Moneycontrol » समाचार » बाज़ार खबरें

क्या है अलीबाबा के जैक मा का 996 वर्क कल्चर?

प्रकाशित Thu, 18, 2019 पर 10:47  |  स्रोत : Moneycontrol.com

चीन के दूसरे सबसे अमीर शख्स जैक मा फिलहाल अपने देश में घोर आलोचना झेल रहे हैं और इसके पीछे उनका एक बयान है। मुद्दा है चीन का वर्क कल्चर।


दरअसल, चीन के टेक सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल अलीबाबा के फाउंडर बिलियनेयर जैक मा ने चीन में चलने वाले 996 के वर्क कल्चर को अपना समर्थन दिया है। चीन में 996 के वर्क कल्चर पर पहले से ही बहस चल रही है।


996 वर्क कल्चर का मतलब है एक दिन में 12 घंटे और हफ्ते में छह दिन काम करना। चीन में बहुत सी कंपनियां इस सिस्टम के तहत काम करती हैं। जैक मा ने इस सिस्टम को अपना समर्थन देकर मानो इसे एक तरीके से सफलता का अचूक नुस्खा बता दिया है। यानी कि टेक सेक्टरों में आमतौर पर ऐसी धारणा बनती दिख रही है कि अगर आप ज्यादा घंटे काम करते हैं तो कंपनी का फायदा होता है।


बता दें कि चीन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 996 वर्क कल्चर को लेकर अभी ये बहस चल रही थी। मार्च महीने के अंत में माइक्रोसॉफ्ट के कोड शेयरिंग साइट गिटहब पर टेक सेक्टर में काम करने वाले कुछ प्रोफेशनल्स ने 996.ICU नाम से एक ऑनलाइन प्रोजेक्ट लॉन्च किया था, जिसमें ऑफिस और पर्सनल लाइफ में बैलेंस लाने की जरूरत पर बहस की जा रही थी।


इसी दौरान जैक मा ने अपनी कंपनी के कर्मचारियों के बीच एक संबोधन में कहा कि वो लकी हैं कि उन्हें ओवरवर्क करना पड़ रहा है। चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर अलीबाबा के ऑफिशियल अकाउंट के मुताबिक जैक मा ने युवाओं से कहा कि अगर वो अलीबाबा कंपनी में काम करना चाहते हैं तो उन्हें ओवरटाइम करने के लिए तैयार होना चाहिए। अगर वो ओवरटाइम नहीं कर सकते तो उन्हें अप्लाई करने की जरूरत ही नहीं है। मा ने ये दलील भी दी कि आज उनकी हैसियत के जितने भी लोग हैं, उन्होंने भी अपने वक्त में खूब ओवरटाइम किया है।


जैक मा ने ये भी कहा कि युवा बेहतर जिंदगी जीना चाहते हैं लेकिन उसके लिए मेहनत नहीं करना चाहते। उनके इस बयान पर आलोचना शुरू होने के बाद उन्होंने आगे ये भी कहा कि लोग वही सुनना चाहते हैं जो वो करेक्ट है लेकिन लोग सच नहीं सुनना चाहते।


जैक मा ही वो शख्स हैं, जिन्होंने कहा कि वो इस दुनिया में काम करने के लिए नहीं, जीने के लिए आए हैं। वो अपने ऑफिस में मरना नहीं चाहते। वो किसी बीच पर मरना चाहते हैं। लगता है कि जैक मा को ये बातें बस अपने लिए सही लगती हैं।


इस बहस में सबसे बड़ा पहलू ये है कि क्या ज्यादा घंटों के लिए काम करने से कंपनी का सच में लॉन्ग टर्म के लिए फायदा होता है क्योंकि ऐसे बहुत से देश है जो अपने कर्मचारियों से कम घंटों के लिए काम कराते हैं लेकिन उनकी प्रॉडक्विटिविटी काफी बेहतर है।


यूके में हुए एक सर्वे में पाया गया था कि ऐसे बहुत से देश हैं, जहां के कर्मचारी कम घंटों के लिए काम करते हैं लेकिन उनकी प्रोडक्टिविटी उन देशों से कहीं ज्यादा है, जहां के कर्मचारी हफ्ते में ज्यादा घंटों के लिए काम करते हैं।


कम घंटों के हिसाब से डेनमार्क का नाम सबसे ऊपर था लेकिन यहां की प्रोडक्टिविटी ब्रिटेन से ज्यादा थी, जहां के कर्मचारियों ने हफ्ते में ज्यादा घंटे काम किया था।


आपको ये तो मानना ही पड़ेगा कि प्रॉडक्टिविटी का ऑफिस में बिताए गए घंटों से कोई लेना-देना नहीं है। आप ऑफिस में कितने घंटे बिताते हैं, इससे देश की जीडीपी तय नहीं होती, आपने असल में कितना काम किया है, इससे जीडीपी के आंकड़े तय होंगे। लेकिन इस बात को तब अनदेखा किया जा सकता है, जब विश्व की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यस्था का दूसरा सबसे अमीर शख्स ओवरवर्क को सफलता की कुंजी बताए।