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राष्ट्रीयकरण के बाद IBC बैंकिंग सेक्टर के लिए सबसे बड़ा फैसला: एके पुरवार

देश बैंकों के राष्ट्रीयकरण की गोल्डन जुबली मना रहा है। राष्ट्रीयकरण को पूरे 50 साल हो गए हैं।
अपडेटेड Jul 18, 2019 पर 16:35  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

देश बैंकों के राष्ट्रीयकरण की गोल्डन जुबली मना रहा है। राष्ट्रीयकरण को पूरे 50 साल हो गए हैं। 19 जुलाई 1969 को तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के 14 बड़े बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया था। इसके बाद 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला जिसमें और 6 निजी बैंकों को सरकारी कब्जे में लिया गया। इन 50 सालों में वक्त बदला, हालात बदले और कुछ जरूरतें भी बदलीं और इसी लिए अब बैंकिंग विस्तार के साथ विलय का भी दौर शुरु हो गया है।


साल 1993 में PNB ने New Bank Of India को खरीदा तो इसी साल देना बैंक और विजया बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में मिला दिया गया। लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि राष्ट्रीयकरण से पहले 14 बड़े बैंकों के पास देश की 80 फीसदी पूंजी थी और आज देश की बैंकिंग व्यवस्था नकदी की किल्लत से जूझ रही है। सवाल ये है कि अगले 50 साल में कैसी होगी भारत के बैंकों की तस्वीर।


बैंकों के सरकारीकरण के कल 50 साल पूरे हो रहे हैं। हालांकि ज्यादातर सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। लेकिन दिग्गज बैंकर्स का मानना है कि IBC के आने के बाद सरकारी बैंकों के लिए नए दौर की शुरुआत हुई है। एसबीआई के पूर्व चेयरमैन एके पुरवार का कहना है कि राष्ट्रीयकरण के बाद IBC बैंकिंग सेक्टर के लिए सबसे बड़ा फैसला है। केवल मजबूत सरकार ही ऐसा कड़ा फैसला ले सकती हैं। रिकवरी के लिए IBC सबसे मजबूत कानून है।