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कंज्यूमर अड्डा: सिजेरियन के नाम पर लूट!

प्रकाशित Tue, 04, 2018 पर 07:28  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

डिलीवरी नॉर्मल होगी या सीजेरियन पूरे 9 महीने तक गर्भवती महिला के घर में इसी पर चर्चा होती है। लेकिन आखिरी वक्त तक सब कुछ निर्भर होता है डॉक्टर पर, अगर डॉक्टर ने जैसे ही कहा कि बच्चे के गले में नली फंस गई है और ऑपरेशन करना होगा आप बिना सोचे-समझे सिजेरियन डिलीवरी के लिए तैयार हो जाते हैं और शायद कोई भी परिवार इस नाजुक स्थिति में ऐसा ही करेगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी तरह डराकर सिजेरियन के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है, उन्हें लूटा जा रहा है। एक बार फिर इसी से जुड़ा एक रिसर्च सामने आया है जो निजी अस्पतालों और सरकार पर फिर से बड़े सवाल खड़े करता है।


बच्चे की सुरक्षित डिलिवरी के लिए ऑपरेशन को लेकर अक्सर निजी अस्पतालों पर उंगली उठती रही है और अब एक हालिया रिसर्च ने इन आरोपों को और मजबूत किया हैI आईआईएम अहमदाबाद के फैकल्टी मेंबर अंबरीश डोंगरे और छात्र मितुल सुराणा ने मिलकर टू मच केयर नाम का एक रिसर्च किया है जिसके मुताबिक 1 साल में देशभर के निजी अस्पतालों में हुई 70 लाख में से 9 लाख डिलिवरी सी-सेक्शन के जरिए की गईं थी। इतना ही नहीं इन सभी डिलिवरी में सिजेरियन करने की जरूरत नहीं थी। दरअसल ये ऑपरेशन पैसा कमाने के लिए किए गए थे। इस रिसर्च के मुताबिक ऐसा करने से ना केवल लोगों की जेब पर बोझ पड़ा, बल्कि इससे स्तनपान कराने में देरी, शिशु का वजन कम होना और सांस लेने में तकलीफ सहित मां और बच्चे को कई दूसरी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं सिजेरियन डिलिवरी का कोई एक कारण नहीं हैI बल्कि कई बार मां-बाप भी इसके लिए डॉक्टरों पर दबाव बनाते हैंI वहीं निजी अस्पतालों की भूमिका इस मामले में सबसे ज्यादा शक के घेरे में है।


निजी अस्पतालों का बढ़ता दबदबा और ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ इसका सबसे बड़े कारण हैंI नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट की तुलना करें तो पिछले 10 सालों में देश में सिजेरियन डिलिवरी की संख्या दोगुना बढ़ गई हैI 1 साल के आंकड़ें देखें तो निजी अस्पतालों ने करीब 41 फीसदी सिजेरियन डिलिवरी कराई है जबकि सरकारी अस्पतालों में ये संख्या 12 फीसदी तक सीमित है। यानि सरकारी अस्पतालों के मुकाबले प्राईवेट अस्पतालों में सिजेरियन डिलिवरी कराने का औसत 3 गुना से भी ज्यादा है।


हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब सिजेरियन डिलिवरी पर सवाल उठे होंI ये मुद्दा पहले भी सामने आता रहा है, ऐसे में निजी अस्पतालों के साथ सरकार की भूमिका भी सवालों के कठघरे में है।