कंज्यूमर अड्डा: प्लास्टिक प्रदूषण, कैसे मिले निजात -
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कंज्यूमर अड्डा: प्लास्टिक प्रदूषण, कैसे मिले निजात

प्रकाशित Wed, 06, 2018 पर 08:11  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

विश्व पर्यावरण दिवस की  मेजबानी  भारत के हिस्से में है और इस बार की थीम प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर है। लेकिन क्या प्लास्टिक  सहित सभी तरह के कचरे के निपटारे के लिए भारत के पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ है? 2 साल पहले सरकार ने  अलग अलग तरह के कचरे से निपटने के लिए कई नियम लाए थे। 2 साल बाद क्या है इन नियमों का हाल आइए देखते हैं।


जिधर देखो, उधर कचरा । सरकार के स्वच्छ भारत अभियान से फैली जागरुकता के बाद भी यही देश का हाल है। 2016 में सरकार ने कचरे से  निपटने के लिए प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा और बायोमेडिकल कचरे के लिए बाकायदा नियम भी बनाए थे। लेकिन 2 साल बाद हालात बद्तर ही हुए हैं।


प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016 में प्लास्टिक बनाने वाली और इस्तमाल करने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी तय की गई थी। लेकिन हकीकत ये है कि देश में पिछले 2 साल में प्लास्टिक कचरा तेजी से बढ़ा है।


2015 में भारत में हर रोज जहां 15300 टन प्लास्टिक कचरा निकलता था वहीं 2017 में यह 25000 टन हो गया। कानून को कड़ाई से लागू करना तो छोड़िए जो कानून था भी उसमें भी 2018 में बदलाव कर दिया गया। अब तक इस कानून को तोड़ने के लिए किसी भी कंपनी को जुर्माना नहीं देना पड़ा है।


2016 में ही इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट कानून के तहत हर साल कंपनियों को तय सीमा में पुराने उत्पादों को रिसाइकिल कराना अनिवार्य बनाया गया था। लेकिन बाद में इसमें भी बदलाव कर कंपनियों के रीसाइकिलिंग के लक्ष्य को काफी कम कर दिया गया।


इसका भी नतीजा ये कि 2016 में जहां भारत ने 20 लाख मेट्रिक टन ई-कचरा पैदा किया वहीं 2018 में इसके बढ़ कर 30 लाख मेट्रिक टन होने की आशंका है। यहां भी अब तक किसी भी कंपनी पर जुर्माना नहीं लगाया गया है।


अब अस्पतालों से निकलने वाले कचरे का हाल भी देख लें। 2016 में इसके लिए भी नियम आए थे लेकिन इसके बावजूद  मेडिकल कचरे में हर साल 7 फीसदी उछाल दिख रहा है। इस समय रोजाना 550.9 टन कचरा पैदा होता है जिसके  2020 तक 775.5 टन मेडिकल होने की आंशंका है।


पहले नियम बनाना फिर उसमें छूट देना। नतीजा ये कि भारत कचरे के खिलाफ जंग में विफल रहा है। लेकिन अगर हम अब भी नहीं जागे तो हमारा कचरा हमारे साथ-साथ हमारी आने वाली पीड़ियों के लिए कैंसर से कम साबित नहीं होगा।


भारत में प्लास्टिक कचरे की बात करें तो देश में 110000 करोड़ रुपये की प्लास्टिक इंडस्ट्री हैं। देश में हर साल 1.3 करोड़ टन प्लास्टिक इस्तेमाल होता है और हर साल 90 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।


देश में प्लास्टिक का भयानक सच ये है कि यहां हर मिनट 10 लाख प्लास्टिक बोतलों की बिक्री होती है, हर साल 5 ट्रिलियन प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल होता है और समुद्रों में हर साल 1.3 करोड़ टन प्लास्टिक जाता है। प्लास्टिक देश के कुल कचरे का 10 फीसदी हिस्सा है।


प्लास्टिक से मुक्ति की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की बात करें तो महाराष्ट्र का 1 साल में प्लास्टिक मुक्त होने का लक्ष्य है। तमिलनाडु में 2019 से प्लास्टिक बैन की तैयारी है। अब तक कुल 18 राज्यों में प्लास्टिक बैन किया जा चुका है।