेत लेने पड़ते हैं।



लेकिन, आईपीओ में निवेश करते वक्त क्यूआईबी के संकेतों पर ही भरोसा नहीं करना चाहिए। निवेशकों को कंपनी के प्रमोटर की पूरी जानकारी हासिल करनी चाहिए। साथ ही, निवेशकों को पता करना चाहिए कि आईपीओ आने के पहले या आईपीओ में ही वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी कंपनी ने निवेश किया है। दोनों ही स्थितियों में रिटेल निवेशकों को ऐसे आईपीओ से बचना चाहिए।




अगर वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी कंपनी ने निवेश किया है, लेकिन उनका कम से कम 1 साल निवेश करने का इरादा है। तो रिटेल निवेशक आईपीओ में पैसा लगाने के बारे में सोच सकते हैं।


सवाल: अगर किसी पुराने जैसे, बैंकिंग या इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनी का आईपीओ आने वाला हो, तो पहले से सूचीबद्ध कंपनियों से तुलना करना कितना ठीक होगा?



एस रमेश: पुराने और विकसित क्षेत्र की कंपनी के आईपीओ की तुलना करते वक्त रिेटेल निवेशकों को कंपनी की उपलब्ध नकदी, मुनाफा, साल दर साल बढ़त जैसी बुनियादी बातें ध्यान रखनी चाहिए। रिटेल निवेशकों के पास जानकारी के कम साधन होते हैं। लेकिन, कंपनी की मूलभूत जानकारी को पहले से सूचीबद्ध कंपनियों के साथ मिलानी चाहिए।



मीडिया और ब्रोकरों की मदद से आईपीओ के फंडामेंटल और मूलभूत जानकारी रिटेल निवेशक जानकारी पा सकते हैं। बिजनेस अखबारों, चैनल और वेबसाइट से नए आईपीओ पर विस्तृत जानकारी आसानी से मिल सकती है।


सवाल: अगर किसी कंपनी की मूलभूत जानकारी और उसके मूल्यांकन में तालमेल न बैठ पा रहा हो, तो ऐसे में क्या निवेशकों को आईपीओ में पैसा लगाना चाहिए?



एस रमेश: निवेशकों को कंपनी के विश्लेषण को दो वर्गों में बांटना चाहिए। पहला है फंडामेंटल विश्लेषण, जिसमें कंपनी के प्रमोटर की जानकारी, कंपनी की बैलेंसशीट और कंपनी का पिछला प्रदर्शन शामिल हैं।



दूसरा है तकनीकी विश्लेषण। तकनीकी विश्लेषण का इस्तेमाल शेयर के छोटी और लंबी अवधि में उतार-चढ़ाव को जानने के लिए किया जाता है। इसलिए निवेशकों को अनुभवी ब्रोकर की राय के मुताबिक निवेश करना ठीक रहता है।


सवाल: आईपीओ की ग्रेडिंग कितनी ठीक होती है?



पृथ्वी हल्दिया: आईपीओ ग्रेडिंग पर भरोसा करके निवेश करना जोखिमभरा हो सकता है। देखा गया है कि 5 में से 1 या 2 अंक मिले आईपीओ ने शानदार प्रदर्शन किया। वहीं, 4 या 5 अंक वाले आईपीओ में पैसा लगाकर निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।


सवाल: क्या बातें हैं जिनका ख्याल निवेशकों को आईपीओ में पैसा लगाते वक्त रखना चाहिए? ऑफर डॉक्यूमेंट्स को पढ़ना कितना जरूरी है?



पृथ्वी हल्दिया: 1,000 पन्नों वाले ऑफर डॉक्यूमेंट को पूरा पढ़ना लगभग नामुकिन है। प्रोस्पेक्टस भी काफी लंबा होता है। लेकिन, निवेशकों के लिए ये जानना भी जरूरी है कि आईपीओ लाने वाली कंपनी का प्रमोटर कौन है।



निवेश करते वक्त जरूरी है कि कीमत के साथ साथ कंपनी को भी जाना जाए। आईपीओ में पैसा लगाते वक्त अगर प्रमोटर भरोसेमंद लगे, तभी निवेश करें। निवेशकों को कम से कम संक्षिप्त ऑफर डॉक्यूमेंट तो पढ़ना ही चाहिए। खासकर प्रमोटरों की जानकारी और निवेश से जुड़े जोखिम बताने वाले हिस्से को पढ़ना जरूरी है।



जोखिमों की सूची में से उन कारणों को अलग करना चाहिए, जिनसे प्रमोटर की पार्श्वभूमी और छुपे जोखिम पता किए जा सकें।


सवाल: आईपीओ का बाजार के सेंटीमेंट्स से क्या संबंध है?



एस रमेश: आईपीओ के प्रदर्शन और उस पर मिलने वाले रिटर्न पर काफी हद तक बाजार के रुख का असर पड़ता है। शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव और हाल के आईपीओ प्रदर्शन को दिखते हुए ही, निवेशक तय करते हैं, कि आईपीओ में पैसा लगाएं कि नहीं।


सवाल: आईपीओ पर ब्रोकरों या मीडिया की राय पर कितना अमल करना चाहिए?



एस रमेश: रिटेल निवेशकों के पास आईपीओ पर जानकारी पाने के लिए फिलहाल ब्रोकरों और मीडिया की राय ही साधन हैं। उनके जरिए ही ये पता लगाया जा सकता है कि किसी आईपीओ में निवेश करना फायदेमंद हो सकता है। आईपीओ को दूसरी कंपनियों के इश्यू से तुलना करना, आईपीओ से जुड़ा फायदा-नुकसान बताना - ये सब ब्रोकर और मीडिया अच्छी तरह कर रहें हैं।




सवाल: ग्रे-मार्केट प्रीमियम के बारे में आपका का कहना है?



पृथ्वी हल्दिया: ग्रे-मार्केट कितना बेभरोसेमंद होता है, इसका सबसे बात की सटीक मिसाल है - रिलायंस पावर का आईपीओ। 46 लाख निवेशकों को ग्रे-मार्केट प्रीमियम के लालच में आकर भारी नुकसान उठाना पड़ा। प्रीमियम शेयर का औपचारिक भाव नहीं होता है, बल्कि ये अटकलों पर आधारित होता है। मीडिया या फिर लोगों से ग्रे-मार्केट प्रीमियम के बारे में सुनकर लोगों को पैसा लगाना नहीं चाहिए।