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आवाज़ अड्डाः भारत में बढ़ती आबादी, बनेगी चुनौती!

प्रकाशित Thu, 12, 2018 पर 09:28  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

हम दो हमारे दो। छोटा परिवार सुखी परिवार। आज़ादी के बाद 50-60 साल तक ये नारे पूरे भारत में छाए रहे। इमर्जेंसी में तो हद ही हो गई, नारे से आगे बढ़कर बात जोर जबर्दस्ती तक पहुंच गई और जब इमर्जेंसी के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूटा तो फिर ये नारे भी कहीं गुम से हो गए। हालांकि किसी ने कभी कहा नहीं, लेकिन परिवार नियोजन पर जोर कम हो गया। आर्थिक उदारीकरण के बाद तो एक नया मुहावरा ही शुरू हो गया। डेमोग्राफिक डिविडेंड यानि जवान आबादी की ताकत।


विद्वानों ने उदाहरण के साथ सिद्ध कर दिया कि अगर भारत आबादी को काबू नहीं कर पाया तो ये बदकिस्मती नहीं खुशकिस्मती थी, क्योंकि इसी वजह से यहां की आबादी में नौजवानों का हिस्सा दुनिया में सबसे ज्यादा है, और यही लोग हैं जो अब दुनिया भर के जॉब मार्केट पर छा जाएंगे। और अब तो तस्वीर कुछ ऐसी दिखने लगी है कि आबादी के मामले में भारत चीन को भी पीछे छोड़ेगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या आबादी हमारी बड़ी ताकत है या हम किसी खुशफहमी के शिकार हैं। आज हम आवाज़ अड्डा में सवाल पूछ रहे हैं कि बड़ी आबादी का देश को फायदा मिला है या नुकसान?


भारत की आबादी में बढ़ोतरी को डेमोग्राफिक डिविडेंड यानि जनसंख्या के फायदे के तौर पर देखा जाता रहा है। परिवार नियोजन पर सरकार के असफल कार्यक्रमों का नतीजा ये रहा कि भारत चीन के बाद 130 करोड़ लोगों के साथ दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है। देश में युवाओं की संख्या दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले सबसे ज्यादा है। लेकिन रोजगार नहीं मिलने पर ये ताकत कमजोरी में भी बदल सकती है। बड़ा सवाल ये है कि क्या देश को वाकई में बढ़ी हुई आबादी का फायदा हो रहा है। और क्या अब वक्त आ गया है कि सरकार को आबादी पर नियंत्रण के लिए चीन जैसी सख्त नीति अपनानी चाहिए।


हम दो हमारे दो तेजी से बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के लिए सालों पहले दिया गया सरकार का ये नारा अब बेअसर साबित होता दिख रहा है। चीन के बाद भारत 130 करोड़ लोगों के साथ दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। सरकार ने परिवार नियोजन के लिए कई कार्यक्रम चलाए। लेकिन ये बेअसर ही साबित हुए । नतीजा देश में युवाओं की जनसंख्या में तेजी से बढ़ोतरी ।


भारत में करीब 36 करोड़ लोगों की उम्र 10 से 24 साल के बीच है। और करीब 65 परसेंट आबादी की उम्र 35 साल से कम है। 2020 तक भारतीय नागरिक की औसत उम्र 29 साल होने का अनुमान है। जबकि चीन में ये 37 साल और जापान में 48 साल रहने का अनुमान है।


भारत की युवा वर्कफोर्स को डेमोग्राफिक डिविडेंड यानि आबादी के फायदे के रूप में देखा जाता रहा है। जानकार देश में आईटी क्षेत्र में क्रांति को इसी का नतीजा बताते रहे हैं। लेकिन बढ़ती युवा आबादी के सामने कई चुनौतियां भी हैं ।


सबसे बड़ी चुनौती है रोजगार देने की। हालांकि सरकार इसके लिए लगातार कदम उठा रही है। लेकिन इतनी बड़ी तादाद में युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है । बढ़ती आबादी को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं कैसे मुहैया कराई जाएं ये भी चिंता का विषय है।


पिछले कुछ सालों में उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण के राज्य आबादी पर नियंत्रण करने में कामयाब रहे है। हिंदुओं के मुकाबले मुस्लिम समुदाय की आबादी में बढ़ोतरी को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं । लेकिन अभी भी पूरे देश में आबादी पर नियंत्रण के लिए कोई सख्त नीति नहीं है । यहां सवाल ये है कि क्या बढ़ी हुई आबादी का लोगों को फायदा हो रहा है? क्या अब वक्त आ गया है कि आबादी पर नियंत्रण के लिए सरकार को सख्त नीति अपनानी चाहिए? और आबादी में तेजी से हो रही बढ़ोतरी क्या आने वाले दिनों में देश पर बोझ नहीं बन जाएगी?