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आवाज़ अड्डा: प्रदूषण से हाल बेहाल, समस्याओं से निपटने का है कोई एक्शन प्लान!

चारों तरफ हल्ला मचा हुआ है। दिल्ली की हवा फिर बेहद खराब हो गई है।
अपडेटेड Nov 06, 2019 पर 11:29  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

चारों तरफ हल्ला मचा हुआ है। दिल्ली की हवा फिर बेहद खराब हो गई है। ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ एक दिन में अचानक हो गया। लेकिन ऐसा है नहीं। सबको पता था फिर वो दिल्ली की सरकार हो, केंद्र की सरकार हो पराली जलाने वाले राज्य हों। लेकिन सबका रिस्पॉन्स देखिए, ऐसे अनजान बनकर हैरान हैं कि इस पर ताजुब्ब करने से ज्यादा आप और हम कर क्या सकते हैं।


दिल्ली के पॉल्यूशन का सॉल्यूशन तो लगता है दिवाली से दिवाली तक का प्लान है। कुछ एक्शन इस दिवाली फिर साल भर तक अगली दिवाली का इंतजार। दिल्ली ही क्यों-- मुंबई में मॉनसून से मॉनसून तक की तैयारी का ही जायजा ले लीजिए। सड़कों के गड्ढे, हर बारिश में जलमग्न होती महानगरी। अखबारों, न्यूज चैनलों पर अपनी परेशानी बताते लोग। फिर नेताओं और अफसरों के कुछ स्टैंटर्ड जवाब। लेकिन बारिश थमी नहीं कि एक्शन भी गायब। सब अगले मॉनसून का इंतजार करने लगते हैं।


पटना बारिश में डूबने लगा तो नीतीश बाबू बिहार के क्राइसिस मिसमैनजेमेंट की तुलना सीधे अमेरिका से करने लगे। उन्हें ये देखने की जरूरत नहीं हुई कि पटना की बाढ़ कुदरती कम, इंसानी करामात ज्यादा थी। नालों की जगह बने मकान दुकान देख लेते तो बात समझ में आ जाती।


मतलब ये है कि हमारी सरकारों, प्रशासनों का रवैया ये क्यों होता है कि हम हर छोटी समस्या को बड़ा संकट बनने देते हैं और जबतक पानी नाक से ऊपर नहीं पहुंच जाता तब तक एक्शन नहीं लेते। और हर मौके पर हक्के बक्के होने का ये भाव अब हमारी आदत बन गया है।


इस शोरगुल से दिल्ली की जहरीली हवा साफ नहीं होगी। सियासत है  सॉल्यूशन की किसी को परवाह नहीं है। जहां एक्शन होना चाहिए, वहां नेताओं के रिएक्शन आ रहे हैं। नेताओं और अफसरों के लिए दिल्ली का प्रदूषण दिवाली से दिवाली तक सालाना इवेंट बन कर रह गया है। जिसका ठीकरा हर बार पटाखे और हरियाणा, पंजाब में जलने वाली पराली पर फोड़ दिया जाता है। एक्शन के नाम पर हेल्थ इमरजेंसी लागू कर दी जाती है। स्कूलों में छुट्टी और सभी तरह के निर्माण कार्य बंद। कुछ दिन के लिए ऑड-ईवन स्कीम भी आ जाती है। मामला ज्यादा सीरियस हुआ तो हाई लेवल मीटिंग बुला ली जाती है। लेकिन अगर इन नेताओं से पूछिए कि क्या अगली दिवाली में सब ठीक होगा इसकी कोई गारंटी नहीं देगा।


मुंबई और पटना में बारिश के दौरान बाढ़ का कहर हो या चेन्नई में पानी की भयंकर किल्लत। ऐसा लगता है मानो ये सब अचानक हो गया है और हमारी कोई तैयारी नहीं है। मुंबई की महानगरपालिका का सालाना बजट कई राज्यों के बजट से ज्यादा है। लेकिन पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर से पूरा शहर चरमरा रहा है। हर साल बारिश के मौसम में सड़कें नदी-तालाब में बदल जाती हैं। इस बार पटना में आई बाढ़ ने शहर की सीवेज व्यवस्था की पोल खोल दी। पटना के कई इलाके 10 दिन तक पानी में डूबे रहे। मॉनसून से पहले पूरा चेन्नई पानी की कमी की वजह से त्राहिमाम करता रहा। भूजल के दोहन से जल स्तर इतना गिर गया लोग बूंद बूंद पानी के लिए तरस गए। नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 2020 तक देश के 21 बड़े शहरों में भूजल खत्म हो जाएगा।


आप इन में दर्जनों और उदाहरण जोड़ लीजिए। मुंबई में दो साल पहले कमला मिल्स में गैरकानूनी रूप से चल रहे रेस्टोरेंट को किसने लाइसेंस दिया था जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी। आखिर किसी भी लेवल पर ये गड़बड़ी पकड़ में क्यों नहीं आई। किसी भी शहर में हो रहे अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए आखिर दखल कोर्ट को ही क्यों देना पड़ता है?


सवाल है कि सब कुछ जब आंखों के सामने है तो फिर इस पर एक्शन लेने में देरी क्यों होती है? क्या जब समस्याएं बढ़ रही होती हैं तो हमारी सरकारें आंखें बंद किए रहती हैं? और जब वो हाथ से बाहर हो जाती हैं तो फिर उनके सामने सरेंडर कर देती हैं? क्या हमें क्राइसिस होने पर ही एक्शन और प्लानिंग की याद आती है? फिर पैसे भी निकल आते हैं एक्शन भी दिखता है। क्या जनता से जुड़े ऐसे मुद्दों के संकट बनने से पहले सुलझाने की पहल नहीं होनी चाहिए? या वो इसलिए ऐसा नहीं करती क्योंकि इससे वोट हासिल नहीं होते।