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कंज्यूमर अड्डा: मैगी एक बार फिर सवालों के घरे में!

प्रकाशित Sat, 05, 2019 पर 13:15  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

हम क्यों खाए लेड वाली मैगी सुप्रीम कोर्ट के इस सवाल ने फिर से देश के पसंदीदा नूडल स्नैक पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। मैगी और विवादों का पुराना नाता रहा है लेकिन अब इस विवाद में जो नया एंगल जुड़ा है वो हमें सोचने के लिए विवश कर रहा है कि हम जो भी कुछ खा रहे हैं वो कितना सुरक्षित है? और इसे मापने के लिए हमारे मानदंड क्या हैं और उससे भी ज्यादा जरूरी मानदंड हैं भी या नहीं। अगर हैं तो क्या इन्हें कड़ाई से लागू किया जा रहा है वरना आज मैगी कह रही है लेड है लेकिन परमिसबल लिमिट में हैं लेकिन परमिसिबल लिमिट में ही सही हानिकारक केमिकल तो खाने में मौजूद ही है। आज मैगी है कल कोई और हमारे और हमारे बच्चों की सेहत को ताक पर रखकर मोस्ट पॉपुलर टू मिनट स्नैक का ताज पहनकर हमारे बाजारों में धडल्ले से बिकता रहेगा। अब वो वक्त आ गया है कि खाने पीने की जांच और परख के कड़े स्टैंडरड केवल बनाए ही न जाए बल्कि ये भी सुनिश्चित करना होगा कि इसका पालन भी हो वरना आपके स्वास्थ के साथ खिलवाड़ चलता रहेगा।


आपको याद होगा की 2015 में भारत के फूड रेगुलेटर एफएसएसएआई ने मैगी को बैन कर दिया था। वजह थी मैगी में पाया गया एमएसजी यानि मोनो सोडियम ग्लूटामेट और तय मात्रा से ज्यादा लेड। तब मामला काफी गर्माया था और भारत सरकार ने मैगी के खिलाफ एनसीडीआरसी में 650 करोड़ रुपये का क्लास एक्शन सूट दायर किया था जिसे मैगी बनाने वाली नेस्ले ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। करीब 3 साल बाद जब गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फिर सुनवाई की तो फिर गंभीर सवाल उठे।


लेकिन इस मामले को अच्छे से समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 2015 में मैगी पर सवाल उठने के बाद जब केंद्र सरकार ने एनसीडीआरसी में क्लास एक्शन सूट दायर किया तो नेस्ले ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी 2016 को सीएफटीआरआई यानि सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट से मैगी की नए सिरे से जांच करने के आदेश दिए। 6 अप्रैल को सीएफटीआरआई ने टेस्ट रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी गई। रिपोर्ट में पाया गया कि मैगी में एमएसजी की मात्रा तय सीमा यानि 2.5 पीपीएम के अंदर है और एमएसजी भी तय सीमा से ज्यादा नहीं है। लेकिन गुरुवार को हुई सुनवाई में जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि मैगी में लेड होना ही क्यों चाहिए। आखिर बच्चे लेड वाली मैगी क्यों खाएं। फिलहाल सीएफटीआरआईकी रिपोर्ट के साथ मामला फिर से एनसीडीआरसी के पास भेज दिया गया है। लेकिन जस्टीस चंद्रचूड ने जो सावल उठाए हैं उन्हें न मैगी बनाने वाली नेस्ले हल्के में ले सकती है न आप और हम।