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आवाज़ अड्डाः लोकपाल की नियुक्ति पर बेरुखी क्यों!

प्रकाशित Tue, 03, 2018 पर 20:59  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

लोकपाल यानि एक ऐसी ताकत जो देश में किसी भी बड़ी कुर्सी पर बैठे लोगों के खिलाफ शिकायत की सुनवाई कर सके। 1963 में पहली बार भारत में लोकपाल बनाने का प्रस्ताव आया था। 1968 में इंदिरा गांधी के राज में लोकपाल बिल भी लोकसभा में रखा गया, हालांकि तब सांसद और प्रधानमंत्री इसके दायरे में नहीं थे। 1969 में ये बिल पास भी हो गया मगर उसके तुरंत बाद लोकसभा भंग हो गई इसलिए ये कानून नहीं बन पाया। तब से कुल मिलाकर सात प्रधानमंत्रियों के दौर में आठ बार लोकपाल बिल आ चुके हैं मगर अंजाम तक नहीं पहुंच पाए। 2011 में अन्ना आंदोलन और उसके बाद का किस्सा तो आम है।


इस वक्त सरकार में बैठी पार्टी भी चुनाव से पहले तक लोकपाल के मुद्दे पर जमीन आसमान एक करती थी, लेकिन कुर्सी पर आने के बाद हुआ क्या? भ्रष्टाचारी मंत्रियों और अफसरों की जांच के लिए कानून तो बन गया लेकिन चार साल बाद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। तो सवाल यही है क्या सरकार लोकपाल की नियुक्ति को लेकर गंभीर नहीं है। क्या लोकपाल की नियुक्ति को जानबूझ कर टालने की कोशिश हो रही है ।


2011 के अन्ना आंदोलन का फोकस भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग था। इस आंदोलन की हाईलाइट थी मजबूत लोकपाल। ये लोकपाल भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों और बड़े सरकारी अधिकारियों को सजा दिलाने के लिए था। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार पर दबाव बना और 2013 में लोकपाल कानून संसद से पास हो गया। 2014 में राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये कानून तो बन गया लेकिन देश को अब तक लोकपाल नहीं मिल पाया है। अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए लोकपाल की नियुक्ति की समय सीमा बताने के लिए सरकार को 10 दिन का समय दिया है। सरकार तर्क देती रही है कि लोकपाल के चयन के लिए नेता प्रतिपक्ष की जरूरत है, जो मौजूदा सरकार में नहीं है । इसलिए लोकपाल के चयन में दिक्कत आ रही है। लेकिन लोकपाल में देरी के लिए कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है।


सुप्रीम कोर्ट में एनजीओ कॉमन कॉज ने जनहित याचिका दायर करके लोकपाल की नियुक्ति में देरी का मुद्दा उठाया था। याचिकाकर्ता के मुताबिक सरकार जानबूझ कर लोकपाल की नियुक्ति को टाल रही है। सुप्रीम कोर्ट भी साफ कर चुका है कि लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यानी कांग्रेस के सदन में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को नेता प्रतिपक्ष मानते हुए लोकपाल के गठन की प्रक्रिया पूरी की जाए। लेकिन इसके बावजूद लोकपाल की नियुक्ति अधर में अटकी हुई है । फिलहाल नेता विपक्ष की जगह सबसे बड़ी पार्टी के नेता को कमिटी में रखने का संशोधन कानून में किया जाना बाकी है।


यहां सवाल ये है कि क्या सरकार तकनीकी मुद्दों की आड़ में लोकपाल बनाने से बच रही है। क्या दूसरी पार्टियां भी लोकपाल जैसी व्यवस्था चाहती हैं? और सबसे बड़ा सवाल ये कि 2014 में नरेंद्र मोदी को जो जनादेश मिला उसमें भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा था। ऐसे में अगर चार साल बाद भी मोदी सरकार लोकपाल नहीं बना पाई तो क्या लोग इसे उसकी नाकामयाबी मानेंगे?