Moneycontrol » समाचार » बाज़ार खबरें

कंज्यूमर अड्डा: कंज्यूमर कोर्ट से रेरा को परहेज क्यों!

प्रकाशित Tue, 27, 2018 पर 08:05  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

डेवलपर्स के चंगुल में फंसे घर खरीदारों को हक दिलवाने के लिए बना रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी यानि रेरा एक बड़े बदलाव की मांग कर रहा है। रेरा के प्रमुख कह रहें हैं मैं हूं ना। रेरा करेगा मदद और घर खरीदारों को उपभोक्ता फोरम में जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने इसके लिए सरकार से कानून में संशोधन की मांग की है। लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों चाहते हैं रेरा के कर्ता धर्ता, किसी कंज्यूमर को उपभोक्ता फोरम में गुहार लगाने से क्यों रोका जाना चाहिए और सबसे बड़ा सवाल इससे घर खरीदारों को क्या फायदा होगा?


घर खरीदारों की आवाज़ सुनने और उनका हक दिलाने के लिए सरकार ने 1 मई 2017 को रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी कानून यानि रेरा को देश भर में लागू किया था। लेकिन अब कई राज्यों के रेरा प्रमुखों ऐसी मांग रख दी है, जो एक नजर में कंज्यूमर के खिलाफ जाती दिखाई देती है। आवास मंत्रालय के एक कार्यक्रम के दौरान।


मध्य प्रदेश रेरा के चैयरमैन एंथनी डी सा ने कहा कि घर खरीदारों के उपभोक्ता कोर्ट में अपील करने पर रोक लगनी चाहिए। उनके मुताबिक कंज्यूमर कोर्ट का फोकस उपभोक्ताओं को रिफंड और मुआवजा दिलाने पर होता है जबकि रेरा अथॉरिटी खरीदार के हक के साथ प्रोजेक्ट के पूरा होने पर भी ध्यान देती है। हरियाणा के रेरा चीफ के मुताबिक अगर प्रोजक्ट 40 से 50 फीसदी तक बन चुका है तो वो रिफंड नहीं लेने देते। उनके मुताबिक अगर खरीदार रिफंड ही ले लेंगे तो प्रोजेक्ट कैसे पूरा होगा। राज्यों के रेरा चीफ ने शहरी विकास मंत्रालय से इस बारे में कानून में बदलाव की भी मांग की है। लेकिन सवाल है कि क्या ये मांग जायज है? क्या घर खरीदारों के उपभोक्ता फोरम जाने पर रोक लग जानी चाहिए?


प्रॉपइक्विटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अलग-अलग शहरों में 1,687 प्रोजेक्ट्स में करीब 4.65 लाख यूनिट्स लेटलतीफी की शिकार हैंI 1.5 साल बीत जाने के बाद भी राज्यों में रेरा की हालत ठीक नहीं है और वो केंद्र के कानून में बड़े बदलाव कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में रेरा के बजाए एचआईआरए यानि हाउसिंग इंडस्ट्री रेगुलेशन एक्ट लागू किया गया है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के रेरा कानून में चालू प्रोजेक्ट की परिभाषा बदल दी गई है। दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और चंडीगढ में स्थायी रेगुलेटरी अथॉरिटी नहीं है, जबकि कुछ राज्यों में निर्णय अधिकारी तक नियुक्त नहीं हुए हैं। सवाल ये है कि जब खुद रेरा ही देशभर में सही से लागू नहीं हो पाया है तो  कानून में इतना बड़ा बदलाव कंज्यूमर के हक में कैसे होगाI