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आवाज़ अड्डाः मोदी के आगे सभी फैक्टर फेल

इसे मोदी का चमत्कार कहेंगे या पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत, जिसने विपक्षी पार्टियों के हर दांव पेंच को ध्वस्त कर दिया।
अपडेटेड May 25, 2019 पर 12:38  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

नमो नमो या मोदी मोदी। आप जो चाहे कह लें, लेकिन बीजेपी ने 2014 की कहानी फिर दोहरा कर दिखा दी है। इस महाविजय के महानायक नरेंद्र मोदी की तारीफ में बहुत कुछ कहा जा चुका है और आगे बहुत कुछ कहा भी जाएगा। लेकिन ये बात अब एकदम पत्थर की लकीर की तरह साफ हो चुकी है कि मोदी और शाह की जोड़ी के पास चुनाव जीतने का अचूक फॉर्मूला है और विपक्ष में किसी के पास भी उनके इस मंतर की काट नहीं है। संगठन की शक्ति, सरकारी स्कीमों का फायदा समाज के आखिरी आदमी तक पहुंचाना, वोटर के दिल में अपनी जगह बनाना, जनता के मन को पढ़ना और विपक्ष की अगली सात चालों को नाकाम करने की रणनीति पहले से तैयार रखना। ये पूरा एक्शन प्लान है इस जोड़ी की सफलता का रहस्य।


इसी का असर है कि नरेंद्र मोदी का जादू देश के कोने कोने में जनता के सिर चढ़कर बोला और अकेले बीजेपी को इसने 303 सीटें दिलवा दीं। किसी को भी इतने प्रचंड बहुमत की उम्मीद नहीं थी। विपक्षी तो अभी समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ये सब हुआ कैसे। लेकिन ध्यान से देखें तो साफ है कि 2014 से ही बीजेपी और नरेंद्र मोदी 2019 के चुनाव की तैयारी कर रहे थे। इसे मोदी का चमत्कार कहेंगे या पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत, जिसने विपक्षी पार्टियों के हर दांव पेंच को ध्वस्त कर दिया। कहा तो ये भी जा रहा है कि हर सीट पर हर विरोधी के सामने नरेंद्र मोदी ही चुनाव लड़ रहे थे। 


लगातार दूसरी बार बंपर बहुमत हासिल करके एक बार फिर मोदी सरकार केंद्र में आ गई है। इस प्रचंड जीत के महानायक बने हैं खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। मोदी सुनामी पर सवार होकर बीजेपी ने 303 और एनडीए ने 353 सीटें जीत ली हैं। नरेंद्र मोदी इस महाविजय का श्रेय जनता को दे रहे हैं। 


बीजेपी की इस जीत की पटकथा 2014 से ही लिखी जा रही थी। मोदी ने गरीबों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू की जिनका प्रचार भी बड़े स्तर पर किया गया। शौचालय बनवाने से लेकर घर में गैस का सिलिंडर पहुंचाने तक, ये स्कीमें काम कर गईं और मोदी एक बड़े वर्ग को लुभाने में कामयाब रहे। मोदी की लोकप्रियता और साफ छवि को बीजेपी ने खूब भुनाया। राष्ट्रवाद का मुद्दा भी बीजेपी के लिए वरदान साबित हुआ। बीजेपी ने सभी जाति समीकरण ध्वस्त कर दिए। मोदी जातिगत समीकरण को लेकर विपक्षी पार्टियों पर कटाक्ष कर रहे हैं।


जहां एक तरफ बीजेपी कार्यकर्ताओं में जश्न का माहौल है। वहीं विपक्षी पार्टियों में हार का मंथन शुरू हो गया है। इतनी बड़ी हार कैसे हो गई, इसका जवाब ढूंढा जा रहा है। कांग्रेस को लगता है कि मोदी की रणनीति काम कर गई।


गठबंधन करने का विपक्ष का फॉर्मूला चलेगा, इसको लेकर पहले से संदेह था। आधी अधूरी एकजुटता मोदी के आक्रामक प्रचार और चुनाव की मशीनरी को चुनौती नहीं दे पाई। मोदी जिस लहर पर अभी सवार हैं क्या उसे एकजुट विपक्ष भी चैलेंज दे पाता? क्या विपक्ष की करारी हार के साथ बीजेपी ने जाति की राजनीति करने वालों को भी सोचने पर मजबूर किया है? या अगले चुनाव तक चीजें वापस अपने ढर्रे पर लौट आएंगी?