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चुनाव अड्डाः विपक्ष ने मोदी को मुद्दा बनाकर गलती की?

प्रकाशित Wed, 22, 2019 पर 07:51  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

चर्चा तो आज ये भी हो सकती है कि एक्जिट पोल के नतीजे कितने भरोसेमंद हैं। ये भी कि विपक्षी दल ईवीएम पर जो सवाल उठा रहे हैं वो कितने जायज़ हैं और ये भी कि जमीनी सच्चाई और एक्जिट पोल के नतीजों में क्या कोई तारतम्य दिख रहा है। चर्चा ये भी हो सकती है कि नई सरकार के सामने अब कितनी बड़ी चुनौतियां हैं और उसका एजेंडा क्या होना चाहिए। लेकिन अब रिजल्ट में सिर्फ दो रात और एक दिन बाकी है।


पता चल जाएगा कि एक्जिट पोल सही है या गलत। गलत होंगे तो चर्चा ही नहीं होगी बहुत कुछ और भी होगा। लेकिन फिलहाल वक्त है ये बात करने का कि अगर ये नतीजे सही हैं तो ये क्या कह रहे हैं। साफ है कि 2014 में अबकी बार मोदी सरकार हो या इस बार मोदी है तो मुमकिन है का नारा, दोनों चुनावों के केंद्र में मोदी ही रहे। ऐसा लग रहा है कि ब्रांड मोदी के आगे विपक्षी पार्टियों के सभी दांव पेंच फेल हो गए हैं। ब्रांड मोदी कितना बड़ा हो गया है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव की शुरुआत में विपक्ष ने जमीनी मुद्दे उठाए। लेकिन बाद में खुद मोदी को ही मुद्दा बना दिया। सवाल यही है कि क्या चुनाव में मोदी को निशाना बनाना विपक्ष को भारी पड़ गया?


लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का, राजनीतिक पार्टियां वोट पाने के लिए मुद्दे बनाती हैं और उन्हें जोरशोर से उछालती हैं। वैसे तो इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी और विपक्षी पार्टियों के घोषणापत्र में मुद्दे देखे जा सकते हैं। लेकिन चुनाव प्रचार में इनकी चर्चा कम ही हुई। असल में चुनाव के दौरान जो सबसे बड़ा मुद्दा छाया रहा वो खुद ब्रांड मोदी था।


बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने और राष्ट्रवाद के मुद्दे को मजबूत करने में ब्रांड मोदी ने अहम भूमिका निभाई। राष्ट्रवाद और देशभक्ति के मुद्दे पर मोदी ने विपक्षी पार्टियों को बैकफुट पर धकेल दिया। टीवी, रेडियो हो या सोशल मीडिया, मोदी आम जनता से सीधा कनेक्ट बनाने में सफल रहे। लोगों से सीधे संवाद करने की उनकी कला ने मोदी को बड़ा ब्रांड बना दिया। जनता के दिलों में उन्होंने अलग छाप छोड़ी। कुंभ मेले में सफाई कर्मचारियों के पैर धोने से लेकर केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाने तक, मोदी जनता के साथ जुड़े रहे। इसी कनेक्ट का नतीजा था कि चुनाव के दौरान मोदी पर विपक्ष के निजी हमले जनता को चुभने लगे।


चुनाव शुरू हुआ फिर एक बार मोदी सरकार के नारे से। मैं भी चौकीदार का कैंपेन चला और अंत हुआ आएगा तो मोदी ही के नारे के साथ। इन सभी नारें के केंद्र में मोदी थे। वोटर को किसी और नेता के बारे में सोचने विचारने की गुंजाइश नहीं मिली। कहा जा रहा है कि बीजेपी के कई कमजोर उम्मीदवारों की नैय्या भी मोदी की लहर पर सवार होकर पार हो जाएगी।


पिछले पांच सालों में मोदी का कद इतना बड़ा हो गया कि एक चेहरा विहीन विपक्ष उनके सामने खड़ा नहीं हो पाया। एग्जिट पोल के नतीजे अगर 23 तारीख को वास्तविक परिणाम में बदलेंगे तो विपक्ष शायद ये महसूस करेगा कि दोनों पक्षों के बीच फर्क सिर्फ मोदी का था।