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कंज्यूमर अड्डा: हजारों दवाओं पर बैन, क्यों लगा प्रतिबंध!

प्रकाशित Fri, 14, 2018 पर 09:02  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

एक कहावत है कि मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों की दवा। कहावत याद करने की वजह ये है कि सरकार ने एक साथ हजारों दवाईयों के बारे में इसे सही पाया है और उन पर बैन लगा दिया। अब सवाल उठता है कि अगर वो दवाईयां गलत थीं तो इतने दिनों से हम उन्हें क्यों ले रहे थे? और सवाल ये भी है कि हमारा हेल्थ सिस्टम आखिर किस हद तक बीमार है और हमें और क्या-क्या सदमे देगा।


दवा अगर मरीज को ठीक करने से ज्यादा साइड इफेक्ट पैदा करे तो आगे चलकर नए सिरे से बीमारी होगी, अब ऐसी दवा तो मुसीबत है। केंद्र सरकार ने हजारों दवाईयों पर जो प्रतिबंध लगाया, उसके पीछे भी इलाज और सेहत की सुरक्षा का तर्क है। ये दवाईयां जिन 328 फिक्स डोज कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल कर बनाई गई हैं, उनके प्रभाव और दुष्प्रभाव का अध्ययन किए बगैर उन्हें बाजार में उतारा गया है।


जिन कंपनियों की दवा बैन के दायरे में आई हैं, उनमें फाइजर, वॉकहार्ट, एल्केम, सिप्ला, सनोफी और सन फार्मा जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं जबकि दवाईयों की बात करें तो ये फेंसिडिल, जिफी, सूमो, जेमिनोर, रिओमेट ट्रिओ, जिंटास पी, जॉप एल, ऐफटर्म एमएक्स, मेगावेंट, कोडिकॉन, टीजाफ्लेक्स, टीजू, टैलेंटिल फोर्टे जैसी काफी पॉपुलर दवाएं हैं। ये सभी फिक्स डोज कॉम्बिनेशन वाली दवाईयां हैं। एक से ज्यादा सॉल्ट मिलाकर बनाई गई दवा को एफडीसी यानि फिक्स डोज कॉम्बिनेशन वाली दवा कहा जाता है।


इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने इनकी जांच के लिए एक कमिटी का गठन किया था और उसी कमिटी की सिफारिश के आधार पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये फैसला सुनाया है। लेकिन सवाल है कि क्या दवा कंपनियों को मालूम था और क्या वो जानबूझकर मरीजों की सेहत से खिलवाड़ कर रही थीं, और अगर हां तो क्या ये बैन इनका स्थायी इलाज है?