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आरबीआई-सरकार की तकरार, बैंकिंग में कैसे होगा सुधार!

प्रकाशित Thu, 01, 2018 पर 09:12  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पहले सीबीआई और अब आरबीआई। एक तरफ चुनी हुई सरकार है तो दूसरी तरफ स्वतंत्र रेगुलेटर। दोनों के बीच रस्साकशी चल रही है। सरकार और आरबीआई के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद है। बातचीत से काम नहीं बना तो विवाद खड़ा हो गया। विवाद को खुले में पहुंचा दिया आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने। उन्होंने कहा कि सरकार को रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का ख्याल रखना चाहिए। दुनिया के कई उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि जब सरकारें दखल देती हैं तो इसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ती है। इस बयान के बाद से ही तरह-तरह की अटकलें चलने लगीं। सरकार ने साफ कहा आरबीआई की स्वायत्तता सुरक्षित है। लेकिन साथ ही ये भी कहा गया कि सरकार और आरबीआई दोनों को ही जनहित का ख्याल रखना होगा।


अब सवाल है कि क्या सरकार और आरबीआई के लिए जनहित का अर्थ एक ही है या नहीं। क्या सरकार आरबीआई एक्ट की धारा 7 का इस्तेमाल करके उसे निर्देश दे सकती है। क्या हालात इतने बिगड़ गए हैं कि गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा देने की भी सोच सकते हैं। सवाल बहुत हैं और सस्पेंस बरकरार है। कांग्रेस को भी फिर मौका मिल गया आरोप लगाने का कि सरकार देश के संस्थानों को धराशाई करना चाहती है। सवाल ये है कि क्या सरकार आरबीआई के ऊपर दबाव बना रही है और आरबीआई और सरकार के झगड़े में किसकी साख को झटका लगा है?


रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। ये बात चर्चा में गाहे बगाहे आती तो रही थी कि आरबीआई के कई फैसलों से सरकार खुश नहीं है। लेकिन बात इतनी बिगड़ जाएगी कि गवर्नर के इस्तीफे तक की बात होने लगे तो मामला वाकई सीरियस है। खबर ये भी चली कि सरकार ने आरबीआई एक्ट के उस अमोघ अस्त्र सेक्शन 7 का भी इस्तेमाल कर डाला है। यानी इसके बात रिजर्व बैंक की ऑटोनॉमी खत्म और आरबीआई का काम सरकार के निर्देशों को लागू करना भर होगा। लेकिन सरकार ने बयान जारी कर साफ कर दिया कि अभी हालात इतने खराब नहीं हुए हैं।


दरअसल पिछले दिनों आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा था कि फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के लिए जरूरी है कि आरबीआई को अपना काम करने के लिए ज्यादा आजादी दी जाए। सरकारी बैंकों पर आरबीआई को ज्यादा अख्तियार देने की भी उन्होंने मांग की थी। पूरे भाषण का सार ये था कि सरकार बैंकों के कामकाज में दखल तो देती ही है, रिजर्व बैंक की स्वायत्तता भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। जाहिर है ये बात सरकार को नागवार गुजरी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई को सलाह दी कि स्वायत्तता का मतलब एकतरफा फैसला नहीं होता है।


वैसे तीन बड़े मुद्दे हैं जहां सरकार की बातों को रिजर्व बैंक मानने को तैयार नहीं है। सरकार चाहती है कि पावर कंपनियों के लोन को एनपीए घोषित करने में रियायत बरती जाए। आरबीआई का मानना है कि लोन पावर के हों या इंफ्रा के जो कर्ज डूबे वो सभी एनपीए हैं और वो कोई रियायत देने के मूड में नहीं है। सरकार चाहती है कि आरबीआई के रिजर्व का इस्तेमाल बैंकों के रीकैपिटलाइजेशन के लिए किया जाए और पीसीए के तहत लाए गए बैंकों को नए लोन देने की छूट दी जाए। आरबीआई को ये मंजूर नहीं है।


लोन डिफॉल्ट और एनबीएफसी में नकदी की दिक्कत को लेकर भी सरकार और आरबीआई के बीच मतभेद है। वित्त मंत्री का मानना है कि बैंकिंग रेगुलेटर ने अगर अपना काम सही तरीके से किया होता तो ये संकट इतना बड़ा नहीं होता।


उधर सीबीआई के बाद आरबीआई, ये विपक्ष को अच्छा नारा मिल गया है। राफेल और सीबीआई के मुद्दे पर सरकार को घेरने में लगी कांग्रेस कह रही है कि सरकार ने अपनी बंदूक आरबीआई की तरफ घुमा दी है। विपक्ष के इस हमले का सामना करने के लिए सरकार को तो तैयार रहना ही चाहिए। लेकिन सवाल उससे बड़ा है। चुनाव के करीब आते-आते क्या सरकार रिजर्व बैंक पर कुछ ऐसे दबाव बना रही है जो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं हैं। क्या चुनी हुई सरकार के जनहित में और रिजर्व बैंक के जनहित में टकराव है। अगर ये सब इतना साफ होता तो क्या अलग से बैंकिंग रेगुलेटर की जरूरत भी होती। असली सवाल है कि सरकार और रिजर्व बैंक के इस मुकाबले में कोई भी हारे जीते लेकिन ऐसे मनमुटाव हमारी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए खतरनाक नही हैं क्या।