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आवाज़ अड्डाः जीडीपी ग्रोथ ने किया निराश, आंकड़ो पर मचा बवाल

प्रकाशित Sat, 01, 2018 पर 13:55  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट और जीवीए यानी ग्रॉस वैल्यू ऐडेड। देश की तरक्की को नापने के लिए अब ये दो पैमाने इस्तेमाल होते हैं। 2 दिन पहले ही सरकार ने जीडीपी का बेस बदलकर पिछले कई सालों की ग्रोथ की रफ्तार का आंकड़ा बदल दिया था। मगर अब जो आंकड़े सामने आए हैं वो चिंता जनक लग रहे हैं। अगस्त से अक्टूबर के बीच जीडीपी ग्रोथ 8.2 फीसदी से घटकर 7.1 फीसदी हो गई है। जानकारों को पहले ही डर था कि ग्रोथ में गिरावट आएगी।


सरकार कह रही है जीडीपी आंकड़ों में बेस इफेक्ट का असर दिख रहा है। वहीं नए बेस ईयर पर आधारित जीडीपी के आंकड़ों पर कांग्रेस और बीजेपी में जंग छिड़ गई है। नए आंकड़ों में यूपीए के कार्यकाल के दौरान ग्रोथ धीमी दिखाई गई है। कांग्रेस ने इसे भद्दा मजाक बताया है। जबकि बीजेपी इन आंकड़ों को ही ग्रोथ नापने का सही तरीका बता रही है। मामला मेरी ग्रोथ तेरी ग्रोथ से बेहतर वाला हो गया है। लेकिन इसके बीच आम आदमी का सवाल ये है कि मोदी सरकार देश की तरक्की के लिए जो भी काम कर रही है, क्या उसका फायदा जनता को मिल रहा है?


देश की अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी पर तो है लेकिन रफ्तार धीमी पड़ गई है। वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में 8 प्वाइंट 2 फीसदी की विकास दर हासिल करने के बाद दूसरी तिमाही में हम 7.1 फीसदी पर ठहर गए। मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग, एग्रीकल्चर और कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टरों की ग्रोथ ने मायूस किया है।


सरकार भी इन जीडीपी के आंकड़ों से निराश है। लेकिन डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि 6 महीनों में 7.6 फीसदी की ग्रोथ दुनिया में सबसे ज्यादा है। लेकिन जानकारों को लगता है कि ग्रोथ की रफ्तार को बनाए रखने के लिए कुछ और एक्शन की जरूरत है।


हम यहां ग्रोथ के ताजा नंबरों की बात कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ अभी एक बहस और चल रही है- मनमोहन राज की तरक्की बनाम मोदी राज की तरक्की की। जीडीपी के आंकड़े जारी करने वाली संस्था सीएसओ ने साल 2011-12 को बेस ईयर मानकर पिछले वर्षों के नए आंकड़े जारी किए। लेकिन इस नंबर में मनमोहन राज के आंकड़े उतने अच्छे नहीं दिख रहे जैसा पहले दिखते थे। 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान औसत जीडीपी ग्रोथ 7.75 फीसदी से घटकर 6.82 फीसदी हो गई है। जबकि मोदी सरकार के चार साल के दौरान औसत जीडीपी ग्रोथ 7.35 फीसदी  बताई गई है। जाहिर है नए नियमों से नंबर गेम में पिछड़ने से कांग्रेस भड़क गई है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसे एक भद्दा मजाक बताया और नीति आयोग जैसी संस्था को बंद करने का सुझाव दे डाला। सीएसओ की साख पर सवाल उठ गए हैं।


कांग्रेस के आरोपों को बीजेपी ज्यादा भाव नहीं दे रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली का मानना है कि कांग्रेस अपनी सहूलियत के हिसाब से डाटा का इस्तेमाल कर रही है। नए आंकड़ों को लेकर कांग्रेस ने नीति आयोग की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। वैसे नीति आयोग का मानना है कि जीडीपी के आकलन का जो तरीका अब अपनाया गया है वो ज्यादा सही है।


सवाल ये है कि क्या सरकार जानबूझ कर आंकड़ों के साथ बाजीगरी कर रही है। और अगर ऐसा है तो वो क्या हासिल करना चाहती है। एक आम आदमी तो कुछ समय के लिए इस बात में फख्र महसूस कर सकता है कि उसका देश दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। लेकिन आखिर में उस आम आदमी के लिए बात इस पर ही आ जाएगी कि क्या तरक्की के अच्छे नंबर से उसकी लाइफ में अंतर पड़ा है। इसका कितना फायदा उसे मिला है। आखिरकार फैसला तो वो नंबर पर नहीं, अपने निजी अनुभव पर ही करेगा। और ऐसा होना है तो फिर चुनाव के पास आकर नंबर में बाजी मारने की ये होड़ क्यों?